अगर समान कार्य, समान वेतन का सिद्धांत एक मजाक की बात है तो इसके लिए शहरों और गांवों के बीच की तुलना करने की जरूरत नहीं है। इसका एक बड़ा उदाहरण सुप्रीम कोर्ट के जज को मामलों की सुनवाई और फैसला करने के लिए मिलने वाले एक महीने के वेतन की तुलना में एक सीनियर एडवोकेट को बहस करने के लिए मिलने वाली फीस से मिलता है।

सुप्रीम कोर्ट के जज को लगभग 2.5 लाख रुपये प्रति माह का वेतन मिलता गहै, जो लगभग 8,333 रुपये प्रति दिन होता है। सुप्रीम कोर्ट के जज को प्रति दिन औसत 40 मामलों में वकीलों की दलीलें सुननी होती हैं। यह 208 रुपये प्रति मामला बनता है, चाहे यह एक साधारण अपील हो, एक जनहित याचिका या कानून के जटिल पहलुओं से जुड़ी बहस।

इसके विपरीत, एक नए सीनियर एडवोकेट को एक मामले में बहस के लिए 1 से 5 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है। अनुभवी सीनियर एडवोकेट्स की प्रति सुनवाई फीस 10-20 लाख रुपये होती है। इनमें कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे जैसे मशहूर वकील शामिल हैं।

इस लिहाज से एक मामले की सुनवाई और फैसला करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज को प्रति दिन प्रति मामला 208 रुपये, जबकि सीनियर एडवोकेट्स को प्रति दिन प्रति मामला लाखों रुपये मिलते हैं। हालांकि, ये वकील किसी मामले के फैसले की गारंटी नहीं ले सकते।

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सीनियर एडवोकेट्स में से कोई भी एक दिन में 40 ममामलों में बहस नहीं करता, जबकि सुप्रीम कोर्ट के जज को हर दिन इतने मामलों की अगले दिन होने वाली सुनवाई के लिए तैयारी करनी होती है।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट के बहुत से जज अपनी रिटायरमेंट का इंतजार करते हैं, जिससे वे आब्रिट्रेटर के तौर पर अपनी कानूनी विशेषज्ञता की पेशकश करे सकें या मल्टीनेशनल कंपनियों को देश में उनके कॉन्ट्रैक्ट्स, एग्रीमेंट्स से जुड़े विवादों पर राय उपलब्ध करा सकें।

सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज को आब्रिट्रेटर के तौर पर दो घंटे की सुनवाई के लिए 2-5 लाख रुपये मिलते हैं। ऐसे भी रिटायर्ड जज हैं तो एक दिन में तीन सुनवाई कर एक सफल सीनियर एडवोकेट के बराबर आमदनी हासिल करते हैं।

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