अमेरिका ने अब रूस के ऑयल (Russian Oil) को बैन कर दिया है। इससे क्रूड में उछाल आया। बुधवार को ब्रेंट क्रूड प्राइस (Brent Crude Price) 129 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। उधर, ब्रिटेन ने कहा है कि वह धीरे-धीरे रूस से एनर्जी का इंपोर्ट घटाएगा। उसने 2022 के अंत तक इंपोर्ट जीरो पर लाने का प्लान बनाया है। रूस से एनर्जी का सबसे ज्यादा इंपोर्ट यूरोपीय देश करते हैं।
यूरोपीय देश रूस से करीब 40 फीसदी गैस इंपोर्ट करते हैं। वे रूस से करीब 25 फीसदी ऑयल इंपोर्ट करते हैं। यूरोपीय देशों ने रूस से गैसा का इंपोर्ट दो-तिहाई तक घटाने का प्लान बनाया है। इससे पहले रूस ने धमकी दी थी कि अगर उस पर प्रतिबंध लगाया गया तो वह नोर्ड स्ट्रीम 1 पाइपलाइन से यूरोप को होने वाली नेचुरल गैस की सप्लाई बंद कर देगा। उधर, अमेरिका रूस से 10 फीसदी से कम एनर्जी इंपोर्ट करता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसलिए रूसी ऑयल पर बैन का अमेरिका पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। आइए जानने की कोशिश करते हैं कि रूस के ऑयल पर बैन का क्या असर पड़ेगा।
अमेरिका में गैसोलीन (पेट्रोल) के प्राइस बढ़े हैं। 2008 के बाद पहली बार इसका एवरेज प्राइस 4 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गया है। अभी अमेरिका और यूरोप की तरफ से रूस के ऑयल पर पूरा बैन लगने की उम्मीद कम दिखती है। जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज कह चुके हैं कि उनका रूस के ऑयल पर पूरी तरह से बैन लगाने की कोई योजना नहीं है। यूरोप में जर्मनी रूस से सबसे ज्यादा एनर्जी इंपोर्ट करता है।
उधर, अमेरिकी संसद की स्पीकर नैंसी पेलोस्की ने कहा है कि अगर रूस के ऑयल पर बैन के प्रस्ताव को पारित कर दिया जाता है तो भी बाइडेन सरकार और कांग्रेस की दिलचस्पी अमेरिकी लोगों के लिए ऑयल की कीमतों में कमी लाने में नहीं है। हालांकि, उन्होंने रूस के ऑयल पर बैन का समर्थन किया है। उन्होंने बाइडेन के उस कदम का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने अमेरिका के सहयोगी देशों से स्ट्रेटेजिक रिजर्व से 6 करोड़ बैरल रिलीज करने को कहा था। इसमें से 3 करोड़ डॉलर अमेरिका ने रिलीज किया था।
रूस कितना ऑयल एक्सपोर्ट करता है?
यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले दुनिया में हर 10 बैरल क्रूड की खपत में रूस की हिस्सेदारी 1 बैरल की थी। लेकिन, अमेरिका और पश्चिमी देशों के रूस पर प्रतिबंध लगा देने के बाद से 1970 के दशक के बाद ग्लोबल ऑयल मार्केट में सबसे बड़ी उथलपुथल दिख रही है। यूक्रेन और रूस की लड़ाई जारी रहने पर एनर्जी की कीमतों में उछाल जारी रहेगा। इसकी वजह यह है कि रूस के ऑचल एक्सपोर्ट का फिलहाल दूसरा कोई विकल्प नहीं है। रूस रोजाना करीब 50 लाख बैरल ऑयल एक्सपोर्ट करता है।
ऑयल की कीमतें पहले से ही चढ़ रही थीं। कोरोना का असर कम होने पर दुनियाभर में आर्थिक गतिविधियां फिर से सामान्य हो रही हैं। इसके चलते ऑयल उत्पादकों को बढ़ती डिमांड को पूरा करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। पिछले दो साल में दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों ने उत्पादन घटा दिया था।
तेल की कीमतों पर होगा क्या असर?
एक महीना पहले क्रूड का प्राइस करीब 90 डॉलर प्रति बैरल था। अब प्राइस बढ़कर 129 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है। इसकी वजह यह है कि दुनिया के कई देश रूस से ऑयल खरीदने से कतरा रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यूरोपीय देश भी रूस के ऑयल पर बैन लगाते हैं या कुछ देश रूस के ऑयल खरीदने से दूरी बनाए रखते हैं तो इसका प्राइस 160 डॉलर या यहां तक कि 200 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है।
महंगाई पर पड़ेगा कितना असर?
रूस पर प्रतिबंध के बाद से कमोडिटीज की कीमतों में तेज उछाल आया है। लंदन मेटल एक्सचेंज ने निकेल का भाव 1 लाख डॉलर प्रति टन से ऊपर जाने पर इसकी ट्रेडिंग रोक दी है। निकेल का इस्तेमाल स्टेनलेस स्टील और इलेक्ट्रिक व्हीकल की बैटरी बनाने में होता है। जनवरी में इसकी कीमत करीब 20,000 डॉलर प्रति टन थी। उधर, सोना 2000 डॉलर प्रति औंस पार कर गया है। कई दूसरे कमोडिटी में भी उछाल दिखा है।