2005 में टीवी पर घूस लेते 11 सांसदों को पूरे देश ने देखा था। नतीजतन पहले तो वे सांसद निलंबित हुए। फिर संसद ने प्रस्ताव पास कर उनकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी। इस शर्मनाक घटना की हर तरफ निंदा हुई। तब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के स्पीकर थे। सदस्यता गंवाने वाले सांसद कांग्रेस, भाजपा, बसपा और राजद के सदस्य थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि लोकतंत्र में संसद की विश्वसनीयता बनाए रखने से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
तब संसदीय कार्य और सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने कहा कि स्टिंग ऑपरेशन की पृष्ठभूमि में मीडिया पर कोई अंकुश नहीं लगाया जाएगा। राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने भी कहा था कि घूस लेने वालों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। भाजपा नेता एल के आडवाणी ने कहा कि रिश्वत प्रकरण गंभीर चिंता का विषय है। 23 दिसंबर, 2005 को जिन सांसदों की सदन की सदस्यता समाप्त की गयी, उनमें कांग्रेस के राम सेवक सिंह, राजद के मनोज कुमार, बसपा के राजाराम पाल, नरेंद्र कुमार कुशवाहा और लाल चंद्र तथा भाजपा के वाई जी महाजन, प्रदीप गांधी, सुरेश चंदेल, छत्रपाल सिंह लोढ़ा, चंद्र प्रताप सिंह और अन्ना साहेब पाटील थे।
संसद में आवाज उठाने के लिए पलामू के राजद सांसद मनोज कुमार ने 1,10,000 रुपए और कांग्रेस के ग्वालियर से सांसद राम सेवक सिंह ने 50,000 रुपए लिये थे। मिर्जापुर के बसपा सांसद नरेंद्र कुमार कुशवाहा ने 55,000 रुपए, बिल्हौर के बसपा सांसद राजा राम पाल ने 35,000 रुपए, रॉबर्ट्स गंज के बसपा सांसद लालचंद्र कोल ने 35,000 रुपए का रिश्वत लिया था।
भाजपा के जलगांव से सांसद वाई जी महाजन ने 35,000 रुपए, राजनांद गांव से भाजपा सांसद प्रदीप गांधी ने 55,000 रुपए, सीधी से भाजपा सांसद चंद्र प्रताप सिंह ने 35,000 रुपए लिये। महाराष्ट्र के एरंडोल से भाजपा सांसद अन्ना साहेब पाटील ने 45,000 रुपए लिये। हमीरपुर से भाजपा सांसद सुरेश चंदेल ने 30,000 रुपए लिये। राज्य सभा सदस्य छत्रपाल सिंह लोध (भाजपा) ने 15 हजार रुपए लिये।
लोकसभा के दस सदस्यों की सदस्यता समाप्ति के लिए लोक सभा ने प्रस्ताव पास किया और राज्य सभा के एक सदस्य की सदस्यता समाप्त करने के लिए राज्य सभा ने प्रस्ताव पास किया। कुछ बड़े नेताओं ने कहा था कि जुर्म के अनुपात में अधिक सजा दी जा रही है। पर, लोकतंत्र और संसद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए उनके तर्क को नहीं माना गया। उससे पहले स्टिंग ऑपरेशन करने वाले एक चर्चित मीडिया संगठन ने " ऑपरेशन दुर्योधन" चलाया। ऑपरेशन 10 महीने तक चला।
कुछ सांसदों के खिलाफ मिल रही ऐसी शिकायतों को ध्यान में रखते हुए मीडिया संगठन ने स्टिंग ऑपरेशन चलाया गया। नार्थ इंडिया स्मॉल मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन नाम काल्पनिक संस्था के प्रतिनिधियों ने कुछ सांसदों से बारी-बारी से मुलाकात की। सांसदों से कहा गया कि यदि आप हमारे लिए संसद में सवाल उठाएंगे तो हम आपको पैसे देंगे।
सांसदों में से 11 सांसद इस काम के लिए तैयार हो गये। छिपे हुए कैमरों से रुपए के लेन देन को रिकॉर्ड कर लिया गया। जो पत्रकार इस ऑपरेशन में शामिल हुए थे, उनके नाम भी बदले हुए थे। इन सांसदों ने बिचैलियों के जरिए या निजी सचिवों की मौजूदगी में पैसे लिये।
जब सांसदों के गोरखधंधों को टीवी चैनल पर दिखाया गया तो उप राष्ट्रपति सह राज्य सभा के सभापति भैरों सिंह शेखावत काफी नाराज हो गये। उन्होंने कहा कि इससे हमारी संसद की मर्यादा और गरिमा पर आधात लगा है। स्टिंग ऑपरेशन के प्रकाश में आने के साथ ही लोक सभा के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने बंसल कमेटी बना दी।
उधर राज्य सभा के सभापति ने भी राज्य सभा के सदस्य के खिलाफ आरोप की जांच के लिए यह मामला आचार समिति को सौंप दिया। दोनों समितियों की रिपोर्ट आ जाने के बाद दोनों सदनों ने 11 सदस्यों की सदस्यता खत्म कर दी।
इस घटना के सामने आने के बाद आम लोगों ने न सिर्फ स्टिंग ऑपरेशन चलाने वाले पत्रकारों कें इस काम की सराहना की बल्कि संसद के दोनों सदनों के प्रति भी आभार प्रकट किया। पर बाद के वर्षों में अनेक लोगों को इस बात का अफसोस रहा कि ऐसी शिकायतों की संख्या अब बढ़ जाने के बावजूद स्टिंग ऑपरेशन नहीं हो रहा है। जबकि, इसकी आज भी सख्त जरूरत है।