Assembly Election 2022: अपर्णा यादव, इमरान मसूद से लेकर हरक सिंह रावत तक, पार्टी बदलने वाले इन नेताओं को अब भी है टिकट का इंतजार
BJP के खेमे में यह कहा जा रहा है कि अपर्णा यादव को भले ही टिकट न मिले, लेकिन चुनाव के बाद उन्हें MLC का उम्मीदवार बनाया जा सकता है
MoneyControl News
अपडेटेड Feb 04, 2022 पर 2:08 PM
पार्टी बदलने वाले इन नेताओं को अब भी है टिकट का इंतजार
Assembly Election 2022: चुनाव से ठीक पहले एक पार्टी से दूसरी पार्टियों में कूदना टिकट चाहने वालों के लिए एक पुरानी बात है। यह ठीक उसी तरह है, जब कोई बेहतर करियर की संभावना के लिए एक कंपनी से दूसरी कंपनी में जाता है, लेकन क्या होता है अगर आप किसी कंपनी से इस्तीफा दे देते हैं लेकिन नई कंपनी आपको वह नौकरी नहीं देती, जिसकी आप तलाश कर रहे थे?
उत्तराखंड में हरक सिंह रावत और उत्तर प्रदेश में इमरान मसूद और अपर्णा यादव जैसे प्रमुख नेता इन बातों को अच्छे से समझते होंगे, क्योंकि वे दूसरी पार्टियों में चले तो गए हैं, लेकिन अभी भी अपनी नई पार्टी की तरफ से टिकट मिलने को लेकर कोई आश्वासन नहीं मिला है।
इस तरह की कूद-फांद करने वालों की एक और कैटेगरी होती है, जिन्हें अपनी वर्तमान नौकरी में अच्छा प्रमोशन और अप्रेजल मिलता है लेकिन फिर भी वे उसी नौकरी के लिए अपनी कंपनी बदलते हैं।
कांग्रेस से सुप्रिया आरोन और हैदर अली खान इसी कैटेगरी में आते हैं। सुप्रिया को बरेली और हैदर को रामपुर से टिकट मिल चुका था, लेकिन फिर भी वे समाजवादी पार्टी और NDA सहयोगी अपना दल में कूद गए, यह सोचते हुए कि शायद उनके पास जीतने का एक बेहतर मौका है। इसी के साथ हैदर अली UP में NDA के पहले मुस्लिम उम्मीदवार बन गए।
पंजाब में कादियां विधायक फतेह सिंह बाजवा कांग्रेस के उनके भाई प्रताप सिंह बाजवा को टिकट देने का फैसला करने के बाद BJP में कूद गए। BJP और सपा के वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने News18.com को बताया कि आखिरी पलों में बदलाव के कारण चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। जैसे सहारनपुर में कांग्रेस के मुख्य चेहरे इमरान मसूद को जिस सीट से टिकट चाहिए था, वो उन्हें सपा-RLD खेमे से नहीं मिल पाई।
मसूद सहारनपुर की नकुर सीट से चुनाव लड़ते हैं, लेकिन सपा के पास पहले से ही उस सीट पर धर्म सिंह सैनी एक उम्मीदवार थे, जिससे मसूद पिछले चुनाव में हार गए थे। सैनी, जो तब BJP के टिकट पर जीते थे और मंत्री थे, अब सपा के साथ हैं और उन्हें मसूद पर तरजीह दी गई थी। इसलिए कई बार नई जॉइनिंग भी कंपनी के पुराने कर्मचारियों को नुकसान पहुंचा देती है।
वहीं BJP के खेमे में यह कहा जा रहा है कि यादव परिवार की बहू अपर्णा यादव को भले ही टिकट न मिले, लेकिन चुनाव के बाद उन्हें MLC का उम्मीदवार बनाया जा सकता है। लखनऊ छावनी सीट से मौजूदा BJP विधायक, जहां से यादव ने पिछली बार सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, उन्होंने घोषणा की है कि उन्हें वहां टिकट फिर से मिलेगा और अपर्णा यादव चुनाव नहीं लड़ेंगी।
अब अगर अपर्णा को वहां से टिकट नहीं मिलता है, तो समाजवादी पार्टी का कहेगी, "हमने आपसे पहले ही कहा था।" सपा का मानना है कि अपर्णा को मुख्य रूप से यादव परिवार को शर्मिंदा करने के लिए शामिल किया गया था।
उत्तराखंड के हरक सिंह रावत का मामला और भी पेचीदा है। उन्होंने BJP छोड़ दी क्योंकि उन्हें कथित तौर पर कोटद्वार या केदारनाथ से अपने लिए, लैंड्सडाउन से अपनी बहू अनुकृति के लिए और एक दूसरे सहयोगी के लिए तीन टिकट चाहिए थे।
BJP की तरफ से 'एक परिवार-एक टिकट' नियम का हवाला देने के बाद, नाराज रावत वापस कांग्रेस में चले गए, जहां अब तक भी उनकी स्थिति साफ नहीं है।
BJP की तरफ से उन्हें बर्खास्त करने और कांग्रेस की तरफ से आधिकारिक रूप से उनका स्वागत नहीं करने के एक हफ्ते के बाद रावत अब लैंड्सडाउन से अपनी बहू अनुकृति के लिए टिकट के साथ समझौता कर चुके हैं, जिसकी घोषणा सोमवार को की गई थी।
अब देखना यह होगा कि इन नेताओं को अगर अब भी टिकट नहीं मिलता है, तब यह क्या करेंगे? और आखिर कितनी समय के लिए ये अपनी नई पार्टी के प्रति वफादार रहेंगे?