सन 1963 की चर्चित कामराज योजना के तहत केंद्रीय मंत्री मोरारजी देसाई से तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि ‘‘आपको इस्तीफा दे देना चाहिए।’’उस पर बिना कोई देर किए देसाई ने कहा कि ‘‘मुझे इस्तीफा देकर खुशी होगी। किंतु आप चंदभानु गुप्त से इस्तीफा न लें। क्योंकि इससे लोगों को लगेगा कि चूंकि आप उन्हें नापसंद करते हैं,इसलिए उन्हें हटना पड़ा।’’ प्रधान मंत्री नेहरू ने मोरारजी देसाई की सलाह नहीं मानी और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त को भी अंततः पद छोड़ना ही पड़ा।
योजना बनी थी कि देश के कुछ प्रमुख सत्ताधारी सरकार से निकल कर कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाएं। कई प्रमुख सत्ताधारियों को केंद्र व राज्य सरकारों से हटा कर संगठन के काम में लगाया गया। फिर भी 1967 के चुनाव में उसका कोई लाभ कांग्रेस को नहीं मिला। लोक सभा में कांग्रेसी सदस्यों की संख्या सन 1962 की अपेक्षा 1967 में घट गई। बाद में यह चर्चा चली कि राजनीतिक विरोधियों को रास्ते से हटाने के लिए शीर्ष नेतृत्व ने कामराज योजना लाई थी। के. कामराज तब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।
याद रहे कि संसद का सत्र समाप्त हो जाने के बाद सन 1963 के मध्य में प्रधान मंत्री नेहरू कश्मीर गये थे। वहां बीजू पटनायक से उनकी मुलाकात हुई थी।वहां से लौटने के बाद श्री पटनायक ने मोरारजी देसाई को जवाहर लाल जी के साथ हुई मुलाकात की बात बताई थी। उस बातचीत में पटनायक ने जवाहर लाल जी को एक योजना सुझाई जो बाद में ‘कामराज योजना’ के नाम से मशहूर हुई।कामराज ने अपनी ओर से वह योजना 1963 के जून के अंत या जुलाई में प्रस्तुत की।’
उसी दौरान लाल बहादुर शास्त्री ने मोरारजी देसाई से कहा था कि मैंने स्वयं ही पद मुक्त होने का आग्रह किया है। इसलिए मैं तो मुक्त होऊंगा ही। पर आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है। आपके ऊपर यह योजना लागू नहीं होनी चाहिए।’’मोरारजी देसाई के अनुसार ‘‘दूसरे दिन जवाहर लाल जी ने मुझे बुलाकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि इस योजना के अंतर्गत अब मैं और आप दो ही वरिष्ठ बच रहे हैं। जिनमें से एक को तो जाना ही चाहिए। मैं पद से न हटूं, ऐसा सबका आग्रह है। इसलिए मुझे लगता है कि संगठन के काम के लिए आपको ही पदमुक्त हो जाना चाहिए। आखिर मोरार जी मुक्त हुए भी। ये बातें पूर्व प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी जीवनी में लिखी हैं।
याद रहे कि ‘कामराज योजना’ के तहत जिन नेताओं को सरकार से हटा कर पार्टी के कामों में लगाया गया, उनमें बीजू पटनायक और मोरारजी देसाई भी शामिल थे। सन 1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय के बाद यह धारणा बन रही थी कि जनता के बीच कांग्रेस का प्रभाव कम हो रहा था। फिर से जनता से कांग्रेस को मजबूती से जोड़ने के लिए कुछ बड़े नेताओं को संगठन के काम में लगाने का निर्णय हुआ था। मूल योजना यह थी कि दो-तीन मुख्य मंत्रियों और राज्यों के कुछ मंत्रियों को उनके पदों से हटाया जाए। पर बाद में उस सूची में छह केंद्रीय मंत्रियों के नाम भी जोड़ दिए गए।
केंद्रीय मंत्रिमंडल से जो नेता हटाए गए, उनमें लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, एस.के.पाटील, जगजीवन राम और गोपाल रेड्डी शामिल थे। इनके अलावा जिन मुख्य मंत्रियों से इस्तीफा लिया गया उनमें कामराज (मद्रास), बी.आर.मंडलोई (मध्य प्रदेश), विनोदानंद झा(बिहार), चंद्र भानु गुप्त(उत्तर प्रदेश) शामिल थे।
इसके साथ ही एक अनोखी राजनीतिक घटना भी हुई। उस समय नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता गुलाम मुहम्मद बख्शी कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। यानी, वे कांग्रेस में नहीं थे। फिर भी उन्होंने कहा कि ‘चूंकि इस योजना के तहत किसी मुसलमान नेता का इस्तीफा नहीं लिया जा रहा है, इसलिए मैं मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देता हूं ताकि देश में अच्छा संदेश जाए।’ साथ ही, वे कांग्रेस में शामिल भी हो गए। उसी दौरान मोरारजी देसाई और लाल बहादुर शास्त्री के बीच की एक दिन हुई बातचीत भी उल्लेखनीय है।
शास्त्री जी ने मोरार जी देसाई से कहा कि मैंने स्वयं ही पद मुक्त होने का आग्रह किया है। इसलिए मैं तो मुक्त होऊंगा ही। पर आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है। आपके ऊपर यह योजना लागू नहीं होनी चाहिए। कामराज योजना के लागू होने के बाद सबसे पहला आम चुनाव सन 1967 में हुआ। उस समय तक लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक ही साथ होते थे। कुछ हलकों में यह उम्मीद की गयी थी कि कामराज योजना से कांग्रेस को चुनाव लाभ मिलेगा।पर ऐसा हुआ नहीं।
जिन छह राज्यों के मुख्य मंत्रियों को इस योजना के तहत हटाया गया था, उन राज्यों में भी सन 1967 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से हट गयी। वैसे कुल नौ राज्यों में तब कांग्रेस हार गयी थी। 1963 के बाद कांग्रेस या किसी अन्य दल ने ‘कामराज योजना’ जैसी कोई योजना नहीं चलाई।