LPG Price Today: अमेरिका और ईरान के बीच टकराव खत्म होने के बावजूद, पूरे भारत में LPG की कीमतें काफी हद तक स्थिर बनी हुई हैं। 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू LPG की कीमतों में बीते 7 जून को 29 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी, जिसके बाद से पूरे देश में इनके दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ है। वहीं, कमर्शियल LPG की कीमतों में आखिरी बार 1 जून को 42 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी।
इसके अलावा, उपभोक्ताओं के लिए एक और राहत की बात यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से तेल कार्गो की आंशिक आवाजाही के कारण भारत की ऊर्जा आपूर्ति में कुछ राहत मिली है।
25 जून को घरेलू और कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतें
उज्जवला योजना के लाभार्थियों को फायदा
देश में भले ही सामान्य सिलेंडर की कीमत 942 रुपये या उससे ज्यादा हो, लेकिन Pradhan Mantri Ujjwala Yojana (PMUY) के लाभार्थियों को सरकार की तरफ से 642 रुपये में सिलेंडर दिया जाता है। साथ ही उन्हें 300 रुपये प्रति सिलेंडर की सब्सिडी भी मिल रही है।
गैस सिलेंडर की कीमतें बढ़ने के कारण?
भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का 60% से अधिक हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की गैस कीमतों और सप्लाई पर पड़ता है। भारत में एलपीजी के आयात की लागत मुख्य रूप से सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस के आधार पर तय की जाती है, जिसे वैश्विक बेंचमार्क माना जाता है।
पश्चिम एशिया में जारी संकट के चलते फरवरी के बाद से इस ग्लोबल बेंचमार्क में लगभग 46% तक का इजाफा हुआ है। ऊपर से होर्मुज (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी के चलते सप्लाई चेन पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है। यही वजह है कि भारत में गैस का अयात अप्रैल महीने में घटकर सिर्फ 6.96 लाख टन रह गया, जो आमतौर पर करीब 20 लाख प्रति टन महीना होता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ कमी देखने को मिली है, लेकिन इसका असर एलपीजी सिलेंडर के दामों पर तुरंत नहीं दिखेगा। आमतौर पर गैस की कीमतों में बदलाव होने में 3 से 6 महीने तक का समय लग सकता है।
मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय कीमतों की बात करें तो एक सिलेंडर की वास्तिवक लागत करीब 1,600 रुपये पड़ती है, लेकिन दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू सिलेंडर की कीमत 942 रुपये है। यानी सिलेंडर की असली लागत और उपभोक्ताओं से वसूली जा रही कीमत के बीच जो अंतर है, उसका बड़ा हिस्सा फिलहाल तेल कंपनियां खुद वहन कर रही हैं, ताकि लोगों पर कीमतों का पूरा बोझ न पड़े। इसी अंतर की वजह से चालू वित्त वर्ष में तेल कंपनियों को कुल 60000 करोड़ रुपये तक का घाटा होने का अनुमान है।