Network18 Exclusive| महंगाई लंबे समय तक ज्यादा बनी रह सकती है : रघुराम राजन

रघुराम राजन ने कहा कि दुनिया के कई देशों में पहले से ही महंगाई (Inflation) ज्यादा थी। अगर आप इसमें लड़ाई को जोड़ दें तो महंगाई और बढ़ जाएंगी और ग्रोथ घटेगी। दोनों मिलकर इनफ्लेशन पर असर डालेंगे

अपडेटेड Mar 09, 2022 पर 2:29 PM
रघुराम राजन ने कहा कि सैंक्शंस के गंभीर नतीजे होंगे। यूक्रेन पर रूस के अप्रत्याशित हमले ने पश्चिमी देशों को एकजुट किया है। उनके साथ जापान भी आ गया है। इससे दुनिया में मौजूदा व्यवस्था को चोट पहुंची है।

रूस-यूक्रेन की लड़ाई आम आदमी की प्रॉब्लम बढ़ाएगी। दरअसल, इसके चलते दुनियाभर में ज्यादातर चीजों की कीमतें बढ़ने का अंदेशा है। क्रूड ऑयल, गेहूं सहित कई कमोडिटी की कीमतों में जबर्दस्त तेजी दिख रही है। उधर, अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। क्या इसका असर भी जरूरी चीजों की सप्लाई पर पडे़गा? इन सवालों के जवाब जानने के लिए सीएनबीसी-टीवी18 की लता वेंकटेश ने आरबीआई के पूर्व गवर्नर और मशहूर अर्थशास्त्री रघुराम राजन से बातचीत की। यहां पेश है बातचीत का प्रमुख अंश।

क्या कीमतों में उछाल थोड़े समय के लिए है, लड़ाई खत्म होने पर कीमतें फिर से सामान्य हो जाएंगी?

दुनिया के कई देशों में पहले से ही महंगाई (Inflation) ज्यादा थी। अगर आप इसमें लड़ाई को जोड़ दें तो महंगाई और बढ़ जाएंगी और ग्रोथ घटेगी। दोनों मिलकर इनफ्लेशन पर असर डालेंगे। अमेरिका और यूरोप में ऐसी स्थिति दिख रही है। लड़ाई के चलते इनफ्लेशन पर दबाव और बढ़ जाएगा। इस बात का रिस्क है कि इनफ्लेशन के खिलाफ लड़ाई लंबी खिंचेगी। यह अच्छी खबर नहीं है। इनफ्लेशन लंबे समय तक हाई बना रहेगा।


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 रूस पर प्रतिबंध अगर यह लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका क्या असर पड़ेगा?

मेरा मानना है कि सैंक्शंस के गंभीर नतीजे होंगे। यूक्रेन पर रूस के अप्रत्याशित हमले ने पश्चिमी देशों को एकजुट किया है। उनके साथ जापान भी आ गया है। इससे दुनिया में मौजूदा व्यवस्था को चोट पहुंची है। पश्चिमी देश प्रतिबंध को सख्ती से लागू करना चाहते हैं। वे इसमें किसी तरह की कोताही नहीं चाहते। हां, इसका असर पड़ना तय है। चूंकि रूस एनर्जी सहित कई कमोडिटीज का बड़ा एक्सपोर्टर है, जिससे ग्लोबल इकोनॉमी को सैंक्शंस के चलते नुकसान हो सकता है। रूस निकेल, पैलेडियम, नियोन, जेनोन, फर्टिलाइजर्स और अनाज तक एक्सपोर्ट करता है।

एनर्जी की ऊंची कीमतों को देखते हुए अभी दुनिया के सामने क्या विकल्प है?

मेरा मानना है कि सप्लाई के दूसरे स्रोतों के इस्तेमाल से इस नुकसान को कम किया जा सकता है। उदाहरण के लिए ऑयल के मामले में वेनेजुअल और ईरान से बातचीत चल रही है। ईरान से फिर से ऑयल की सप्लाई शुरू करने की कोशिश हो रही है। दूसरा, शेल (Shale) एनर्जी में फिर से दिलचस्पी दिखेगी। इसलिए अगले कुछ महीनों में ऊंची कीमतों के चलते सप्लाई के दूसरे स्रोतों का इस्तेमाल शुरू होगा। उधर, ऊंची कीमतों के चलते डिमांड में भी कमी आएगी।

ग्लोबल इकोनॉमी के लिहाज से रूस का साइज बहुत मैटर नहीं करता है। लेकिन, जरूरी चीजों की सप्लाई में उसका बड़ा रोल है। दुनिया अभी कार्बन एनर्जी पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इसमें कमी लानी होगी। रिन्यूएबल एनर्जी पर फिर से फोकस बढ़ सकता है।

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