भुवन भास्कर

भुवन भास्कर
ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर बवाल मचा है। इंडेक्स के हिसाब से भारत में भयानक भुखमरी है। आयरलैंड की कंसर्न वर्ल्डवाइड और जर्मनी की वेल्ट हंगर हाईलाइफ नाम की दो संस्थाएं हर साल यह इंडेक्स तैयार करती हैं और जारी करती हैं। इसमें विकसित देशों को और बहुत कम जनसंख्या वाले देशों को शामिल नहीं किया जाता, जिसके लिए इन संस्थाओं के पास अपने तर्क हैं। कुल मिलाकर 116-117 देश इनके मानकों के मुताबिक इंडेक्स में शामिल होने के लायक बचते हैं और उन देशों में इस साल भारत का स्थान 101 वां है। पिछले साल (2020) यह 94वां था और उससे पिछले साल (2019) यह 102 नंबर था।
भारत सरकार ने इस इंडेक्स के तैयार किए जाने की पूरी मेथोडोलॉजी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं और इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। जाहिर है, किसी देश में भुखमरी के हालात यदि बने हैं, तो उसके लिए सरकार के अतिरिक्त और कोई जिम्मेदार नहीं हो सकता और इसलिए भारत सरकार की त्वरित और आक्रोशित प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। लेकिन भारत के नागरिक के तौर पर हममें से किसी के लिए भी इंडेक्स में भारत का यूं फिसलना वास्तव में चिंता का विषय है। इसलिए इस इंडेक्स और उसमें भारत की स्थिति को समझने के लिए स्वतंत्र विश्लेषण आवश्यक है।
किसी भी रिपोर्ट की विश्वसनीयता को परखने के दो पैमाने होते हैः उसे बनाने वाले की पृष्ठभूमि और दूसरा, उसे तैयार करने की प्रक्रिया। इस लिहाज से सबसे पहली बात जो इस इंडेक्स के बारे में ध्यान रखनी चाहिए, वह ये कि इसे बनाने वाली ये दोनों ही संस्थाएं गैर-सरकारी हैं। पश्चिमी संस्थाओं में एशिया और विशेषतौर पर भारत के प्रति पूर्वग्रह जगजाहिर है। पूरी दुनिया में मानवाधिकार को बचाने के लिए कथित तौर पर काम करने वाली एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं अक्सर आतंकवादियों के पक्ष में लॉबिंग करने के लिए कुख्यात हैं।
और निजी ही क्यों संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाएं तक फंडिंग के लिहाज से काम करती देखी जाती हैं। दशकों तक अमेरिका की बंधुआ के रूप में काम करने के बाद अब ऐसी वैश्विक बहुपक्षीय संस्थाएं चीन के हर गलत कदम का बचाव करने में आगे दिखती हैं।
चाहे उइगुर मुसलमानों के साथ हो रहा पशुवत व्यवहार हो, तिब्बत में बौद्धों के साथ हुआ और हो रहा भयानक अत्याचार हो या पूरे विश्व को घुटनों पर ला देने वाली कोरोना महामारी के मूल की जांच हो – चीन के खिलाफ किसी वैश्विक संस्था की ओर से एक भी तथ्यपरक रिपोर्ट सामने नहीं आती है।
ऐसे में पहली बात तो यही है कि किसी आयरिश और जर्मन संस्था द्वारा बनाया जाने वाला कोई भी इंडेक्स अंतिम सत्य नहीं हो सकता। लेकिन सिर्फ इसी आधार पर इसे झूठ कहकर खारिज करना भी अतिवाद होगा कि दूसरी कई संस्थाएं वैश्विक प्रोपैगेंडा मशीनरी के हिस्से के तौर पर काम कर रही हैं। फिर समाधान क्या है? समाधान है, इस इंडेक्स को बनाने की प्रक्रिया को समझना।
हंगर इंडेक्स में अंक देने के तीन मोटे पैमाने हैं – अपर्याप्त खाद्य आपूर्ति, बाल मृत्यु दर (5 वर्ष से कम) और बाल कुपोषण। इन तीनों का वेटेज 33.33% है। इनमें बाल कुपोषण को मापने के दो पैमाने है – वेस्टिंग और स्टंटिंग। वेस्टिंग मतलब बच्चे का वजन उम्र के लिहाज से मानक से कितना कम है और स्टंटिंग का मतलब बच्चे की ऊंचाई, उम्र के लिहाज से मानक से कितना कम है। इन दोनों पैमानों का वेटेज 33.33% में आधा-आधा बंटता है।
सवाल यह है कि इन आंकड़ों को जुटाने के लिए कंसर्न वर्ल्डवाइड और वेल्ट हंगर हाईलाइफ ने किन जगहों पर सर्वे किया, किन स्रोतों से आंकड़े जुटाए और किन प्रक्रियाओं से विश्लेषण किया? दरअसल दोनों संस्थाओं ने हंगर इंडेक्स बनाने के लिए न कोई जमीनी सर्वे किया और न ही किसी प्रामाणिक आंकड़े को आधार बनाया है।
इसके लिए आधार बनाया गया है फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) के एक अनुमान को। और फिर उस अनुमान के आधार पर वॉशिंगटन की एक अमेरिकी एनालिटिक्स और एडवाइजरी कंपनी गैलप मैनेजमेंट कंसल्टेंसी कंपनी से टेलीफोनिक सर्वे किए।
गैलप की विशेषज्ञता है पब्लिक ओपिनियन पोल करने की। जी हां, वहीं ओपिनियन पोल, जो हम अपने यहां अलग-अलग विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले टीवी चैनलों में देखते रहते हैं। जिसकी न कोई विश्वसनीयता होती है और न कोई जवाबदेही। यानी अपने आप में इस इंडेक्स का कोई महत्व है ही नहीं।
हालांकि जर्मन गैर सरकारी संस्था ने इस बात का खंडन किया है कि इस पूरी प्रक्रिया का आधार ओपिनियन पोल है, लेकिन उन्होंने न ही यह बताया है कि इसके लिए कहां से आंकड़े लिए गये हैं और न ही इस इंडेक्स को तैयार करने की प्रक्रिया का विवरण जारी किया है।
इसलिए संभावना यही दिखती है कि यह पूरी कवायद फंडिंग की जरूरतों और वैश्विक राजनीतिक प्रतिबद्ताओं से प्रेरित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले एक प्रोपगैंडा का हिस्सा भर है, जिसके लिए न तो स्थापित मानकों का और न ही स्थापित प्रक्रियाओं का पालन किया गया है।
इस इंडेक्स की विश्वसनीयता इसके निष्कर्षों से भी जाहिर है। सूचकांक में भारत से नीचे मौजूद 15 देशों के नामों पर नजर डालिए। पापुआ न्यू गिनी (102), अफगानिस्तान और नाइजीरिया (103), कॉन्गो (105), मोजाम्बिक और सिएरा लियोन (106), तिमोर-लेस्ते (108), हैती (109), लाइबेरिया (110), मेडागास्कर (111), डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो (112), चाड (113), सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक (114), यमन (115) और सोमालिया (116)। इस सूचकांक में पाकिस्तान 92वें, नेपाल, बंगलादेश 76वें और श्रीलंका 65वें स्थान पर हैं।
भारत ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर जताई आपत्ति, कहा- अवैज्ञानिक पद्धति से तैयार की गई रिपोर्ट
अब बात कर लेते हैं कॉमन सेंस की। भारत को अफगानिस्तान, नाइजीरिया और कॉन्गो के स्तर पर रखने वाले इस हंगर इंडेक्स को बनाने में न कॉमन सेंस का इस्तेमाल किया गया है और न ही आसानी से उपलब्ध आर्थिक आंकड़ों का। आप खाने-पीने पर कितना खर्च कर सकते हैं, यह दो बातों पर निर्भर करता है।
पहला, आपकी आमदनी कितनी है और दूसरा, आपके इर्द-गिर्द खाने-पीने की चीजों का मूल्य क्या है? यानी हंगर इंडेक्स तय करने के पहले दो कारक, खाद्य आपूर्ति और कुपोषण (यानी भोजन के माध्यम से पर्याप्त पौष्टिकता न मिल पाना) समझने के लिए प्रति व्यक्ति आय और खाद्य महंगाई दर (फूड इनफ्लेशन) को देखना चाहिए। आइए देखते हैं।
विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 2020 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 1900.7 अमेरिकी डॉलर सालाना थी। पाकिस्तान में यह 1193.7, नेपाल में 1155.1, बंगलादेश में 1968.8 और श्रीलंका में 3682 अमेरिकी डॉलर सालाना है। महंगाई देखते हैं। भारत में जून 2021 में खाद्य महंगाई दर 1% से कम थी।
पाकिस्तान में 2020-21 के दौरान यह आंकड़ा करीब 16% था। बंगलादेश में 5.34%, नेपाल में 4.64% की दर से खाद्य महंगाई बढ़ रही है और श्रीलंका में अगस्त 2021 में खाद्य महंगाई पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 11.5 प्रतिशत बढ़ी। तीसरे मानक, बाल मृत्यु दर का आंकड़ा भी देख लीजिए। 2019 के आंकड़े के मुताबिक पाकिस्तान में शिशु मृत्यु प्रति 1000 पर 55.7 थी, नेपाल में यह 30.8 थी, जबकि भारत में 28.3 थी।
इनके अलावा, भारत सरकार ने पिछले साल कोरोना के पीक पर 80 करोड़ लोगों को खाद्यान्न वितरण किया। मनरेगा में तमाम कमियों के बावजूद इसे विश्व की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना के तौर पर मान्यता मिली हुई है। भारत का PDS सिस्टम अपनी तमाम खामियों के बावजूद समाज के अंतिम व्यक्ति तक राशन पहुंचाता है और इसे जानने के लिए हमें किसी विश्व बैंक, FAO या यूनिसेफ की रिपोर्ट की दरकार नहीं है। छत्तीसगढ़ के धुर वनवासी गांवों तक में इस लेखक ने PDS के तहत लोगों को अनाज मिलते जाना है।
इन आसानी से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर बहुत आसानी से यह समझा जा सकता है कि पाकिस्तान को इंडेक्स में 92वां स्थान और भारत को 101वां स्थान देने वाले इस हंगर इंडेक्स की विश्वसनीयता संदिग्ध है।
अलबत्ता, रिपोर्ट को खारिज करने के बाद भी इस बात से आंखें मूंद लेना गलत होगा कि हमारे देश में करोड़ों बच्चे पौष्टिक भोजन से वंचित हैं। ऐसी वैश्विक रिपोर्टों से विचलित हुए बिना सरकार को अपने बच्चों, महिलाओं, वृद्धों और अन्य जरूरतमंदों की सिर्फ भूख मिटाने से आगे बढ़कर उन्हें एक पुष्ट और मजबूत नागरिक बनाने के लिहाज से नीतियां बनाने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त को लाल किले से दिए गये भाषण में PDS के अनाज को "फोर्टिफायड" करने की जो घोषणा की गई है, वह आश्वस्त करती है कि हम एक देश के तौर पर सही दिशा में बढ़ रहे हैं।
(लेखक आर्थिक और कृषि मामलों के जानकार हैं)
सोशल मीडिया अपडेट्स के लिए हमें Facebook (https://www.facebook.com/moneycontrolhindi/) और Twitter (https://twitter.com/MoneycontrolH) पर फॉलो करें।
हिंदी में शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट न्यूज़, बिजनेस न्यूज़, पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App डाउनलोड करें।