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Global Hunger Index की रिपोर्ट पर बवाल मचा है लेकिन रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर चुप्पी क्यों?

भारत सरकार ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं और इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है

MoneyControl Newsअपडेटेड Oct 18, 2021 पर 12:47 PM
Global Hunger Index की रिपोर्ट पर बवाल मचा है लेकिन रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर चुप्पी क्यों?

भुवन भास्कर

ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर बवाल मचा है। इंडेक्स के हिसाब से भारत में भयानक भुखमरी है। आयरलैंड की कंसर्न वर्ल्डवाइड और जर्मनी की वेल्ट हंगर हाईलाइफ नाम की दो संस्थाएं हर साल यह इंडेक्स तैयार करती हैं और जारी करती हैं। इसमें विकसित देशों को और बहुत कम जनसंख्या वाले देशों को शामिल नहीं किया जाता, जिसके लिए इन संस्थाओं के पास अपने तर्क हैं। कुल मिलाकर 116-117 देश इनके मानकों के मुताबिक इंडेक्स में शामिल होने के लायक बचते हैं और उन देशों में इस साल भारत का स्थान 101 वां है। पिछले साल (2020) यह 94वां था और उससे पिछले साल (2019) यह 102 नंबर था।

भारत सरकार ने इस इंडेक्स के तैयार किए जाने की पूरी मेथोडोलॉजी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं और इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। जाहिर है, किसी देश में भुखमरी के हालात यदि बने हैं, तो उसके लिए सरकार के अतिरिक्त और कोई जिम्मेदार नहीं हो सकता और इसलिए भारत सरकार की त्वरित और आक्रोशित प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। लेकिन भारत के नागरिक के तौर पर हममें से किसी के लिए भी इंडेक्स में भारत का यूं फिसलना वास्तव में चिंता का विषय है। इसलिए इस इंडेक्स और उसमें भारत की स्थिति को समझने के लिए स्वतंत्र विश्लेषण आवश्यक है।

किसी भी रिपोर्ट की विश्वसनीयता को परखने के दो पैमाने होते हैः उसे बनाने वाले की पृष्ठभूमि और दूसरा, उसे तैयार करने की प्रक्रिया। इस लिहाज से सबसे पहली बात जो इस इंडेक्स के बारे में ध्यान रखनी चाहिए, वह ये कि इसे बनाने वाली ये दोनों ही संस्थाएं गैर-सरकारी हैं। पश्चिमी संस्थाओं में एशिया और विशेषतौर पर भारत के प्रति पूर्वग्रह जगजाहिर है। पूरी दुनिया में मानवाधिकार को बचाने के लिए कथित तौर पर काम करने वाली एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं अक्सर आतंकवादियों के पक्ष में लॉबिंग करने के लिए कुख्यात हैं।

और निजी ही क्यों संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाएं तक फंडिंग के लिहाज से काम करती देखी जाती हैं। दशकों तक अमेरिका की बंधुआ के रूप में काम करने के बाद अब ऐसी वैश्विक बहुपक्षीय संस्थाएं चीन के हर गलत कदम का बचाव करने में आगे दिखती हैं।

चाहे उइगुर मुसलमानों के साथ हो रहा पशुवत व्यवहार हो, तिब्बत में बौद्धों के साथ हुआ और हो रहा भयानक अत्याचार हो या पूरे विश्व को घुटनों पर ला देने वाली कोरोना महामारी के मूल की जांच हो – चीन के खिलाफ किसी वैश्विक संस्था की ओर से एक भी तथ्यपरक रिपोर्ट सामने नहीं आती है।

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