इनफ्लेशन (Inflation) के मोर्चे पर हालात बेहतर दिख रहे हैं। अक्टूबर में रिटेल इनफ्लेशन (Retail Inflation) घटकर 6.8 फीसदी पर आ गया। सितंबर में यह 7.4 फीसदी था। एक्सपर्ट्स ने अक्टूबर में रिटेल इनफ्लेशन में कमी आने की उम्मीद जताई थी। इसकी वजह बेस इफेक्ट और मोटे अनाज एवं दालों के इनफ्लेशन में आई थोड़ी नरमी है।
हालांकि, सब्जियों की कीमतों में हो रही वृद्धि को लेकर चिंता है। अक्टूबर में बेमौसम बारिश की वजह से सब्जियों की कीमतों में वृद्धि देखने को मिली थी। दरअसल, इस बारिश का सब्जियों के उत्पादन पर असर पड़ा था।
कोर इनफ्लेशन 6 फीसदी पर बना हुआ है। क्लोदिंग एंड फुटवियर, रिक्रिएशन और पर्सनल केयर जैसे इसके प्रमुख कंपोनेंट्स की कीमतें थोड़ी बढ़ी हैं। इससे डिमांड खासकर फेस्टिव सीजन डिमांड बढ़ने के संकेत मिले हैं। ज्यादा आउटपुट कॉस्ट का असर बिक्री मूल्य पर देखने को मिला है।
एक्सपर्ट्स अब मान रहे हैं कि हाई इनफ्लेशन का सबसे खराब दौर अब बीत चुका है। ओमनीसाइंस कैपिचल के सीईओ विकास गुप्ता ने कहा, "CPI और WPI के लेटेस्ट डेटा को देखने से पता चलता है कि इनफ्लेशन के पीक को हम पीछे छोड़ चुके हैं। यहां तक कि अमेरिका में भी इनफ्लेशन के लेटेस्ट डेटा से पता चलता है कि पीक अब बीत चुका है।"
अमेरिका में अक्टूबर में रिटेल इनफ्लेशन घटकर 7.7 फीसदी पर आ गया है। सितंबर में यह 8.2 फीसदी था। इससे यह उम्मीद बंधी है कि इंटरेट्स रेट बढ़ाने की फेडरल रिजर्व की पॉलिसी में अब नरमी आएगी। तेजीमंडी के पोर्टफोलियो मैनेजर राज व्यास ने कहा कि दिसंबर में इंटरेस्ट रेट 75 बेसिस प्वॉइंट्स से कम बढ़ने की उम्मीद है।
कमोडिटी के ग्लोबल प्राइसेज में नरमी का रुख है। इससे इनफ्लेशन में आगे और नरमी आने की उम्मीद है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस फाइनेंशियल ईयर की दूसरी छमाही में इनफ्लेशन घटकर 6.2 फीसदी पर आ सकता है। हालांकि, इनफ्लेशन में नरमी का रुख है, लेकिन सर्विस इनफ्लेशन चौंका सकता है। इस पर करीबी नजर रखने की जरूरत है।
इस बीच, क्रूड ऑयल की कीमतें बहुत अहम हैं। एक्सिस सिक्योरिटीज पीएमएस के पोर्टफोलियो मैनेजर निशित मास्टर का कहना है कि चीन की इकोनॉमी के खुलने या जियोपॉलिटिकल टेंशन की वजह से अगर एनर्जी की कीमतों में अचानक तेजी आती है तो इससे इनफ्लेशन में आ रही नरमी पर ब्रेक लग सकता है।
फर्स्ट वाटर कैपिटल फंड के को-फाउंडर अरुण चुलानी ने कहा कि इनफ्लेशन में आ रही नरमी में चीन में जीरो कोविड पॉलिसी का भी हाथ है। अगर चीन में इकोनॉमी फिर से खुल जाती है तो डिमांड बढ़ेगी, जिसका असर प्राइसेज पर पड़ेगा। इसलिए इनफ्लेशन में नरमी से बहुत ज्यादा खुश होना अभी जल्दबाजी होगी।
IMF, World Bank और OECD ने ग्रोथ को लेकर अपने अनुमान में लगातार कमी की है। इसकी वजह हाई इनफ्लेशन और इकोनॉमिक एक्टिविटी में सुस्ती रही है। वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का असर ग्रोथ पर पड़ा है। इधर, अप्रैल-जून तिमाही में इंडिया की जीडीपी ग्रोथ 13.5 फीसदी रही है। अमेरिका में तीसरी तिमाही में रियल जीडीपी ग्रोथ रेट साल दर साल आधार पर 1.8 फीसदी रही है। इससे पहले लगातार दो तिमाही जीडीपी में कमी देखने को मिली थी।