अगर आपका पेट ज्यादातर समय हमेशा भरा हुआ लगा रहता है तो यह भी एक तरह की बीमारी है। ऐसी स्थिति जिसमें पेट स्वत: खाली न हो पाए तो उसे गेस्ट्रोपेरेसिस कहते हैं। यह एक डिसऑर्डर है, जिसमें पेट को भोजन को खाली करने में बहुत ज्यादा समय लगता है। भोजन को पचने में 12-24 घंटे या उससे भी अधिक समय भी लग जाता है। जिससे कई तरह के लक्षण महसूस होते हैं। आमतौर पर भोजन करने के बाद पेट की मजबूत मांसपेशियां संकुचित होकर भोजन को आंतों में ले जाती हैं। तब पेट खाली होता है। ऐसे में भोजन करीब 4 घंटे के बाद आंतों में पहुंचता है।
दरअसल पेट फूलना, वजन घटना, भूख न लगना, बार-बार उल्टी आना, ये सभी लक्षण पाचन तंत्र से जुड़े होते है। कभी ब्लोटिंग होने लगती है तो कई बार उल्टी भी आने लगती है। यह गैस्ट्रोपैरेसिस की वजह से हो सकता है। इसका कोई माना हुआ इलाज नहीं है, लेकिन मेडिकल ट्रीटमेंट लक्षणों को मैनेज करने में मदद कर सकते हैं।
टाइप 2 डायबिटीज में गैस्ट्रोपेरेसिस का खतरा
जब पेट की नसें कई तरह से प्रभावित होती हैं तो भोजन बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि पाचन को प्रभावित करने वाले तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचाने का एक कारण टाइप 2 डायबिटीज में अनकंट्रोल ब्लड शुगर लेवल हो सकता है। इसके इसके अलावा ओपिओएड दर्द निवारक, एंटीडिप्रेजेंट और हाई ब्लड प्रेशर और एलर्जी की दवाएं भी पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देती हैं। हमारे शरीर में वेगस तंत्रिका पेट में मांसपेशियों को सिकुडऩे और भोजन को छोटी आंत से कोलन में धकेलने का संकेत देती है। जब नर्व डैमेज हो जाती है, तो इससे यह संकेत मिलता है कि अब भोजन आगे नहीं जा सकता है। लिहाजा भोजन आपके पेट में काफी समय तक बना रहता है। इससे बीमारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
वैसे तो पेट की एंडोस्कोपी करने के अलावा नर्व स्टडी से भी समस्या का पता चल जाता है। इसके अलावा रोग के अहम कारण को जानने के लिए ब्लड से जुड़े हुए कुछ न्यूट्रिएंट टेस्ट भी करते हैं।
इस समस्या के मरीज को भोजन करने के बाद पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करने के लिए हल्की फुल्की एक्सरसाइज या फिर वॉक करनी चाहिए। वॉर्म अप के दौरान किए जाने वाले वर्कआउट भी मददगार साबित हो सकते हैं। डॉक्टरी सलाह पर ही यह करना चाहिए।
रोग की अगर शुरुआती स्टेज है तो मरीज को खानपान और जीवनशैली में बदलाव के लिए कहते हैं। जैसे थोड़ा-थोड़ा बार-बार और धीरे-धीरे खाएं। ज्यादा तला-भुना और फाइबर से युक्त भोजन न लें। तरल और गरिष्ठ भोजन की मात्रा एक समान होनी चाहिए। मध्यम स्टेज में प्रोकाइनेटिक दवाओं से नसों को उत्तेजित किया जाता है। वहीं एडवांस्ड स्तर पर कई मामलों में गेस्ट्रो स्टीमुलेटर्स की मदद से नसों की गति बढ़ाई जाती है। इनसे उल्टी और मितली की समस्या में आराम मिलता है।