Same-Sex Marriage : सुप्रीम कोर्ट ने सेम सेक्स मैरिज को कानूनी दर्जा नहीं दिया, यहां जानिए इस मामले से जुड़ी हर बारीकियां

सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर को सेम सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक विवाह को कानूनी दर्जा देने का काम संसद का है। इस तरह, देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस संवेदनशील मसले को सरकार के पाले में डाल दिया है। इस मसले पर सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच में 5 जज शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने करीब पांच साल पहले समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। इसे एक बुनियादी फैसला माना गया था

अपडेटेड Oct 17, 2023 पर 4:18 PM
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2023 में सेम सेक्स मैरिज मसले से जुड़ी सभी याचिकाओं को देशभर से अपने पास मंगाने का आदेश दिया था। उसके बाद चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस मसले पर सुनवाई की। इस बेंच में जस्टिस एस के कॉल, जस्टिस एस आर भट्ट, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस हिमा कोहली शामिल थीं।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सेम सेक्स मैरिज (Same Sex Marriage) मामले पर फैसला सुना दिया है। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार था। सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर को सेम सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि समलैंगिक विवाह को कानूनी दर्जा देने का काम संसद का है। इस तरह, देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस संवेदनशील मसले को सरकार के पाले में डाल दिया है। इस मसले पर सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच में 5 जज शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने करीब पांच साल पहले समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। इसे एक बुनियादी फैसला माना गया था।

समलैंगिक संबंध को क्राइम की श्रेणी से बाहर किया था

सुप्रीम कोर्ट के 5 साल पहले के इसे फैसले से समलैंगिक संबंध में दिलचस्पी रखने वाले समुदाय को बड़ी राहत मिली थी। इससे पहले उन्हें किसी तरह का कानूनी संरक्षण हासिल नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रोग्रेसिव माना गया था। इससे उन लोगों को बड़ा झटका लगा था, जो सेक्सुअल रिलेशंस के मामले में परंपरा से एक इंच भी हटने को तैयार नहीं हैं।


सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने क्या कहा?

इस मसले पर सुनवाई कर रही पांच जजों की बेंच की अध्यक्षता प्रमुख मुख्य न्यायधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने की। बेंच ने कहा कि विवाह के लिए कानून में बताए गए अधिकारों के सिवाए दूसरा कोई अधिकार नहीं है। इस तरह के संबंध (Civil Union) को कानूनी दर्जा सिर्फ कानून पारित कर दिया जा सकता है। होमोसेक्सुअल रिलेशनशिप से जुड़े किसी ट्रांससेक्सुअल व्यक्ति को शादी करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर 11 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मसले पर कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं। मार्च और अप्रैल में करीब 40 वकीलों ने इस मसले के पक्ष और विपक्ष में अपनी दलीले पेश की थीं।

स्पेशल मैरिज एक्ट को दोबारा परिभाषित करने की मांग

एक ही सेक्स के दो कपल (जोड़ों) ने नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत से सेम सेक्स मैरिज को कानूनी दर्जा देने की गुजारिश की थी। इनमें से एक याचिका में स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई थी। इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस एक्ट को जेंडर-न्यूट्रल नजरिए से दोबारा परिभाषित करने की मांग की गई थी। इसके लिए दलीली दी गई थी कि सेक्सुअल रुझान के आधार पर लोगों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। उसके बाद सेम सेक्स मैरिज पर कई याचिकांए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गईं।

दो महीने तक इस मसले पर हुई थी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2023 में इस मसले से जुड़ी सभी याचिकाओं को देशभर से अपने पास मंगाने का आदेश दिया था। उसके बाद चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस मसले पर सुनवाई की। इस बेंच में जस्टिस एस के कॉल, जस्टिस एस आर भट्ट, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस हिमा कोहली शामिल थीं। करीब 40 वकीलों ने दो महीने तक इस मसले के पक्ष और विपक्ष में अपनी दलीले पेश कीं। 17 वकीलों ने स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 को दोबारा परिभाषित करने के पक्ष में दलील दी। उनका कहना था कि इसके जरिए ऐसी शादी को भी कानूनी मान्यता दी जाए जिसमें वैवाहिक संबंध के लिए सिर्फ एक पुरुष और स्त्री की शर्त न हो। 22 वकील जो मुख्य रूप से सरकार का पक्ष रख रहे थे, उनका कहना था कि विचार-विमर्श के बाद इस तरह का कानून बनाने का काम ससंद का है। केंद्र सरकार का रुख सेम सेक्स मैरिज को कानूनी दर्जा देने के खिलाफ रहा है।

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