इंसान के दिमाग में भी पहुंच गई एक चम्मच के बराबर प्लास्टिक, रिसर्च में हुआ खुलासा

Plastic in Brain: आजकल की इस लाइफस्टाइल में प्लास्टिक का चलन तेजी से बढ़ा है। खाने पीने के सामान भी अब प्लास्टिक में भरे होते हैं। इस बीच रिसर्च में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इंसान के दिमाग में लगभग एक चम्मच के बराबर माइक्रोप्लास्टिक्स और नैनोप्लास्टिक्स (एमएनपी) होते हैं। वहीं डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्तियों में यह स्तर 3-5 गुना अधिक हो सकता है

अपडेटेड Mar 05, 2025 पर 12:10 PM
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Plastic in Brain: पृथ्वी के चारों ओर माइक्रोप्लास्टिक मौजूद है। यह हवा, पानी, भोजन और यहां तक कि हमारे शरीर के कई अंगों में भी पहुंच चुकी है।

इंसान के दिमाग में माइक्रोप्लास्टिक का एक चम्मच तक हो सकता है। यह मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। नई रिसर्च के मुताबिक, यह चौंकाने वाली मात्रा शरीर के अन्य हिस्सों के मुकाबले सबसे अधिक दिमाग में पाई जा रही है। ब्रेन मेडिसिन पत्रिका में छपी रिसर्च के मुताबिक, इंसान के दिमाग में करीब एक चम्मच के बराबर माइक्रोप्लास्टिक्स और नैनोप्लास्टिक्स (एमएनपी) होते हैं। डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्तियों में यह स्तर 3-5 गुना अधिक हो सकता है। रिसर्च करने वाली टीम ने चेतावनी दी है कि दिमाग के अंदर एक प्लास्टिक के चम्मच के बराबर प्लास्टिक है। इस बारे में वैज्ञानिकों ने सबूत भी दिए हैं।

हैरानी की बात ये है कि के ऊतकों में एमएनपी की सांद्रता लिवर या किडनी जैसे अन्य अंगों के मुकाबले 7-30 गुना अधिक पाई गई। रिसर्च में कहा गया है कि पर्यावरण में बढ़ती प्लास्टिक की वजह से शरीर के अंगों में इजाफा हो रहा है। प्लास्टिक के ये कण 200 नैनोमीटर से छोटे कण हैं। यह खासतौर से पॉलीथिन से बने होते हैं।

डिमेंश‍िया मरीजों में पांच गुना अध‍िक


रिसर्च करने वाली टीम का कहना है कि डिमेंश‍िया से पीड़‍ित 12 लोगों के मस्तिष्क में एक स्वस्थ मस्तिष्क के मुकाबले तीन से पांच गुना अधिक प्लास्टिक के टुकड़े पाए गए। ये टुकड़े इतने बारीक थे कि इन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता है। ये मस्तिष्क की धमनियों और नसों की दीवारों के साथ-साथ मस्तिष्क की इम्यूनिटी कोशिकाओं में भी घुस चुके थे। यह भी संभावना है कि ड‍िमेंश‍िया के साथ सूजन वाली सेल्स और ब्रेन ट‍िश्यू मिलकर प्लास्टिक के लिए एक तरह का सिंक बना सकता है। फिर भी इससे यह आशंका बढ़ गई है कि माइक्रोप्लास्टिक और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों जैसे अल्जाइमर और पार्किंसन्स के बीच गहरा संबंध हो सकता है।

बोतलबंद पानी से शरीर में पहुंच रही प्लास्टिक

टोरंटो विश्वविद्यालय में इंटरनल मेडिसिन के रेजिडेंट डॉ. ब्रैंडन लू का कहना है कि बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करने से शरीर में तेजी से प्लास्टिक के कण पहुंच रहे हैं। साल भर में सांस के जरिए और अन्य माध्यम से शरीर में जितनी प्लास्टिक पहुंच रही है। उतनी ही बोतलबंद पानी से भी प्लास्टिक शरीर में पहुंच रही है। वहीं नल के पानी का इस्तेमाल करने से यह जोखिम करीब 90 फीसदी तक कम हो जाता है।

कांच या स्टील के बर्तनों का करें इस्तेमाल

डॉ. ब्रैंडन लू का कहना है कि प्लास्टिक के बर्तनों में खाद्य पदार्थों को नहीं स्टोर करना चाहिए। इसकी जगह कांच या स्टील के बर्तनों का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे यह जोखिम कम हो सकता है।

डिस्क्लेमर - यहां बताए गए उपाय सिर्फ सामान्य ज्ञान पर आधारित हैं। इसके लिए आप किसी हेल्थकेयर प्रोफेशनल से सलाह लेने के बाद ही अपनाएं।

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