इनसॉल्वेंसी कानून में यह बदलाव बढ़ा देगा बैंकों और बॉन्ड्स निवेशकों की चिंता

सरकार ने इनसॉल्वेंसी कानून में बदलाव का प्लान तैयार किया है। इसके लिए पिछले महीने एक डिस्कशन पेपर जारी किया गया है। इसमें जो प्रस्ताव शामिल हैं, उसके लागू होने पर कंपनी के दिवालिया होने पर उसे कर्ज देने वाले बैंकों ओर बॉन्ड्स के निवेशकों को कम पैसे वापस मिलेंगे

अपडेटेड Feb 23, 2023 पर 12:24 PM
बैंकों और बॉन्डहोल्डर्स का कंपनी के प्रोसिड्स पर पहला दावा बना रहेगा, लेकिन यह कॉर्पोरेट डेटर की लिक्विडेशन वैल्यू तक सीमित होगा।

बैंकों और बॉन्ड्स के निवेशकों के लिए अच्छी खबर नहीं है। किसी दिवालिया कंपनी के मामले का निपटारा होने पर उसे कर्ज देने वाले बैंकों और बॉन्ड्स के निवेशकों को अब कम पैसे मिलेंगे। दरअसल, सरकार इनसॉल्वेंसी के नियमों (Insolvency Law) में बदलाव करने जा रही है। इसके लागू होने के बाद किसी दिवालिया कंपनी के मामले का निपटारा होने पर पेमेंट के मामले में वेंडर्स और सरकार को प्राथमिकता मिलेगी। इसका मतलब है कि अगर कंपनी पर वेंडर्स या सरकार का पैसा बकाया होगा तो पहले उन्हें पेमेंट मिलेगा। रिस्ट्रक्चरिंग और इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स ने यह जानकारी दी।

सरकार ने जनवरी में जारी किया डिसक्शन पेपर

इस बारे में सरकार की तरफ से एक डिस्कशन पेपर जनवरी में जारी किया गया था। इसमें यह प्रस्ताव शामिल है। दरअसल, सरकार का मानना है कि कंपनी की संपत्ति को बेचने से मिलने वाले पैसे का एक समान डिस्ट्रिब्यूशन होना चाहिए। इस पेपर में इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड में दूसरे बड़े बदलाव की भी सिफारिश की गई है। इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स का कहना है कि नियम में इस बदलाव से सेक्योर्ड क्रेडिटर्स नाखुश हो सकते हैं। बैंक और बॉन्ड्स के निवेशक सेक्योर्ड क्रेडिटर्स कैटेगरी में आते हैं। अभी कंपनी (दिवालिया हो चुकी) के पैसे के डिस्ट्रिब्यूशन में उन्हें प्राथमिकता मिलती है।


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पेपर में क्या कहा गया है?

हालांकि, बैंकों और बॉन्डहोल्डर्स का कंपनी के प्रोसिड्स पर पहला दावा बना रहेगा, लेकिन यह कॉर्पोरेट डेटर की लिक्विडेशन वैल्यू तक सीमित होगा। लिक्विडेशन वैल्यू के बाद होने वाली किसी रिकवरी को सभी क्रेडिटर्स के बीच डिस्ट्रिब्यूट किया जाएगा। इनमें अनसेक्योर्ड फाइनेंशियल क्रेडिटर्स, अनपेड वेंडर्स और सरकार के बकाया अमाउंट शामिल होंगे। डिस्कशन पेपर में इन बातों का उल्लेख है।

कंसल्टेंसी फर्म EY में फाइनेंशियल सर्विसेज एवं रिस्ट्रक्चरिंग लीडर अबीजर दिवानजी ने कहा कि यह प्रस्ताव सेक्योर्ड क्रेडिटर्स के लिए ठीक नहीं है। इसका क्रेडिट मार्केट्स और सिक्योरिटी कंसिडरेशंस पर काफी असर पड़ेगा। पहले से ही IBC के तहत रिकवरी में देरी और लिटिगेशंस आम बात है। नए नियम के लागू होने पर बैंकों सहित कर्ज देने वाली कंपनियों पर खराब असर पड़ेगा।

क्या बदलाव आएगा?

अभी लिक्विडेशन के प्रोसेस में क्रेडिटर्स को पेमेंट के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, उसमें यह बताया गया है कि सबसे पहले किसे पेमेंट मिलेगा। पेमेंट के लिए दूसरे नंबर पर कौन होगा और तीसरा नंबर किसका होगा। लेकिन, यह पेमेंट सिक्योरिटी की वैल्यू तक सीमित होगा। लिक्विडेशन में अतिरिक्त प्रोसिड्स से सबसे पहले नहीं चुकाई गई सैलरी या मजदूरी का पेमेंट होता है। उसके बाद अनसेक्योर्ड क्रेडिटर्स को पेमेंट होता है। उसके बाद शेयरहोल्डर्स को पेमेंट होता है। इनसॉल्वेंसी में सभी अनसेक्योर्ड क्रेडिटर्स को एक समान माना जाता है।

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