LIC IPO से खड़े होंगे कई सवाल, बनेंगी नई मिसाल, सामने आएंगे कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े मुद्दे

LIC की प्राइवेट सेक्टर की अन्य लिस्टेड कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी है। क्या ऐसे इनवेस्टमेंट करने, होल्ड करने और वोटिंग की नीति पब्लिक पॉलिसी से प्रभावित रहेगी या क्या वह इनवेस्टर्स के हितों को ध्यान में रखते हुए काम करेगी

अपडेटेड Feb 11, 2022 पर 12:32 PM
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एलआईसी का आईपीओ मार्च, 2022 तक आ सकता है

LIC IPO :  लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (Life Insurance Corporation of India) का आगामी IPO कई मामलों में दिलचस्प है। एक तो इसका आकार खासा बड़ा होने का अनुमान है और कंपनी अपनी महज 5 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही है।

अगला प्वाइंट यह है कि प्राइवेटाइज होने के साथ और एक नए रेगुलेटर के अलावा बाहरी इनवेस्टर्स के एक नए समूह की ऊंची और अलग तरह की उम्मीदों को देखते हुए सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी खुद में कैसे बदलाव करेगी।

फिर, यह सवाल भी है कि सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाली बीमा कंपनी से ज्यादा बाजार/ इनवेस्टर केंद्रित कंपनी में बदलने से उसका बिजनेस कैसे प्रभावित होगा और संभवतः इससे विरोधाभासी स्थिति पैदा होगी।


बिक सकते हैं कितने शेयर

इस स्टेज पर, पब्लिक इश्यू की डिटेल उपलब्ध नहीं है। किस कीमत पर शेयर जारी होंगे और इस प्रकार कितनी धनराशि आएगी, यह बड़ा सवाल है। इसका जबाव आधिकारिक घोषणा और ड्रॉफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट फाइल होने पर ही मिलेगा।

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हालांकि रेगुलेटरी शर्तों के तहत कम से कम 5 फीदी हिस्सेदारी बेचनी होगी। जिसे दो साल में बढ़ाकर 10 फीसदी और फिर अगले पांच साल में 25 फीसदी करना होगा। 5 फीसदी शेयर बेचने से 75,000 करोड़ रुपये तक पूंजी जुटाई जा सकती है। आगे 49 फीसदी तक शेयर बेचे जा सकते हैं, जिससे ज्यादा के लिए कानून में संशोधन करना होगा।

दोधारी तलवार

LIC के सामने एक हद तक विरोधाभास जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। नेशनलाइज्ड बैंकों की तरह, LIC को पॉलिसीहोल्डर्स द्वारा सुरक्षित और भरोसेमंद माना जाता है। LIC के पास अपने पॉलिसीहोल्डर्स के बकाये के लिए 100 फीसदी सॉवरेन गारंटी है, जो इसकी लोकप्रियता और प्रॉफिटेबिलिटी की बड़ी वजह है। हालांकि कई प्राइवेट कंपनियां कस्टमर्स को बेहतर सेवा देने के लिए जानी जाती हैं।

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यदि LIC प्राइवेटाइज होती है तो इस धारणा में बदलाव हो सकता है। प्राइवेट शेयरहोल्डर्स को संतुष्ट करने के दबाव का मतलब प्रॉफिट पर ज्यादा जोर देना होगा। प्राइवेट एंटिटी के रूप में दूसरे पहलुओं में प्रतिस्पर्धी रहने का ज्यादा दबाव होगा। अगर, इसके चलते LIC दूसरी प्राइवेट कंपनियों के जैसा बनती है तो उसके लिए यह दोधारी तलवार जैसा होगा। प्रतिस्पर्धी और प्रॉफिटेबिल होने की कोशिश में उसकी सेफ्टी में कमी आ सकती है।

खड़े होंगे कई सवाल

क्या वह गैर सरकारी कंपनियों की तरह कॉरपोरेट गवर्नेंस और अन्य नियमों को लागू करेगी? क्या सरकार के पास ज्यादा हिस्सेदारी और कंट्रोल रहने का मतलब यह होगा कि उसका पब्लिक पॉलिसी और नियमों और यहां तक कि मैनेजमेंट स्टाइल पर खासा प्रभाव बना रहेगा?

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रेगुलेशन और गारंटी

भले ही 2021 में हुए संशोधनों के बाद भी, चेयरमैन की नियुक्ति सरकार द्वारा ही की जाएगी। ऐसा ही हर एमडी के मामले में किया जाएगा। गैर सरकारी शेयरहोल्डर्स को 10 फीसदी तक हिस्सेदारी होने पर एक बोर्ड मेंबर चुनने और 10 से ज्यादा हिस्सेदारी होने पर दो मेंबर चुनने का मौका होगा। स्पष्ट रूप से यह पर्याप्त नहीं है और सरकार का कंट्रोल कम होगा या खत्म हो जाएगा, इस पर कम से कम एक पॉलिसी घोषित होनी चाहिए। अच्छी बात यह है कि मौजूदा स्कीम के तहत, LIC को दोनों तरह के नियमों का पालन करना पड़ सकता है और जहां सेबी की आवश्यकताएं जटिल हैं, उन्हें उनका पालन करना चाहिए।

LIC Act का सेक्शन 37 प्रभावी रूप से पॉलिसीहोल्डर्स को पॉलिसी के तहत उनके बकायों के लिए सॉवरेन गारंटी देता है। सवाल यह उठता है कि LIC के प्राइवेटाइज होने की स्थिति में क्या सरकार यह जिम्मेदारी उठाती रहेगी?

आदर्श रूप में, एक कट-ऑफ तारीख (शायद पब्लिक होल्डिंग के प्रतिशत से जुड़ी हुई) दी जाएगी और इस तारीख के बाद बनाए गए पॉलिसीहोल्डर्स की देनदारियों के लिए ऐसी गारंटी नहीं होगी।

निवेश का क्या होगा?

LIC के इनवेस्टमेंट को लेकर भी सवाल हैं। LIC की प्राइवेट सेक्टर की अन्य लिस्टेड कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी है। क्या ऐसे इनवेस्टमेंट करने, होल्ड करने और वोटिंग की नीति पब्लिक पॉलिसी से प्रभावित रहेगी या क्या वह इनवेस्टर्स के हितों को ध्यान में रखते हुए काम करेगी। LIC Act का सेक्शन 21 केंद्र सरकार को पब्लिक इंटरेस्ट से जुड़ी पॉलिसी के मामले में दिशानिर्देश देने का अधिकार देता है।

ये मुद्दे अन्य बड़े प्रस्तावित विनिवेश/ प्राइवेटाइजेशन के मामले में भी खड़े होंगे। इन मुद्दों को आगे बढ़कर दूर करना ही बेहतर है।

 

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