वरिष्ठ अधिकारी पी.एस.अप्पू ब्यूरोक्रेसी में सुधार की इच्छा लिए सन 2012 में गुजर गए। वे मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी के निदेशक और बिहार के मुख्य सचिव रह चुके थे।
वरिष्ठ अधिकारी पी.एस.अप्पू ब्यूरोक्रेसी में सुधार की इच्छा लिए सन 2012 में गुजर गए। वे मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी के निदेशक और बिहार के मुख्य सचिव रह चुके थे।
उनका देहांत सन 2012 में हुआ। उनके अनुसार सन 1973-74 में ही केंद्रीय प्रशासन में गिरावट दिखनी शुरू हो गई थी। IAS जमात को कभी स्टील फ्रेम ब्यूरोक्रेसी कहा जाता था। लेकिन अब तो जानकारों का मानना है कि अपवादों को छोड़कर स्टील फ्रेम बुरी तरह जंगग्रस्त हो चुका है।
सन 2005 में लिखे गए अपने लेख में दिवंगत पी.एस.अप्पू ने कहा था कि कि सन 1973-74 में कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने एक प्रतिबद्ध अफसरशाही की जरूरत पर लगातार बल दिया गया था। बिहार और गुजरात की सरकारों ने वहां के जन आंदोलनों को बलपूर्वक नियंत्रित किया। इससे स्थिति बिगड़ती गई।
सन 1951 बैच के IAS अधिकारी पी.एस.अप्पू का जब निधन हुआ तब वे 83 साल के थे। वे ईमानदार अफसरों के रोल माॅडल रहे। उच्चस्तरीय ब्यूरोक्रेसी में आ रही तेज गिरावट को लेकर अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे काफी चिंतित रहा करते थे। पूरे सेवा काल में उसूलों के साथ जिये अप्पू ने नौकरशाही में सुधार के कई उपाय बताये थे।
अप्पू के अनुसार, इंदिरा गांधी की सरकार तेजी से लोकप्रियता और नैतिक जवाबदेही खोने लगी।
मंत्री परिषद में योग्य,चरित्रवान और दूरदर्शी लोगों की अनुपस्थिति हो गई। चंद स्वार्थी लोगों के एक समूह ने अवैध तरीके से राजनीतिक शक्ति का दुरूपयोग करना शुरू कर दिया। इन सब का बुरा परिणाम प्रशासन पर पड़ा। इस बीच इमरजेंसी से प्रशासन को गहरा धक्का लगा।
इमरजेंसी के दौरान हमारी संघात्मक शासन व्यवस्था के सभी महान और महत्वपूर्ण अंगों के साथ खिलवाड़ किया गया। जिन महत्वपूर्ण संस्थाओं पर हमले किये गये,उनमें संसद और राज्य विधान सभाएं, कैबिनेट प्रणाली, न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी और प्रेस प्रमुख थे। व्यवस्था की निगहबानी करने वाली संस्थाओं और प्रावधानों को तार-तार कर दिया गया।
पूरी इमरजेंसी के दौरान एक छोटे समूह ने एक तरह से सत्ता हथिया ली। और वे लोग संविधानेत्तर शासक बन बैठे।सत्ता का भारी दुरूपयोग हुआ। किसी भी मंत्री या नौकरशाह ने इमरजेंसी का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटाई। हालांकि उन दिनों भी कुछ अफसर ऐसे थे जो पीड़ा से भर गये। और कइयों के लिए असहनीय भी हो गया।
लेकिन दूसरी ओर बड़ी संख्या में IAS और IPS ने पूरे उत्साह के साथ तानाशाही व्यवस्था से हाथ मिलाकर काम किया। संविधान की भावना की धज्जियां उड़ाते हुए और कानून को ताक पर रखते हुए ऐसे अधिकारियों ने इस व्यवस्था के अवैध आदेशों को खुशी से कबूल कर उन्हें अंजाम दिया। सुप्रीम कोर्ट के जिस जज जे.सी.शाह ने इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों की सुनवाई की थी, उनका मानना था कि हरियाणा के मुख्य मंत्री बंसी लाल ने सत्ता का दुरूपयोग किया था और वह मध्ययुगीन तानाशाह की भांति काम कर रहे थे।
सन 1977 के चुनाव में कांग्रेस की शर्मनाक हार हुई। उसकी जगह जनता पार्टी सत्ता में आई जो परस्परविरोधी विभिन्न राजनीतिक समूहों का एक कमजोर गठबंधन थी। यद्यपि संसद और कैबिनेट प्रणाली आदि संस्थाओं को फिर से मजबूती मिली,लेकिन दो साल पूरे करते ही जनता सरकार अपने ही बोझ तले गिर गई। सन 1980 में इंदिरा गांधी की पुनर्वापसी ने यह सुनिश्चित कर दिया कि हमारी संघात्मक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंगों को पुरानी स्थिति में नहीं लाया जा सकता है।
बाद के वर्षों में भ्रष्टाचार,अपराधीकरण और चुनाव संबंधी गड़बड़ियों में और भी तेजी से इजाफा हुआ।
अप्पू के अनुसार, हालांकि प्रधान मंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने इन समस्याओं से निबटने में फुर्ती दिखाई, लेकिन वे भी इस संड़ाध को दूर करने में कामयाब नहीं हुए और उन्होंने बाद में परिस्थितियों से समझौता कर लिया। बाद की केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अपनाई गई दोषपूर्ण कार्मिक नीतियों के परिणामस्वरूप देश का लोक प्रशासन पंगु हो गया।
नागरिकों के जीवन और संपत्तिसंबंधी सुरक्षा पर भी आंच आने लगी। अप्पू ने लिखा कि मेरठ और भागलपुर के भयावह सांप्रदायिक दंगों ने नागरिक और पुलिस प्रशासन के पूर्वाग्रहों, उनकी लापारवाही, काहिली और अकर्मण्यता की पोल खोल कर रख दी। जब दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद सिख विरोधी दंगे शुरू हो गये तो उस समय भी प्रशासन इसे रोकने में अक्षम और नकारा साबित हुआ।
बाबरी मस्जिद के विध्वंस की घटना ने प्रशासन में हो रही तीव्र गिरावट को नया बल प्रदान किया।
संविधान में अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों को काफी संरक्षण मिला हुआ है। अफसरों को निर्भीकतापूर्वक काम की आजादी के सिलसिले में सरदार पटेल ने 10 अक्तूबर 1949 को संविधान सभा में कहा था कि आज मेरा सचिव मेरे विचार के विपरीत नोट लिख सकता है।
मैंने सभी सचिवों को बता दिया है कि यदि वे अपनी ईमानदार और सही राय इस आधार पर नहीं देते कि मंत्री नाराज हो जाएंगे, तो बेहतर होगा कि वे इस्तीफा दे दें। खुद पी.एस.अप्पू ने अप्रैल 1978 में बिहार के मुख्य सचिव के पद से इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि तत्कालीन कर्पूरी ठाकुर मंत्रिमंडल उन्हें सही काम करने नहीं दे रहा था।
इससे पहले जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध मुख्य सचिव बनाया था तो अप्पू ने मुख्य मंत्री के समक्ष कुछ शर्तें रखी थीं। मुख्यमंत्री ने तब तो शर्तें मान लीं। पर मुख्य मंत्री सुशासन के लिए अपने मंत्रिमंडल के अधिकतर सदस्यों को मना नहीं सके। मंत्रियों की गलत मांगों को मुख्य मंत्री ठुकरा नहीं पाते थे। इससे ऊब कर अप्पू ने मुख्य सचिव पद छोड़ दिया। अप्पू ने प्रशासन में गिरावट को रोकने के लिए उसमें बड़े बदलाव की सलाह दी थी जिसे बाद की किसी सरकार ने स्वीकार नहीं किया।
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