हरियाणा विधानसभा चुनाव का ऐलान होते ही सभी दलों ने उम्मीदवारों के चयन के लिए अलग-अलग प्रक्रिया शुरू कर दी हैं। हालांकि, भारत में छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा चुनाव जातीय समीकरण के बिना जीतना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। यही कड़वी सच्चाई है। इस चुनाव में भी पार्टियों के लिए अपने उम्मीदवारों का नाम फाइनल करना इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि कई समुदाय और जाति-आधारित संगठनों ने अपने-अपने नेताओं के लिए पैरवी शुरू कर दी है। राजनीति के जानकार बताते हैं कि अगर आपको किसी पार्टी से चुनाव का टिकट चाहिए, तो उसके लिए केवल राजनीतिक अनुभव और छवि ही काम नहीं आएगी, बल्कि किसी समुदाए का समर्थन भी जरूरी है।
वह आगे कहते हैं कि साथ ही उस जाति या समुदाय का दबाव भी किसी एक खास पार्टी पर होना चहिए तभी आपको टिकट मिल सकता है।
जितना ज्यादा वोट उतना ज्यादा दबाव
विशेषज्ञ कहते हैं कि भले ही अलग-अलग पार्टियों का सिलेक्शन करने का तरीका अलग है और उन्होंने औपचारिक आवेदन भी लिए हैं, लेकिन समुदाय और जातीय समूहों की ओर से उठाई गई मांग और पार्टी आलाकमान या नेतृत्व पर उनका दबाव टिकट तय करने में अहम भूमिका निभाता है।
किसी समुदाय का वोट प्रतिशत जितना ज्यादा होगा, दबाव उतना ही ज्यादा होगा। जबकि हर एक समुदाय में कम से कम दो या तीन संगठन या ग्रुप होते हैं, इनमें से कुछ चुनाव के दौरान एक्टिव हो जाते हैं, क्योंकि वे इसे राजनीतिक स्तर पर अपने प्रतिनिधित्व को मजबूत करने के मौके की तरह देखते हैं।
सत्ता के गलियारों में चाहते हैं अपना प्रभाव
The Tribune के मुताबिक, राजनीतिक विश्लेषक देविंदर सिंह सुरजेवाला कहते हैं, "ब्राह्मण सभा, गौड़ ब्राह्मण सभा, जाट महासभा, गुर्जर महासभा, महाराजा अग्रसेन सभा (वैश्य), पंजाबी महासभा, राजपूत सभा और अंबेडकर सभा के बैनर तले कई संगठनों की मौजूदगी लगभग हर जिले में है।"
वह इस बात पर जोर देते हैं कि ऐसे संगठन सत्ता के गलियारों में अपना प्रभाव या भागीदारी बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन वे अलग-अलग माध्यमों से वरिष्ठ नेताओं या पार्टी आलाकमानों के सामने अपनी मांगों को उठाते हैं।
समुदायों का असर एक बड़ा फैक्टर
यह दावा करते हुए कि समुदायों का असर एक बड़ा फैक्टर रहा है, पूर्व विधायक, शारदा राठौड़ का कहना है कि यह समाज के सभी वर्गों का समर्थन है, जो किसी भी उम्मीदवार के भाग्य का फैसला करता है, और यह अच्छा है अगर किसी समूह की ओर से ऐसी मांग उठाई जाती है।
छोटे लेवल पर, जाट समुदाय के रावत और डागर पाल (खाप) कथित तौर पर पलवल जिले में पड़ने वाले हथीन खंड में हर पांच साल के बाद वैकल्पिक रूप से अपने गोत्र से जुड़े उम्मीदवारों का समर्थन करने पर सहमत हुए हैं।
एक विश्लेषक ने कहा कि पिछली बार जहां डागर थे, वहीं इस बार रावत पाल को यहां से मौका मिलना तय है। पता चला है कि पंजाबी समुदाय के एक संगठन ने NIT विधानसभा क्षेत्र से अपने उम्मीदवारों के चयन की मांग कांग्रेस से उठाई है।
हाल ही में यहां भोजपुरी-अवधी समुदाय के संघ की ओर से आयोजित प्रवासी सम्मेलन, जिसमें कांग्रेस नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा चीफ गेस्ट थे। ये भी इस तरह का एक उदाहरण है, क्योंकि प्रवासियों ने अलग-अलग स्तरों पर प्रतिनिधित्व सहित अलग-अलग मांगें उठाई हैं। हुड्डा ने भी ये माना है कि शहर और राज्य के विकास में प्रवासियों का बड़ा रोल है।