बेडरूम में कोर्ट की नो एंट्री, मैरिटल रेप पर अदालत के दखल से सरकार को गुरेज क्यों !

Marital rape : सरकार ने कहा है कि ये मुद्दा कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक है और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। सभी स्टेकहोल्डर्स से चर्चा किए बिना इस पर फैसला नहीं लिया जा सकता। केंद्र सरकार ने एक हलफनामा दायर करके ये कह दिया है कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की जरूरत नहीं है

अपडेटेड Oct 05, 2024 पर 1:31 PM
2019 तक 150 देशों में मैरिटल रेप अपराध घोषित किया है। भारत समेत 34 देशों में मैरिटल रेप अपराध नहीं है

मैरिटल रेप यानि शादी के बाद पत्नी की इजाजत के बिना पति द्वारा जबरन शारीरिक संबंध बनाना। इसे अपराध माना जाए या नहीं, इसे लेकर सरकार और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने हैं। मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने की मांग कई सालों से उठ रही है। लेकिन अब जब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है, तो केंद्र सरकार ने एक हलफनामा दायर करके ये कह दिया है कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की जरूरत नहीं है। सरकार ने कहा है कि ये मुद्दा कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक है और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। सभी स्टेकहोल्डर्स से चर्चा किए बिना इस पर फैसला नहीं लिया जा सकता। मामला शादीशुदा महिलाओं की मर्जी का है और गंभीर है। इसके पक्ष में और खिलाफ तरह-तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। मैरिटल रेप को अपराध माना जाए या नहीं इसी मुद्दे सीएनबीसी-आवाज़ के खास शो आवाज़ अड्डा पर हुई एक खास चर्चा।

सरकार मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने के विरोध में

मैरिटल रेप पर सरकार ने SC में हलफनामा दाखिल करते हुए मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग का विरोध किया है। सरकार का कहना है कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की जरूरत नहीं। इसके लिए भारतीय कानून में कई अन्य सजाएं मौजूद हैं। सरकार का कहना है कि ये मुद्दा कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। स्टेकहोल्डर्स से चर्चा किए बिना फैसला नहीं लिया जा सकता


मैरिटल रेप पर SC में सरकार की दलील

सरकार का कहना है कि शादी एक संस्था है। पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ शारीरिक संबंध तक सीमित नहीं है। संसद ने IPC की धारा 375 में मैरिटल रेप को अपवाद माना है। कोर्ट को इसे खारिज नहीं करना चाहिए। शादी के बाद भी महिला की सहमति खत्म नहीं होती। पति को पत्नी की मर्जी के बिना संबंध बनाने का अधिकार नहीं है। पत्नी की मर्जी के बिना संबंध बनाना दंडनीय अपराध होना चाहिए। वैवाहिक संबंधों को रेप के समान बताना अनुचित होगा।

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महिलाओं पर किया बोली सरकार?

सरकार ने कहा कि वह महिलाओं की स्वतंत्रता, गरिमा, अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा, अपराधों को खत्म करना प्राथमिकता है। इसमें शारीरिक, यौन, मौखिक और घरेलू हिंसा शामिल है।

मैरिटल रेप और कानून

पत्नी की इजाजत के बिना जबरन शारीरिक संबंध बनाना मैरिटल रेप माना जाता है। मैरिटल रेप को पत्नी के खिलाफ घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न माना जाता है। BNS (भारतीय न्याय संहिता) की धारा 63 के अपवाद 2 के मुताबिक मैरिटल रेप अपराध नहीं है। IPC की धारा 354, 354A, 354B, 498A में प्रावधान में भी इसके खिलाफ प्रावधान हैं। इस अलावा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 भी अस्तित्व में है। ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान

किन देशों में मैरिटल रेप अपराध?

1922 में मैरिटल रेप को सोवियत संघ ने अपराध घोषित किया। 1932 में पोलैंड ने इसे अपराध घोषित किया। 1991 में ब्रिटेन ने मैरिटल रेप को अपराध घोषित किया। 1993 में अमेरिका ने इसे अपराध घोषित किया। 2019 तक 150 देशों में मैरिटल रेप अपराध घोषित किया है। भारत समेत 34 देशों में मैरिटल रेप अपराध नहीं है।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं ने BNS की धारा 63 से अपवाद हटाने के लिए तर्क दिए हैं। उनका कहना है कि ये समानता, गरिमापूर्ण जीवन, सेक्सुअल फ्रीडम के अधिकारों के खिलाफ है। मैरिटल रेप को अपराध नहीं मानना अंतर पैदा करता है। ये विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच अंतर पैदा करता है। कानून में ये प्रावधान संविधान लागू होने से पहले जोड़ा गया। अब इस प्रावधान की जरूरत नहीं।

SC कैसे पहुंचा मामला?

मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग करते हुए पहली याचिका 2015 में दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की गई। 2016 में सरकार ने मैरिटल रेप के विचार को खारिज कर दिया। 2017 में केंद्र सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दायर किया। इस पर पिछले 2 सालों में 2 हाई कोर्ट के फैसले आए हैं। इसके अलावा दिल्ली HC और कर्नाटक HC के फैसले भी आए हैं। मई 2022 में दिल्ली HC के 2 जजों ने अलग-अलग फैसला दिया। मार्च 2023 में कर्नाटक HC का फैसला आया। इसमें पति पर लगाए गए रेप के आरोपों को खत्म करने से इनकार किया गया। अब मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने की मांग फिर तेज हुई है। इसके लिए याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की है।

 

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