IPO Terminology : शेयर बाजार में तेजी के बीच पिछले कुछ समय में लगातार कई कंपनियों ने अपना आईपीओ लॉन्च किया है। जुलाई में अब तक कम से कम 15 कंपनियों (एक्सचेंज के एसएमई प्लेटफॉर्म पर मौजूद कंपनियों सहित) की लिस्टिंग हो चुकी है। सेबी के पास दाखिल ड्राफ्ट ऑफर दस्तावेजों के अनुसार आने वाले समय में और कई आईपीओ आने वाले हैं। कई निवेशक ऐसे हैं जो आईपीओ में निवेश तो करते हैं लेकिन उन्हें इसमें इस्तेमाल होने वाले कई भारी-भरकम शब्दों का मतलब नहीं पता होता है। आज हम यहां आईपीओ से जुड़े ऐसे ही 5 टर्मिनोलॉजी के बारे में बताने जा रहे हैं
फिक्स्ड प्राइस VS बुक-बिल्ट इश्यू
एक फिक्स्ड प्राइस वाले इश्यू में कंपनी पहले ही तय कर लेती है कि आईपीओ में निवेशकों को किस कीमत पर शेयर जारी किए जाएंगे। उदाहरण के लिए टेक कंपनी AccelerateBS India हाल ही में BSE SME एक्सचेंज में लिस्ट हुई थी। कंपनी ने 90 रुपये प्रति शेयर के फिक्स्ड इश्यू प्राइस की घोषणा की थी।
लेकिन BSE या NSE मेनबोर्ड पर लिस्ट अधिकांश (गैर-SME) कंपनियां इन दिनों बुक-बिल्ट इश्यू का विकल्प चुनती हैं। इसके तहत आईपीओ लाने वाली कंपनी तय कीमत के बजाय प्राइस बैंड की घोषणा करती है। इसके बाद इस सीमा के भीतर कीमतों पर इन शेयरों के लिए बोली के आधार पर इश्यू प्राइस तय किया जाता है।
बुक-बिल्ट इश्यू में निवेशक अपनी बोलियां सबमिट करते हैं, जिसमें शेयरों की संख्या और वह कीमत बताई जाती है जिस पर वे उन्हें खरीदना चाहते हैं। बुक-बिल्ट इश्यू में बोली के बाद कट-ऑफ/इश्यू प्राइस बन जाती है। यह वह कीमत है जिस पर शेयर अंत में जारी किए जाते हैं।
ऑफर फॉर सेल VS फ्रेश इश्यू
कोई कंपनी आईपीओ के जरिए फ्रेश इश्यू या ऑफर फॉर सेल (OFS) या दोनों के कॉम्बिनेशन के साथ फंड जुटा सकती है। फ्रेश इश्यू में, कोई कंपनी निवेशकों को नए शेयर जारी करके पूंजी जुटाती है। कंपनी इस पैसे का इस्तेमाल निवेश, लोन चुकाने आदि कई कामों में कर सकती है। OFS में प्रमोटर या अन्य मौजूदा निवेशक कंपनी में अपने शेयर जनता को बेचते हैं। ओएफएस में एकत्र किया गया पैसा बेचने वाले शेयरधारकों के पास जाता है, न कि कंपनी के पास।
ASBA (एप्लिकेशन सपोर्टेड बाय ब्लॉक्ड अमाउंट)
आईपीओ के समय आपके सामने अक्सर जो शब्द आते होंगे उनमें से एक है ASBA। इसके तहत जब आप आईपीओ के लिए आवेदन करते हैं, तो आपका पैसा बैंक अकाउंट में रहता है। बैंक बस इतना करता है कि अलॉटमेंट तक आपके खाते में आवेदन राशि को ब्लॉक कर देता है। आपके खाते से पैसे तभी काटे जाते हैं जब आपको शेयर आवंटित किए जाते हैं। यदि आपको कोई शेयर आवंटित नहीं किया गया है, तो पैसा अनब्लॉक हो जाता है। इस पूरे समय के दौरान आपके पैसे पर ब्याज मिलता रहता है। ASBA को पहली बार सेबी द्वारा 2008 में पेश किया गया था और 2016 से सभी आईपीओ के लिए इसे अनिवार्य बना दिया गया।
ये बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स हैं, जिनमें म्यूचुअल फंड, सॉवरेन वेल्थ फंड और बीमा कंपनियां शामिल हैं। जनता के लिए सब्सक्रिप्शन खुलने से पहले उन्हें आईपीओ में शेयरों की पेशकश की जाती है। वे इसे सब्सक्राइब करते हुए इश्यू को सपोर्ट देते हैं। आईपीओ खुलने से एक दिन पहले उन्हें कंपनी द्वारा तय कीमत पर शेयर आवंटित किए जाते हैं। मजबूत एंकर पार्टिसिपेशन को किसी इश्यू के लिए बेहतर माना जाता है। कई रिटेल निवेशक आईपीओ में भाग लेने का निर्णय लेते समय इस फैक्टर पर विचार करते हैं।
2022 में भारत के अब तक के सबसे बड़े LIC IPO में एंकर निवेशकों की ओर से मजबूत डिमांड देखी गई। सेबी के नियमों के तहत एंकर निवेशकों को आवंटित शेयरों में से आधे के लिए 30-दिन का लॉक-इन और बाकी के लिए आवंटन की तारीख से 90-दिन का लॉक-इन होता है। ऐसा एंकर निवेशकों द्वारा अपने निवेश से बाहर निकलने के कारण शेयर की कीमत में तेज अस्थिरता से बचने के लिए किया गया है।
इसके तहत, इश्यू के ओवरसब्सक्राइब होने पर पब्लिक होने वाली कंपनी के पास निवेशकों को अतिरिक्त शेयर जारी करने का विकल्प होता है। आईपीओ प्रॉस्पेक्टस आपको बता सकता है कि किसी इश्यू में Greenshoe ऑप्शन है या नहीं। Greenshoe ऑप्शन का प्रयोग करते समय कोई नया शेयर जारी नहीं किया जाता है और निवेशकों को आवंटित अतिरिक्त शेयर प्रमोटरों से उधार लिए जाते हैं।