गामा पहलवान न सिर्फ रूस्तम-ए-हिंद बने थे बल्कि वे रूस्तम-ए-बर्तानिया भी बने। गामा पहलवान का नाम पहले संज्ञा था। बाद में गामा शब्द विशेषण बन गया। किसी की पहलवानी पर सवाल उठाना होता था तो लोग पूछते थे कि क्या तुम ‘गामा’ हो ? कला मर्मज्ञ रायकृष्ण दास ने इसका विवरण विस्तार से लिखा है। प्रयाग में सन 1911 में कुश्ती प्रदर्शनी हुई। वहीं राय कृष्ण दास को गामा की कुश्ती देखने का मौका मिला। अमृतसर में सन 1880 में जन्मे गामा का 22 मई 1963 को लाहौर में निधन हो गया। प्रयाग के दंगल के समय गामा रीवा के महाराज वेंकटेश सिंह की प्रतिपालकता में थे। महाराज भी उस दंगल में आये थे। उस समय गामा पूरे ओज पर थे।
