पश्चिम बंगाल चुनाव: RSS के हिंदू एकीकरण का लक्ष्य पूरा करती BJP की चुनावी रणनीति

भाजपा की यह रणनीति पहली नज़र में भले ही चुनावी राजनीति लगे, लेकिन यह दरअसल हिंदू समाज को एक करने के संघ के घोषित लक्ष्य को बखूबी पूरा कर रही है। यही कारण है कि ब्राह्णणों-बनियों की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा में आज कथित ऊंची जातियां हाशिए पर हैं और अब तक हिंदू पहचान की परिधि पर रही जातियां धीरे-धीरे इसके केंद्र में आ रही हैं

अपडेटेड Mar 31, 2021 पर 4:03 PM
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भुवन भास्कर

एक समय था, जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) को ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी माना जाता था। लेकिन आज जब पार्टी लगभग आधे से ज़्यादा देश पर शासन कर रही है, तब वह पहचान बहुत पीछे छूट चुकी है। आज की तारीख में भाजपा एससी, एसटी और ओबीसी के बीच भी किसी भी दूसरी पार्टी के मुकाबले बराबर की वोट हिस्सेदारी का दावा करती है।

यह महज़ इत्तेफाक़ नहीं है। पार्टी को इस मुकाम तक लाने में न सिर्फ भाजपा के, बल्कि उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नेतृत्व ने भी दशकों की रणनीति के साथ काम किया है।

भाजपा के लिए एससी, एसटी और ओबीसी वोट की राजनीति में सत्ता तक पहुंचने का एक अपरिहार्य माध्यम हो सकते हैं, लेकिन संघ के लिए यह उसकी बृहत्तर योजना का हिस्सा हैं।  1925 में जन्म लेने के बाद संघ पिछले 90 सालों में दर्जनों बदलावों से गुज़रा है।

गांधी जी की हत्या के बाद संघ को भंग किए जाने से लेकर हाल में खाकी फुल पैंट को गणवेष में शामिल किए जाने तक संघ ने साबित किया है कि वह समय के साथ चलने के लिए हमेशा तैयार है। लेकिन इन तमाम बदलावों के बीच एक बात जो नहीं बदली है, वह है एक सबल, समर्थ और सक्षम हिंदू समाज तैयार करने के प्रति संघ की प्रतिबद्धता।

इस लक्ष्य को संघ ने अपनी शाखाओं के माध्यम से जितना हासिल किया है, उससे कहीं ज़्यादा उसने इस लक्ष्य को भाजपा के ज़रिए साधा है। आम लोग जिसे भाजपा की महज़ चुनावी रणनीति के चश्मे से देखते हैं, वह दरअसल संघ की दीर्घकालिक नीति का व्यापक प्रकटीकरण है।

इसमें हिंदू समाज के उन छोटे-छोटे वर्गों को मुख्यधारा के साथ जोड़ने का सफल प्रयास पिछले दो दशकों में हुआ है, जो राजनीतिक और सामाजिक तौर पर हाशिए पर पड़े होने के कारण कभी स्वयं को हिंदू राजनीति के साथ नहीं जोड़ पाते थे।

यह प्रयोग संघ ने महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार में सफलतापूर्वक पूरा किया है और अब इसी की एक झलक पूर्वोत्तर और बंगाल के चुनावों में भी मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बंगलादेश के मटुआ सम्प्रदाय के मुख्य मंदिर पर जाने को ज़्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों ने बंगाल के 40 विधानसभा क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाली 3 करोड़ मटुआ जनसंख्या को लुभाने की कोशिश भर माना।


लेकिन थोड़ा गहराई से देखें, तो नरेंद्र मोदी की यह यात्रा अलग-अलग राज्यों में अपनाई गई उस रणनीति का एक हिस्सा भर है, जिसमें पार्टी ने ऐसे छोटे-छोटे हिंदू जातीय समूहों को पकड़ा है, जिन्हें राजनीतिक तौर पर न तो अलग से कोई पहचान हासिल थी, और न ही उनका कोई प्रतिनिधित्व था। मटुआ दरअसल एक वैष्णव सम्प्रदाय है, जिसकी स्थापना 19वीं सदी की शुरुआत में एक अछूत जाति (चांडाल) में पैदा हुए एक संत हरिचंद ठाकुर ने की थी।

बंगाल में मटुआ के अलावा अगुरी (उगरा क्षत्रिय), पौंड्र क्षत्रिय, माहिस्य, बाउरी, राजबंशी और कुदमी ऐसी ही छोटी-छोटी जातियां हैं। खड़गपुर में भाषण देते हुए मोदी ने "जय गोराम" कह कर जनता का अभिवादन किया, तो उन्होंने न सिर्फ पश्चिम मिदनापुर, बल्कि बांकुरा और पुरुलिया के लाखों कुदमी वोटरों को एक ऐसा संदेश दिया, जो अब तक अनदेखा था।

और मोदी की चुनावी रैलियां तो सिर्फ बड़े परदे पर होने वाला एक प्रदर्शन है, जिसकी तैयारी संघ के कार्यकर्ताओं ने वर्षों पहले से करनी शुरू कर दी थी। यह महज़ इत्तेफाक़ नहीं है कि लगभग आधी शताब्दी से हिंदू राजनीति का घनघोर विरोध करने वाली ताकतों का केंद्र रही बंगाल की धरती पर आज "जय श्री राम" राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का एक प्रतिनिधि नारा बन गया है।

भाजपा ने बंगाल के लिए जारी अपने घोषणा पत्र में कई ओबीसी जातियों को आरक्षण का लाभ दिलाने का वादा किया है। इतना ही नहीं, पार्टी ने संथाल, ओरांव, मुंडा और भूमिज जनजातियों के लिए जंगलमहल विकास बोर्ड बनाने का वादा भी किया है।

यह वहीं जंगलमहल है जहां 2019 में पांच की पांचों लोकसभा सीटें भाजपा की झोली में गिरी है और कुछ ओपिनियन पोल यहां की 42 में से 35 विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत का आकलन जता चुके हैं। जंगलमहल आदिवासियों का इलाका है और आज यह पूरा समुदाय भाजपा का कोर वोटर बन चुका है।

इसी तरह पूर्वोत्तर में, जहां पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक तौर पर भाजपा एक मुख्य ताकत के रूप में उभरी है, वहां संघ पिछले करीब 3 दशकों से अति सक्रिय है।

सीमित संसाधनों के बावजूद संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं ने लगातार ज़मीन पर काम करते हुए धीरे-धीरे पूर्वोत्तर में यह स्थिति लाने में सफलता पाई है, जहां अलग-अलग जनजातियां स्वयं को हिंदू राजनीति से जोड़ने लगी हैं।

बिहार और यूपी में भी हमने यही राजनीति देखी है, जहां छोटी-छोटी जातियों के महापुरुषों और देवताओं को राजनीतिक पहचान देकर भाजपा ने उन्हें हिंदू राजनीति की मुख्य धारा से जोड़ा है।

भाजपा की यह रणनीति पहली नज़र में भले ही चुनावी राजनीति लगे, लेकिन यह दरअसल हिंदू समाज को एक करने के संघ के घोषित लक्ष्य को बखूबी पूरा कर रही है। यही कारण है कि ब्राह्णणों-बनियों की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा में आज कथित ऊंची जातियां हाशिए पर हैं और अब तक हिंदू पहचान की परिधि पर रही जातियां धीरे-धीरे इसके केंद्र में आ रही हैं।

(लेखक आर्थिक और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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