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इमरजेंसी में लोगों को जीने तक का अधिकार नहीं दिया था इंदिरा गांधी सरकार ने

तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने 25 जून, 1975 को इमरजेंसी लगाकर पूरे देश को एक बड़ी जेल में बदल दिया गया था। आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। यहां तक कि जीने का अधिकार भी स्थगित था। 23 मार्च, 1977 को ही आपातकाल को समाप्त किया जा सका था जब आम चुनाव के बाद केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी

Surendra Kishoreअपडेटेड Jul 01, 2023 पर 11:26 AM
इमरजेंसी में लोगों को जीने तक का अधिकार नहीं दिया था इंदिरा गांधी सरकार ने
तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी गद्दी बचाने के लिए सन 1975-77 में इस देश के लोकतंत्र को किस तरह ध्वस्त किया था, उसका एक छोटा नमूना प्रस्तुत है

आपातकाल (सन 1975-77) में केंद्र सरकार के एटर्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट में साफ-साफ यह कह दिया था कि "यदि स्टेट आज किसी की जान भी ले ले तो भी उसके खिलाफ कोई व्यक्ति कोर्ट की शरण नहीं ले सकता। क्योंकि ऐसे मामलों को सुनने के कोर्ट के अधिकार को स्थगित कर दिया गया है।" याद रहे कि अंग्रेजों के राज में भी जीने का अधिकार नहीं छीना गया था। आज कुछ नेता यह कह देते हैं कि देश में आपातकाल जैसे हालात बन गए हैं। दरअसल तब के आपातकाल के असली हालात से वे पूरी तरह अनजान हैं।

तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी गद्दी बचाने के लिए सन 1975-77 में इस देश के लोकतंत्र को किस तरह ध्वस्त किया था,उसका एक छोटा नमूना प्रस्तुत है। आम लोगों के जीने का अधिकार तक छीन लेने के साथ-साथ प्रतिपक्षी नेताओं सहित लाखों लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया था। उन्हें अदालत की शरण लेने की भी कानूनी सुविधा नहीं थी। हालांकि इमरजेंसी में जीने तक का हक छीन लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तो सन 2011 में अपनी गलती मान ली। पर, तब की सत्ताधारी पार्टी यानी कांग्रेस या उसके नेतृत्व ने आज तक यह काम नहीं किया।

भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने मई, 2015 में कहा था कि "चार दशक पहले आपातकाल लागू करना कांग्रेस सरकार की भयानक गलती थी। इसके लिए सोनिया गांधी या राहुल गांधी को देश से माफी मांगनी चाहिए।" सुप्रीम कोर्ट ने गत 2 जनवरी, 2011 को यह स्वीकार किया कि देश में आपातकाल के दौरान इस कोर्ट से भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था।

न्यायमूर्ति आफताब आलम और जस्टिस अशोक कुमार गांगुली के खंड पीठ ने उस समय की अदालती भूल को स्वीकार किया। आज तो भ्रष्टाचार के आरोपों में लिप्त किसी नेता के खिलाफ जब अदालत कार्रवाई करती है तो नेता कहते हैं कि संविधान खतरे में है। अदालत भी सरकार के प्रभाव में हैं। यानी, नयी पीढ़ी के सामने आपातकाल शब्द को नये ढंग से पेश किया जा रहा है।पर असली आपातकाल क्या था,उसे जानने के लिए 1975-77 की घटनाओं की एक झलक यहां प्रस्तुत है।

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