भारत आज एक बहुत बड़ा इतिहास रचने की कगार खड़ा पर है। अब से कुछ घंटों बाद भारत की स्पसे एजेंसी ISRO अपने तीसरे मून मिशन (Moon Mission) चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) को चांद पर उतारेगी। इस पूरे मिशन का सबसे अहम हिस्सा ही चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग (Soft Landing) कराना है। वैसे तो वैज्ञानिकों से लेकर आम जनता तक सभी को पूरी उम्मीद है कि इसबार हम चांद के साउथ पोल पर एक सॉफ्ट लैंडिंग करने में कामयाब होंगे, फिर भी कुछ एक आशंकाएं सभी के मन में है। इसी को लेकर Moneycontrol Hindi ने बात की वैज्ञानिक डॉ. अरुण प्रताप सिकरवार (Dr. Arun P Sikarwar) से और जाना की आखिर ये सॉफ्ट लैंडिंग इतनी अहम क्यों है?
डॉ. अरुण ने समझाया कि चंद्रयान-3 की लैंडिंग इसलिए प्रमुख है, क्योंकि अब तक ऑर्बिटर को भेजना काफी आसान था। किसी गृह या चंद्रमा के ऑर्बिट में एक तय स्पीड पर सैटेलाइट भेजना इतना मुश्किल नहीं था, लेकिन चांद की सतह पर उतरने की जब बात आती है, तो चीजें बदल जाती हैं।
उन्होंने समझाया, "चंद्रमा की सतह पर कोई वातावरण नहीं है, कोई हवा नहीं है। इसलिए वहां पर कोई चीज नीचे गिरने के समय कोई फ्रिक्शन ही पैदा नहीं होता, तो वो धीर-धीर नीची नहीं आती है। भले ही हमारा मानना है कि चंद्रमा पर तो गुरुत्वाकर्षण है, वो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के 1/6 होता है, लेकिन वो इतना काफी है कि कोई भी स्थिर चीज ऊपर जाएगी, तो वो उस नीत खींच लेगा।"
अब अगर बात करें चंद्रयान-3 की तो, इसमें जो विक्रम लैंडर है, उसका वजन है 1749 किलोग्राम। अब इसके अंदर, जो रोवर है, उसका खुद वजह 26 किलो। अब आप समझ सकते हैं कि इतने वजन की कोई चीज ऊपर एकदम से गिराई जाए, तो उसको कितना नुकसान हो सकता है। वो टकरा कर नीचे भी गिर सकता है।
डॉ. अरुण सिकरवार ने ये भी समझाया कि लैंडर किस तरह से चांद पर लैंडिंग करेगा। उन्होंने बताया कि लैंडर में चार रेट्रो रॉकेट हैं, वो चारों रॉकेट उल्टी दिशा में नीचे उतरेंगे यानि उनका आगे का हिस्स ऊपर की और नीचे का हिस्सा चांद की सतह की ओर होगा।
इससे होगा ये कि चारों रॉकेट लैंडर को तेजी से चांद पर गिरने नहीं देंगे, बल्कि वो धीरे-धीरे लैंडर को नीचे लेकर आएंगे, इस पूरी प्रक्रिया को सेफ लैंडिंग या सॉफ्ट लैंडिंग कहते हैं।
प्रोफेसर अरुण सिकरवार ने कहा कि ये सॉफ्ट लैंडिंग इतनी जरूरी इसलिए ही कि अगर 1700 किलो से ज्यादा वजन की किसी भी चीज को ऐसे ही ऊपर से नीचे गिराया जाता है, तो स्वाभाविक है वो टूट जाएगी और हमारा पूरा ऑपरेशन फेल हो जाएगा।
डॉ. सिकरवार ने आज के मिशन के ISRO के दो मुख्य मकसद बताए हैं, पहला लैंडर को बड़े आराम से लैंड कराना। दूसरा लैंडिंग के बाद चांद की सतह पर रोवर को बाहर निकालना और वहां मूव कराना है। इसके अलावा सबसे अहम काम है, लैंडर और रोवर की मदद से चांद के उस हिस्से खोजबीन और अपनी रिसर्च को मुकाम तक पहुंचाना।
उन्होंने आगे समझाया, तीन मेजर पेलोड विक्रम लैंडर के पास हैं और दो रोवर के पास है। इनकी मदद से ही अगले 14 दिनों तक बहुत सी खोज और एक्सपेरीमेंट किए जाने हैं। ये पूरा डेटा लैंडर की मदद से धरती पर ISRO तक पहुंचेगा। पहले हमारी स्पेस एजेंसी इस डेटा का विश्लेषण करेगी और बाद में, जैसा कि ISRO ने पहले भी कहा था, इसे दुनिया के साथ शेयर भी किया जाएगा।