Get App

गामा पहलवान सिर्फ रुस्तम-ए-हिन्द नहीं बल्कि रुस्तम-ए-बर्तानिया भी थे

गामा पहलवान ने सिर्फ भारत की धरती बल्कि ब्रिटेन में भी कई पहलवानों को शिकस्त दी है, जानिए कब उन्हें रुस्तम -ए-हिन्दऔर रुस्तम-ए-बर्तानिया का खिताब मिला

Surendra Kishoreअपडेटेड Apr 14, 2023 पर 6:38 AM
गामा पहलवान सिर्फ रुस्तम-ए-हिन्द नहीं बल्कि रुस्तम-ए-बर्तानिया भी थे
गामा पहलवान न सिर्फ रूस्तम-ए-हिंद बने थे बल्कि वे रूस्तम-ए-बर्तानिया भी बने

गामा पहलवान न सिर्फ रूस्तम-ए-हिंद बने थे बल्कि वे रूस्तम-ए-बर्तानिया भी बने। गामा पहलवान का नाम पहले संज्ञा था। बाद में गामा शब्द विशेषण बन गया। किसी की पहलवानी पर सवाल उठाना होता था तो लोग पूछते थे कि क्या तुम ‘गामा’ हो ? कला मर्मज्ञ रायकृष्ण दास ने इसका विवरण विस्तार से लिखा है। प्रयाग में सन 1911 में कुश्ती प्रदर्शनी हुई। वहीं राय कृष्ण दास को गामा की कुश्ती देखने का मौका मिला। अमृतसर में सन 1880 में जन्मे गामा का 22 मई 1963 को लाहौर में निधन हो गया। प्रयाग के दंगल के समय गामा रीवा के महाराज वेंकटेश सिंह की प्रतिपालकता में थे। महाराज भी उस दंगल में आये थे। उस समय गामा पूरे ओज पर थे।

दंगल में कई अन्य नरेश भी आये थे। उनके अपने-अपने मंच बने थे। रीवा नरेश की कुर्सी के नीचे की दरी पर गामा बैठे हुए थे। सिर पर मुड़ासा, तन पर पंजाबी कुर्ता और लुंगी। पांच फीट 7 इंच के गामा ऐसे बैठे थे कि शरीर संपत्ति का कोई अनुमान ही नहीं होता था। ऐसा जान पड़ता था कि एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जिसका बदन बना ही नहीं। मुकाबला करीम पहलवान से होना था। कलियुगी भीम प्रोफेसर राम मूर्ति उसके पृष्ठपोषक थे। वह उसको लिए हुए बड़े ठाट-बाट से रंगभूमि में प्रविष्ट हुए।

करीम ने पहले ही से जांघिया चढ़ा रखा था। सारी देह पर सिंदूर पुता था। कदम -कदम पर अकड़-अकड़ कर, छाती एक बार दायीं ओर, फिर एक बार बायीं ओर तानता, या अली, या अली गर्जन करता वह अखाड़े तक पहुंचा। सभी दर्शकों को यह दंभ खल उठा। गामा ने महाराज के चरण छुए। मुड़ासा, कुर्ता और लुंगी उतार कर रख दी। थोड़ा सा दूध जो पहले से ही तैयार था, पीकर दो चार बैठकें लगा कर एक बार जो देह को फुलाया, तो देखते -देखते मृग शावक, मृग राज में परिणत हो गया।

हजारों अपलक आंखें एक संग उस शरीर सौष्ठव का रसास्वादन करने लगी। विनीत भाव से वह अखाड़े में उतरे और पलक मारते ताल ठोक कर दोनों मल्ल गुंथ गये। दांव पेंच के करिश्मे होने लगे जिनमें गामा प्रबल पड़ते जा रहे थे। सबको यही भास हो रहा था कि उन्होंने प्रति मल्ल को अब पछाड़ा। किंतु तभी करीम ने एकाएक अपने शरीर को अखाड़े पर डाल दिया और बहुत विकल ध्वनि में हाय मार डाला, हाय मार डाला की धुन लगा दी। उस क्लाइमेक्स की यह परिणति देख कर सभी को आनंद मिश्रित कुतूहल हुआ।

सब समाचार

+ और भी पढ़ें