Get App

एक नेता ऐसा...जो लोकसभा में बोलने उठते तो सरकार सिहर जाती थी!

मधु लिमये का बिहार से कुछ खास तरह का लगाव भी रहा। वे बिहार से मात्र सांसद ही नहीं थे बल्कि वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के साथ-साथ बिहार की मौलिक समस्याओं को भी समान ऊर्जा और मनोयोग से संसद के भीतर व बाहर उजागर करते थे।बिहार पर उनके लेखन और भाषण काफी चर्चित हुए

Surendra Kishoreअपडेटेड Jan 08, 2024 पर 6:51 PM
एक नेता ऐसा...जो लोकसभा में बोलने उठते तो सरकार सिहर जाती थी!
आज जब संसद और विधान सभाओं की गरिमा का अवमूल्यन हो रहा है, मधु लिमये जैसे ‘सभा -चतुर’ नेता अधिक ही याद आते हैं

बिहार से लोक सभा के सदस्य रहे मधु लिमये ने यह सिखाया था कि किसी हंगामे के बिना भी विधायका में किस तरह कटु सत्य भी प्रभावकारी तरीके से बोले जा सकते हैं। "वन मैन आर्मी" लिमये जब लोकसभा में बोलने के लिए उठते थे तो सरकार सिहर जाती थी। क्योंकि उनकी बातें तथ्यों से परिपूर्ण होती थीं। मुंगेर और बांका से बारी-बारी दो-दो बार सांसद रहे मधु लिमये ने सिखाया था कि प्रभाव पैदा करने के लिए सदन के नियमों की बेहतर जानकारी होनी चाहिए। सन 1964 में मुंगेर से पहली बार लोक सभा में गये मधु लिमये को यह सब अच्छी तरह आता था।वे तब एक उप चुनाव में विजयी हुए थे।

आज यह देखकर लोगबाग दुःखी होते हैं कि जन प्रतिनिधियों को अपनी बातें कहने के लिए अक्सर हंगामे का सहारा लेना पड़ता है। आज जब संसद और विधान सभाओं की गरिमा का अवमूल्यन हो रहा है, मधु लिमये जैसे ‘सभा -चतुर’ नेता अधिक ही याद आते हैं। उन दिनों मधु लिमये जैसे कई अन्य सांसद भी थे।फिर भी मधु सबसे अलग थे। बिहार से चुनाव जीत कर संसद के दोनों सदनों में बारी-बारी गये नामी -गिरामी राष्ट्रीय नेताओं नेताओं की भी कमी नहीं रही। उन बड़े नेताओं और काबिल सांसदों में बिहारी भी थे और गैर बिहारी भी। उनमें मधु लिमये का स्थान बेजोड़ था।

आजादी के बाद बिहार से लोक सभा व राज्य सभा के संदस्य बने नेताओं में जे.बी.कृपलानी, अशेाक मेहता, जॉर्ज फर्नाडिस, आई.के.गुजराल, युनूस सलीम, कपिल सिब्बल, रवींद्र वर्मा, नीतीश भारद्वाज, मीनू मसानी, लक्ष्मी मेनन और एम.एस.ओबराय प्रमुख थे। मधु लिमये का बिहार से कुछ खास तरह का लगाव भी रहा। वे बिहार से मात्र सांसद ही नहीं थे बल्कि वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के साथ-साथ बिहार की मौलिक समस्याओं को भी समान ऊर्जा और मनोयोग से संसद के भीतर व बाहर उजागर करते थे।बिहार पर उनके लेखन और भाषण चर्चित हुए।

हंगामे के बिना आज जिन छोटे-बड़े सांसदों व दलों के लिए अपनी बातें कह पाना कठिन होता है,उन्हें मधु लिमये की संसदीय शैली से इस मामले में अब भी कुछ सूत्र सीख लेना चाहिए। हालांकि यह थोड़ा कठिन दिमागी कसरत का काम है जिससे हमारे अधिकतर नेता आज जरा दूर ही रहना चाहते हैं। समाजवादी विचारक और सभा चतुर मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को पुणे में हुआ था। उनका निधन 8 जनवरी 1995 को दिल्ली में हुआ। वे दो बार मुंगेर (1964 और 1967 )और दो बार बांका (1973 और 1977) से लोक सभा सदस्य चुने गये।

सब समाचार

+ और भी पढ़ें