काठियावाड़ की देसी रियासतों के राजा-महाराजाओं ने भारत सरकार से बदला लेने के लिए इस देश में डकैतों से अव्यवस्था फैलवाई थी। आजादी के तत्काल बाद की ये घटनाएं हैं। भारतीय संघ में विलय का बदला लेने के लिए उन राजाओं ने ऐसा किया था। पर,अंततः वे सफल नहीं हुए। दीवान जरमनी दास की किताब "महाराजा" में इन घटनाओं को विवरण मौजूद है। आजादी के समय कई रजवाड़े संघ में विलय नहीं चाहते थे।
लेकिन, विलय तो हो गया। उससे नाराज रजवाड़ों ने उस समय के कुख्यात डकैत भूपत की मदद ली। वह करीब 70 से अधिक हत्याएं कर चुका था। भूपत ने पूर्व राजाओं के कहने पर खूब उत्पात मचाया। पर, पुलिस का दबाव बढ़ने पर भूपत पाकिस्तान भाग गया। रजवाड़ों ने ही उसे सरहद पार कराने में मदद की। जमींदारों के उकसावे पर उस डकैत गिरोह ने गांधीवादियों को भी निशाना बनाया था।
उन दिनों पुलिस सेवा (IP) के एक बड़े और मशहूर पुलिस अफसर थे अश्विनी कुमार। इस अफसर की जीवट और मर्दानगी के कारण ही कुख्यात भूपत को पाकिस्तान खदेड़ा जा सका। दीवान जरमनी दास लिखते हैं कि "उससे पहले अपने संरक्षकों की इच्छा का पालन करते हुए भूपत डाकू ने ऐसा आतंक फैलाया कि पूरे सौराष्ट्र का इलाका अस्तव्यस्तता के कारण भारत का सर्वाधिक खतरनाक इलाका समझा जाने लगा।"
रजवाड़े और जागीरदार भूपत को रुपये-पैसे देते थे। और, गिरोह इलाके में लूट-मार, कत्ल और आग लगाने का काम कर रहा था। लेखक के अनुसार कुछ पूर्व रजवाड़े और जागरीदार ने उससे प्रसन्न हाकर भूपत को बहुत धन दिया। भूपत गिरोह के रोज का खर्च तीन सौ रुपए था। भूपत के पाकिस्तान भाग जाने के बाद सौराष्ट्र की सरकार ने भूपत के संरक्षकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। भूपत को उकसा कर लूटपाट करवाने वाले ग्यारह रजवाड़े और उनके अनुचर गिरफ्तार किए गए। गिरफ्तार लोगों में वे भी शामिल थे जिन्होंने भूपत को पाकिस्तान भागने में मदद की।
सरकार को यह लगा था कि दरअसल रजवाड़े जनता में अराजकता फैलवा कर वे अपनी ताकत दिखाना चाहते थे ताकि उनकी शान पहले जैसी बनी रहे। कुछ रजवाड़े खुली बगावत पर उतारू थे। पर, समय रहते भारत सरकार को उनकी मंशा का पता चल गया था। यदि समय पर उनकी गलत मंशा का पता नहीं चलता तो भारत सरकार को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती थी।
जरमनी दास के अनुसार सन 1952 का आम चुनाव करीब आता देख रजवाड़े अपने ढंग से सक्रिय हो गये। रजवाड़ों और जागरदारों ने अनेक डाकुओं को अपने यहां नौकर रख लिया था। उन डकैतों के जरिए वे अपने विराधियों को कुचलने और नष्ट करने की कोशिश कर रहे थे। उनका इरादा जनता में अपना प्रभाव बढ़ाना और अगले चुनाव में सौराष्ट्र विधान मंडल पर अधिकार करना था। वे अपने खास लोगों की सरकार बनवाना चाहते थे।
एक गांधीवादी परिवार पर किस तरह भूपत डकैत ने अत्याचार किया, उसका विवरण भी पुस्तक में दर्ज है। जरमनी दास के अनुसार, डाकू भूपत का गिरोह किसान की बैलगाड़ी पर सवार होकर गांधीवादी परिवार के गांव बरवाला पहुंच गया। डाकुओं ने गांधीवादी पोपट लाल का घर पूछा। पोपट लाल तालुकेदारों और जमींदारों की आखों का कांटा बना हुआ था। घर में घुसने पर डाकुओं को पता चला कि उसका शिकार किसी काम से बाहर गया हुआ है।
डाकुओं ने खुद को पुलिस का आदमी बता कर उनके परिवार के हथियार जब्त कर लिए। एक डाकू ने उस परिवार से कहा कि तुम्हारे पोपटलाल के कारण आज हम तुम्हारे परिवार का सफाया करने आए हैं। पोपटलाल किसानों को जमींदारों के खिलाफ भड़काता था। पोपटलाल छह भाई था। हथियारों व कारतूसों पर कब्जा कर लेने के बाद डाकू भूपत ने अपना असली परिचय परिवार को दे दिया। डाकू ने गांधी की तस्वीर और चरखा को तोड़ डाला। उसने घर की तमाम चीजें सौंप देने के लिए परिवार के सदस्यों से कहा। उस समय घर सिर्फ कांति लाल और छोटे लाल मौजूद थे।
घर में रात का खाना बन रहा था। क्रूर भूपत ने जलती लकड़ी चूल्हें से खींचकर कांतिलाल पर फेंकी। वह डाकुओं से भिड़ गया। डाकुओं ने उन दोनों भाइयों की पहले नाक काटी और फिर उन्हें गोलियों से भून डाला। घर की औरतें रो-रो कर डाकुओं से विनती करती रहीं, पर डाकुओं ने उनकी एक नहीं सुनी। कांतिलाल को तीसरा भाई घर में प्रवेश करने ही वाला था कि दो लाशें देखकर वह भाग खड़ा हुआ। जाने बचाने के लिए वह 40 फीट गहरे कुएं में कूद पड़ा। उसे गंभीर चोटें आई। ऐसा था वह समय जब तरह-तरह के क्रूर लोग सक्रिय थे।