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आखिर कब राजमाता सिंधिया ने नाराज होकर गिरा दी थी डीपी मिश्र की कांग्रेसी सरकार

एक सभा में राज घरानों के खिलाफ मुख्यमंत्री मिश्र की अमर्यादित टिप्पणी से विजया राजे सिंधिया सख्त नाराज हो गयी थीं

Surendra Kishoreअपडेटेड Dec 10, 2023 पर 3:25 PM
आखिर कब राजमाता सिंधिया ने नाराज होकर गिरा दी थी डीपी मिश्र की कांग्रेसी सरकार
आखिर क्या थी राजमाता विजयाराजे सिंधिया की नाराजगी की वजह

मध्य प्रदेश के स्पष्टवादी मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र ने पूर्व राज घरानों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से अमर्यादित टिप्पणी की जिससे गुस्सा कर राजमाता सिंधिया ने 1967 में उनकी सरकार गिरवा दी। ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राजनीति में लेकर आए था। कांग्रेस के टिकट पर वह 1957 और 1962 में लोकसभा सदस्य बनीं। सन 1967 में स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर लोक सभा सदस्य चुनी गयीं। बाद में वह जनसंघ में शामिल हो गयीं।

द्वारिका प्रसाद मिश्र से उनकी नहीं बनती थी। राजमाता का कांग्रेस में लाया जाना संभवतः मिश्र को अच्छा नहीं लगा था। मिश्र ने भी एक बार कहा था कि "यदि कांग्रेस ने राजमाता को वापस कांग्रेस में लाने की कोशिश की कि तो मैं कांग्रेस में रह कर भी समूचे देश में ऐसा आंदोलन छेड़ूंगा कि राजाओं के समर्थकों की जड़ें हिल जाएंगी।"

एक सभा में राज घरानों के खिलाफ मुख्यमंत्री मिश्र की अमर्यादित टिप्पणी से विजया राजे सिंधिया सख्त नाराज हो गयी थीं। उधर डी.पी. मिश्र के बाद मुख्य मंत्री बने गोविंद नारायण सिंह मिश्र मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए जाने से नाराज थे। गोविंद नारायण सिंह के पिता अवधेश प्रताप सिंह विंध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रह चुके थे। गोविंद नारायण सिंह सहित तीन दर्जन कांग्रेसी विधायकों ने 1967 में डीपी मिश्र सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया।

1967 के आम चुनाव के बाद तो राजनीति के 'चाणक्य' माने जाने वाले मिश्र के नेतृत्व में मध्य प्रदेश में कांग्रेसी सरकार तो बन गयी थी, पर नये विवाद के कारण वह सिर्फ चार महीने ही चल सकी। यानी 8 मार्च, 1967 से 29 जुलाई 1967 तक ही। एक ऐसे मुख्य मंत्री को राजमाता ने उलट दिया जिन्होंने एक ही साल पहले इंदिरा गांधी को प्रधान मंत्री बनाने में 'चाणक्य' की भूमिका निभाई थी। हालांकि डी.पी मिश्र उससे पहले के प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के विरोधी हो गए थे। मिश्र जी की शिकायत थी कि तिब्बत को हड़प लेने पर नेहरू ने चीन का विरोध नहीं किया।

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