अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में अप्रैल महीने के दौरान 16 प्रतिशत की गिरावट आई। यह क्रूड ऑयल के दाम में पिछले साढ़े तीन सालों में आई सबसे बड़ी मंथली गिरावट है। यह गिरावट ऐसे समय पर आई है जब OPEC+ देशों की अगुवाई कर रहा सऊदी अरब अब उत्पादन बढ़ाने के संकेत दे रहा है, और यह मान रहा है कि वह लंबे समय तक कम कीमतों को सह सकता है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब ने इस बात के संकेत दिए हैं कि वह ऑयल मार्केट को सपोर्ट करने के लिए अपने उत्पाद में आगे और कटौती के पक्ष में नहीं है। इसके उलट, वह उत्पादन बढ़ाने पर विचार कर रहा है ताकि बाजार में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत किया जा सके। यह नीति पिछले 5 सालों से चली आ रही OPEC+ देशों की रणनीति में एक बड़ा बदलाव मानी जा रही है, जिसमें अब तक उत्पादन में कटौती कर कीमतों को संतुलित किया जाता रहा है।
इतना ही नहीं, OPEC+ के आठ सदस्य देश मई से उत्पादन बढ़ाने के लिए पहले ही सहमत हो चुके हैं। इस फैसले ने बाजार में सप्लाई का दबाव बढ़ा दिया है, जिससे अप्रैल में कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे गिर गईं। यह पिछले चार सालों का न्यूनतम स्तर है।
OPEC+ देशों की अगली अहम बैठक 5 मई को होनी है, जिसमें जून से उत्पादन बढ़ाने पर औपचारिक निर्णय लिया जा सकता है।
Price Futures Group के सीनियर एनालिस्ट फिल फ्लिन ने रॉयटर्स से बातचीत में कहा, "यह चिंता की बात है कि कहीं हम एक और उत्पादन युद्ध की ओर तो नहीं बढ़ रहे।"
हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट भारत के लिए राहत की खबर है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है, और तेल की कीमतों में गिरावट से महंगाई पर दबाव कम होता है और व्यापार घाटा भी घटता है।
HDFC बैंक की प्रिंसिपल इकनॉमिस्ट साक्षी गुप्ता के मुताबिक, "हमारे बड़े इंपोर्ट बिल को देखते हुए, क्रूड के दाम में हर 10 डॉलर की गिरावट से देश का चालू खाता घाटा करीब 0.30 बेसिस पॉइंट्स तक कम हो जाता है।"
ग्लोबल मंदी का डर भी बड़ा कारण
क्रूड ऑयल के दाम में गिरावट की वजह सिर्फ उत्पादन में बढ़ोतरी ही नहीं है, ग में सुस्ती और ग्लोबल आर्थिक अनिश्चितताओं से भी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। अमेरिका में पहली तिमाही में इकोनॉमी बढ़ने की जगह सिकुड़ गई है, जो 2022 के बाद पहली बार हुआ है। ट्रेड टैरिफ और मंदी के डर ने अमेरिका के कंज्यूमर कॉन्फिडेंस को 5 सालों के न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है।
और भी नीचे जा सकती हैं कीमतें?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ओपेक+ देशों का उत्पादन बढ़ाता है और ग्लोबल व्यापार तनाव जारी रहता है, तो क्रूड की कीमतें मध्यम अवधि में 75 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रह सकती हैं। गोल्डमैन सैक्स ने तो यहां तक कहा है कि चरम स्थिति में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 40 डॉलर प्रति बैरल से नीचे भी जा सकती हैं।
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