चंदन श्रीवास्तव
चंदन श्रीवास्तव
Pele Death: सदी के महानतम फुटबॉलर में शुमार पेले अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी कहानी दुनिया के वंचितों की मेहनत और ताकत का प्रतीक बनकर हमेशा अमर रहेगी। कैंसर जीता, फुटबॉल का बादशाह जिन्दगी के मैदान में बाकी बची सांसों की लड़ाई हार गया। लेकिन `हार गया` ऐसा लिखना ठीक नहीं क्योंकि मौत से राजा-रंक-फकीर सभी हार जाते हैं. सो, देखा ये जाना चाहिए कि दम टूटने के ऐन पहले तक किसने ऐसी कीर्ति कमायी कि उसकी कहानी अमर हो गई। और, इस एक अर्थ में एडसन आरांतेस दो नासीमेंतो उर्फ पेले की कहानी अमर रहेगी।
देह मिटती है, देह खपाकर कमाया हुआ नाम नहीं मरता— वह अमर हो जाता है। जब आप देह खपाते हैं तो आपको एक नया नाम मिलता है और इस नाम को कोई नहीं मिटा पाता, शायद समय भी नहीं बशर्ते आपने जो नाम कमाया है, वह समय की धारा को बदल देने वाला हो। पेले के नाम के साथ ऐसा ही हुआ और एक बार नहीं कई बार हुआ। शायद ही कोई उन्हें कोई एडसन आरांतेस दो नासीमेंतो के नाम से याद करता है, सब उन्हें `पेले` कहते हैं. `पेले` देह खपाकर कमाया हुआ नाम था, खालिस अपनी मेहनत से रचा हुआ अपना नाम !
और, यह नाम देशों-महादेशों की सरहद को लांघकर लोगों के दिलों में पलती जीत की उम्मीद का नाम बन गया। यह नाम बड़े-बड़ों की हैसियत को उलांघ जाने वाला नाम था, एक ऐसा नाम कि विश्व की महाशक्ति कहलाने वाले अमेरिका का राष्ट्रपति जब हाथ मिलाये तो उसे कहना पड़ेः मैं रोनाल्ड रीगन हूं, संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति। लेकिन आपको अपना परिचय देने की जरूरत नहीं क्योंकि हर कोई जानता है कि पेले कौन है।
जी, आपने बिल्कुल ठीक पढ़ा। ये शब्द अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के ही हैं। बात 1982 की है, पेले अमेरिका में थे। अमेरिकी राष्ट्रपति-भवन ह्वाइट हाऊस से सटे रोज गार्डेन में फुटबॉल-प्रेमी नन्हें बच्चे जुटे हुए थे और वहां खड़ी भीड़ को संबोधित करते हुए माइक्रोफोन पर ये शब्द रोनाल्ड रीगन ने कहे थे। इन शब्दों की व्याख्या यह कहकर नहीं हो सकती कि अंतर्राष्ट्रीय मैचों से संन्यास लेने के बाद 34 साल की उम्र में पेले ने अनुबंध के बड़े ऊंचे दाम वसूलकर संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयार्क कॉस्मॉस के लिए खेलना शुरू कर दिया था और इसके बहुत पहले से वे अमेरिकी राष्ट्रपतियों, फिल्मी हस्तियों के दुलारे बन चुके थे। जाहिर है, फिर रोनाल्ड रीगन को इन शब्दों के सहारे ही पेले का परिचय देना था।
दरअसल,पेले नाम में समाये करिश्मे को तबतक नहीं समझा जा सकता जबतक हम ये ना जान लें कि यह खिलाड़ी अजातशत्रु था, वह अपने खेल से मुकाबले में खिलाफ खड़े महारथियों के दिल भी जीत लेता था।
एक नाम जिसने विरोधियों का दिल जीत लिया
`पेले` उस खिलाड़ी का नाम है जो अश्वेत आबादी की गरीब बस्तियों में पला लेकिन उसके पास जीत का सपना था। इस सपने को पंख लगे साल 1958 के फुटबॉल वर्ल्डकप के क्वार्टर फायनल में जब पेले वेल्स के खिलाफ गोल दागकर विश्वकप मुकाबलों में सबसे कम उम्र (17 साल, 239 दिन) में गोल दागने वाले खिलाड़ी बने । लोग याद करते हैं उस पेले को जिसने स्वीडन में खेले गये इसी वर्ल्डकप के सेमी फायनल में फ्रांस के खिलाफ मात्र 27 मिनटों में गोल की हैट्रिक लगायी थी. लोगों को याद रहता है वह पेले जिसने मेजबान स्वीडन के खिलाफ खेले गये फायनल मैच में ब्राजील की तरफ से दो गोल दागे थे और गोल दागने के इस कमाल के करतब के बारे में स्वीडन का एक खिलाड़ी(सिग पारलिंग) ने बाद को एक इंटरव्यू में कहा थाः पांचवे गोल के बाद मुझे लगा कि मैच के आखिरी पलों में पेले के दागे इस दूसरे गोल की प्रशंसा में मैं मैच में खड़ा होकर ताली बजाऊं। स्वीडन के दो गोलों के खिलाफ ब्राजील को पांच गोलों से जीत दिलाने वाले `पेले` उसी क्षण से `किंग ऑफ फुटबॉल` बन गये थे।
ऐसा एक और मौका आया साल 1970 के वर्ल्डकप में। पीछे के दो वर्ल्डकप (1962 में चिले और 1966 में इंग्लैंड) में `पेले` कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाये. चिले में खेला गया वर्ल्डकप यों तो ब्राजील ने ही जीता लेकिन सुपरस्टार बन चुके पेले कोई खास कमाल दिखा पाने के पहले ही टूर्नामेंट से बाहर हो गये। उन्होंने टूर्नामेंट के शुरूआती मैचों के दौरान मैक्सिको के खिलाफ एक गोल दागा था लेकिन दूसरे दौर में चेकोस्लोवाकिया के साथ हुए मैच में खेल के दौरान ऐसे चोटिल हुए कि पूरे टूर्नामेंट में ना खेल सके।
इंग्लैंड में हुए वर्ल्डकप(1966) में पेले तमाम विपक्षी खिलाड़ियों के निशाने पर थे। शुरूआती मैच में ब्राजील ने बुल्गारिया के खिलाफ 2-0 से मैच जीता और इसमें एक गोल पेले ने दागा था। लेकिन फिर बुल्गारिया और पुर्तगाल के साथ हुए बाद के मैचों में विपक्षी खिलाड़ियों ने उन्हें घेरे रखा और लगातार चोट पहुंचायी। मजबूरन पेले को टूर्नामेंट में आगे का मैच खेलने को नहीं मिला। पेले के बगैर खेल रही ब्राजील की टीम हंगरी से 3-1 से मैच हारकर टूर्नामेंट से बाहर हो गई।
लेकिन, इसके बाद आया मैक्सिको में खेला गया 1970 का वर्ल्डकप। पेले इस बार वर्ल्डकप को ब्राजील ले जाने के पूरे संकल्प के साथ मैदान में उतरे थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया थाः मैं हमेशा के लिए इस भ्रम को तोड़ देना चाहता था कि मैं बिना चोट खाये वर्ल्डकप सीरिज के मैचों में मैदान में उतर ही नहीं सकता। इस विश्वकप के फायनल में ब्राजील ने इटली को 4-1 से हराया। पेले ने मैच में एक गोल दागा और वह ब्राजील की तरफ से विश्वकप मैचों में दागा गया 100वां गोल था।
उस मैच में पेले के खेल का जलवा ऐसा था कि पेले के कदमों को रोकने के लिए खड़े किये गये इटली के डिफेंडर तारचिजियो बुर्गनिक ने बाद को स्वीकार कियाः मैं ये सोचकर मैदान में उतरा था कि आखिर वह(पेले) भी बाकी खिलाड़ियों की तरह बना तो है हाड़-मांस का ही, मैं उसको रोक लूंगा. लेकिन मैं गलत था ! और, पेले ने इटली के खिलाफ दागे गये अपने विजयी गोल के बारे बाद के वक्तों में कहाः मेरे दिल में उस गोल के लिए खास जगह है। मैंने वह गोल अपने सिर के सहारे दागा था। मेरे पिता फुटबॉल के खिलाड़ी थे। एक दफे उन्होंने एक मैच में पांच गोल किये, सब के सब हेडर थे। वही एक रिकार्ड है जो मैं नहीं तोड़ सका।
ऐसा कहना पेले की विनम्रता थी वर्ना तो रिकार्ड ये कहता है कि उन्होंने अपने पूरे करिअर में 1000 से ज्यादा (कुल 1363 मैचों में कुल 1281) गोल दागे। इनमें 6 मैच ऐसे हैं जिनमें उन्होंने अकेले पांच गोल मारे। उनके लगाये हैट्रिक की संख्या (कुल 92 मैचों में अकेले 3 गोल) भी कम नहीं है। कुल 30 मैचों उनके करिअर में ऐसे हैं जिनमें उन्होंने अकेले चार गोल दागे और 1964 में एक मौका ऐसा भी आया जब ब्राजीलियन फुटबॉल क्लब बोटाफोगो के खिलाफ उन्होंने अकेले 8 गोल मारे थे।
लेकिन पेले की असली कहानी उनके दागे गोलों की कहानी नहीं है। फटबॉल के मैदान में बनाये गये रिकार्ड तो पेले नाम की कहानी का शुरूआती हिस्सा भर हैं। पेले नाम की कहानी का सबसे अहम हिस्सा युद्ध के मैदान में लिखा गया।
वह नाम जिसने युद्ध रोक दिया
साल 1967 की बात है। तबतक ब्राजील फुटबॉल के दो वर्ल्ड कप जीत चुका था और पेले शोहरत की ऊंचाई पर थे। दुनिया में शायद ही कोई फुटबॉल प्रेमी होगा जो उस वक्त पेले का नाम नहीं जानता हो। उनके क्लब सान्टोस ने तय किया कि पेले की शोहरत का फायदा उठाया जाये। क्लब ने वर्ल्ड टूर की योजना बनायी। साल 1967 की जनवरी में सान्टोस की टूर अफ्रीका पहुंची। मैच कान्गो, मोजाम्बिक, घाना, अल्जीरिया और नाइजीरिया में होने थे।
उस वक्त नाइजीरिया गृहयुद्ध की आग से झुलस रहा था। मुल्क की संघीय सरकार और दक्षिणी-पूर्वी राज्य बियाफ्रा के बीच ठनी हुई थी। बियाफ्रा के इग्बो जनजाति के अश्वेत लोगों को लग रहा था कि उत्तरी इलाके के लोगों के दबदबे वाली संघीय सरकार उनकी भावनाओं और उम्मीदों को कुचल रही है। बियाफ्रा के लोग नाइजीरिया से अलग होना चाह रहे थे। और, इसी क्रम में संस्कृति और जातीय पहचान को लेकर खूनी लड़ाई ठनी हुई थी। तकरीबन 6 करोड़ की आबादी वाले नाइजीरिया में 300 से ज्यादा अलग-अलग जातीय पहचान वाले लोग थे और इन्हें एकजुट-एकदेश कर पाना सरकार के लिए मुश्किल हो रहा था।
साल 1967 की 26 जनवरी को सान्टोस की टीम पेले के साथ नाइजीरिया पहुंची। उसे ग्रीन इगल्स कहलाने वाली नाइजीरिया की राष्ट्रीय टीम के साथ मैच खेलना था। मैदान में पेले को उतरना है, ऐसा सुनते ही आपस में खूनी लड़ाई लड़ने वाले दोनों पक्ष 48 घंटे के युद्ध-विराम के लिए सहमत हो गये। यही नहीं लागोस सिटी स्टेडियम में दर्शकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी युद्धरत दोनों पक्षों के सशस्त्र सैन्य अधिकारियों ने संभाली। जातीय पहचान चाहे जो भी हो, राजनीतिक पक्षधरता चाहे जिसकी भी जैसी हो, मैच देख रहे सबके मन में एक ही भाव था कि 90 मिनट के खेल में पेले को खेलते देखना है। कोई हिंसा नहीं हुई, किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई, एक महान खिलाड़ी के महान खेल के आगे थोड़ी देर को आपसी हिंसा जैसे छू-मंतर हो गई। मैच ड्रा रहा, पेले ने इसमें दो गोल दागे थे और उनके गोल पर स्टेडियम में हर तरफ ताली बजी थी।
यह कहानी सिर्फ इसलिए अहम नहीं कि एक खिलाड़ी के नाम के शोहरत ने कुछ घंटों तक युद्ध रोक दिया था। खेल के आगे हिंसा के रूक जाने की यह कहानी इसलिए भी याद की जानी चाहिए क्योंकि पेले अश्वेत थे और उनकी आलोचना में कहा जाता है कि उन्होंने अश्वेत लोगों के साथ हो रही नाइंसाफियों के बारे में खुलकर कभी नहीं बोला जबकि उनके अपने देश में अश्वेत लोगों की तादाद 50 फीसद से ज्यादा (21 करोड़ की आबादी में 12 करोड़) है और इस आबादी का बड़ा हिस्सा अब भी दुर्दशा में है(ब्राजील में गुलामी की प्रथा का अंत बाकी देशों की तुलना में बहुत बाद यानी 1888 में हुआ)
कहा जाता है कि उन्होंने अपने देश के तानाशाहों का साथ दिया, उनके खिलाफ बोलने से हिचकते रहे। इस हद तक डरे कि 1970 का वर्ल्डकप जीतने के बाद जब खेल से संन्यास लेना चाहा तो एक तानाशाह के कहने पर ही उन्हें अपना फैसला मुल्तवी करके नेशनल टीम के साथ मैक्सिको में मैच खेलने जाना पड़ा जबकि तानाशाह इमिलो गाहाताजू मेदिसी दमन पर उतारू था और अपने विरोधियों को निर्दयता से ठिकाने लगा रहा था। यह भी कहा जाता है कि वे तानाशाहों की सरकार में देश के खेल मंत्री रहे।
लेकिन पेले की आलोचना में ऐसा कहते हुए नहीं भूलना चाहिए कि बिना खुलकर बोले भी वे पूरी दुनिया में वंचितों की आवाज और उनकी ताकत के प्रतीक थे। नाइजीरिया में गृहयुद्ध का रूकना इसी बात का प्रमाण है। पेले की जीवनी `पेले: हिज लाइफ एंड टाइम्स` में एक जगह उन्हें यह कहते हुए दिखाया गया हैः अफ्रीका की पहली यात्रा मेरे लिए बड़ा खुशगवार अनुभव साबित हुई। जहां कहीं भी जाता लोग मुझे देवता के समान समझते और वैसा ही बरताव करते थे, निश्चित ही इस वजह से कि मैं उन देशों के अश्वेतों के बीच इस बात का प्रतीक था कि नस्लगत पूर्वाग्रह ना हों तो एक अश्वेत व्यक्ति क्या कुछ कर दिखा सकता है। साथ ही, मैं उन लोगों के बीच में इस बात का जीता-जागता प्रमाण था कि एक अश्वेत व्यक्ति भी धनी हो सकता है भले ही कोई मुल्क गोरे लोगों का ही क्यों ना हो.. उन लोगों के लिए जिनके पास अपनी दुर्दम्य गरीबी से निकल छूटने का शायद ही कोई चारा था, मैं आशा की एक किरण था भले ही वह किरण कितनी भी धुंधली क्यों ना हो।
पेले अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन दुनिया के वंचितों के दिल में उनकी जगह हमेशा के लिए सुरक्षित हो गई है।
(लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक मामलों के जानकार हैं)
हिंदी में शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट न्यूज़, बिजनेस न्यूज़, पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App डाउनलोड करें।