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PMC Bank Crisis: जानिए क्यों डूबा यह बैंक?

4,335 करोड़ रुपए के फ्रॉड में गिरफ्तार, PMC बैंक के पूर्व चेयरमैन वरयाम सिंह की पुलिस हिरासत 14 अक्टूबर तक बढ़ा दी गई है
अपडेटेड Oct 10, 2019 पर 09:12  |  स्रोत : Moneycontrol.com

मुंबई के जीटीबी नगर के गुरुनानक स्कूल में 2 अक्टूबर को बड़ी तादाद में सिख समुदाय के लोग जुटे। ये लोग वहां पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव (PMC) बैंक के ग्राहकों से मिलने आए थे। हॉल में जितनी भीड़ थी उतनी ही ज्यादा टेंशन। RBI के PMC बैंक के कामकाज पर रोक लगाने से ग्राहकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।


गुरुनानक सोसाइटी के प्रेसिडेंट मनजीत सिंह भट्टी ने परेशान ग्राहकों से मिलकर उन्हें भरोसा दिलाया कि वह  मुंबई हाई कोर्ट में अपील करेंगे कि लोगों का पैसा उन्हें वापस किया जाए। भट्टी ने कहा कि वैसे इन बातों का लोगों पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि उन्हें कोई ठोस उपाय चाहिए। 


मिंट के मुताबिक, ऐसी कई खबरें आई हैं कि हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (HDIL) के प्रमोटर पिता-पुत्र राकेश और सारंग वधावन PMC बैंक से मोटा कर्ज लेकर अपने ठाठबाट पर खर्च कर रहे थे। वैसे तो यह माना जाता है कि कोई कंपनी कर्ज लेकर अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश करती है लेकिन इस मामले में यह बात गलत साबित हुई है।


कौन-कौन हैं विलेन?


PMC बैंक को डुबाने में बहुत ज्यादा कर्ज उठाकर डिफॉल्ट करने वाली प्रॉपर्टी डेवलपर्स कंपनी HDIL मेन है। इसके साथ ही बैंक अधिकारियों का गड़बड़झाला और बेशक बैंक पर नेताओं के असर ने रही सही कसर पूरी कर दी। मिंट के मुताबिक, महाराष्ट्र में इस महीने चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में निश्चित तौर पर PMC बड़ा मुद्दा बनेगा।


कितनी हुईं गिरफ्तारियां?


PMC बैंक का मामला उजागर होने के बाद से 4 लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। हाल ही में मुंबई पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) ने बैंक के पूर्व चेयरमैन वारयाम सिंह को गिरफ्तार किया था। EOW ने पहले ही पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर जॉय थॉमस और HDIL के प्रमोटर राकेश और उनके बेटे सारंग वधावन को गिरफ्तार कर लिया है।


हालांकि ग्राहकों को जल्दी राहत की उम्मीद नहीं है। PMC बैंक की पोल खोलने के बाद पता चला है कि बैंक में गवर्नेंस का स्तर बहुत कमजोर था।


वही पुरानी कहानी


PMC बैंक सबसे बड़ा कोऑपरेटिव बैंक था जो 2001 से ही RBI की निगरानी में था। 2001 में माधवपुरा मर्केंटाइल कोऑपरेटिव बैंक संकट सामने आया था। इसका मामला केतन पारेख स्टॉक मार्केट स्कैम से जुड़ा था। जहां माधवपुरा बैंक ने एक सिंगल स्टॉक ब्रोकर को बड़ा लोन दिया था। वहीं PMC बैंक ने एक सिंगल रियल एस्टेट डेवलपर्स (HDIL) को लोन दिया था, जिसकी विश्वसनीयता पहले से ही संदेह के दायरे में थी।   


मिंट के मुताबिक, नेशनल फेडरेशन ऑफ अर्बन कोऑपरेटिव बैंक और क्रेडिट सोसायटीज लिमिटेड के पूर्व चेयरमैन मुकुंद अभयंकर ने कहा, शुरुआत में जब यह खबर आई तो मुझे लगा कि यह बहुत बड़ा नहीं होगा। लेकिन मैनेजिंग डायरेक्टर जॉय थॉमस के गलती स्वीकार करने के बाद यह लगा कि माधवपुरा कोऑपरेटिव बैंक की तरह एक और बैंक संकट शुरू हो गया। इससे लिक्विडेशन खत्म हो सकता है और पूरा मामला सुलझने में 6-7 साल का वक्त लग सकता है।


इस तरह के संस्थानों को चलाने में स्थानीय नेताओं का भी बड़ा हाथ होता है। बैंक के बोर्ड पर नेताओं का दबदबा होता है। लिहाजा कुछ ऐसे फैसले ले लिए जाते हैं जो बैंक के लिए ठीक नहीं होते। कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट के तहत इन बैंकों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स मेंबर के बीच चुनाव से तय होता है। यह प्रोफेशनल्स की तरफ से चलाया जाने वाला बोर्ड नहीं होता है।   


कब नजर आया पहला संकेत?


23 सितंबर को RBI ने PMC बैंक की गतिविधियों पर पूरी तरह 6 महीने के लिए रोक लगा दी और अगले 6 महीनों के लिए एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया था। इसके साथ ही ग्राहकों के पैसे निकालने पर भी पाबंदी लगा दी गई थी। पहले 6 महीने में हर अकाउंट से सिर्फ 1000 रुपए निकालने की इजाजत थी। इसके बाद इसे बढ़ाकर 10,000 रुपए और बाद में उसे 25,000 रुपए कर दिया।
PMC बैंक के मामले में 60 फीसदी से ज्यादा कस्टमर के खातों में करीब 10,000 रुपए हैं। 


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