Tata Sons IPO: आरबीआई ने टाटा सन्स की स्टॉक मार्केट में लिस्टिंग से जुड़े नियमों में छूट की अपील को खारिज कर दिया है। करीब $18.5 हजार करोड़ के टाटा ग्रुप के केंद्र में मौजूद टाटा सन्स में आईटी सर्विसेज, स्टील, हॉस्पिटैलिटी और कंज्यूमर गुड्स जैसे कई बिजनेस शामिल हैं और अब नियमों के मुताबिक इसके शेयर लिस्ट होने हैं। हालांकि टाटा सन्स ऐसा नहीं चाहती है तो इसने एनबीएफसी लाइसेंस सरेंडर करने का एप्लीकेशन डाला जिसे आरबीआई ने खारिज कर दिया। बता दें कि टाटा सन्स पिछले वर्षों से मार्केट में लिस्ट होने का विरोध कर रही है लेकिन अब पिछले कुछ महीने से इस पर दबाव बढ़ा है।
Tata Sons क्यों नहीं चाहती लिस्ट होना और अब क्यों है दबाव?
टाटा सन्स इसलिए मार्केट में लिस्ट नहीं होना चाहती है क्योंकि इसके बाद कंपनी पर नियामकीय निगरानी अधिक सख्त हो जाएगी। इसके अलावा इसे टाटा ग्रुप के अंदर होने वाले लेन-देन और गतिविधियों की अधिक जानकारियों का खुलासा करना होगा। इससे यह सामने आ जाएगा कि टाटा ग्रुप के अंदर पैसा किस तरह एक कंपनी से दूसरी कंपनी में जा रहा है तो इसके मालिकों की इसे लेकर जवाबदेही बढ़ जाएगी कि कंपनी की पूंजी किस तरह इस्तेमाल की जा रही है।
हालांकि मई में आरबीआई ने NBFCs की परिभाषा में बदलाव किया, जिससे टाटा सन्स पर लिस्टिंग का दबाव बढ़ा है। आरबीआई ने यह बदलाव इसलिए किया ताकि किसी बड़ी फाइनेंशियल कंपनी की दिक्कत का झटका पूरे फाइनेंशियल सिस्टम को न लगे। इससे पहले वर्ष 2018 में एक एनबीएफसी अपने कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट कर गई थी। ऐसे में आरबीआई ने नियम बदले थे। साल 2022 में आरबीआई ने टाटा सन्स को अपर-लेयर एनबीएफसी की कैटेगरी में रखा यानी कि यह इतनी बड़ी कंपनी है जो दिक्कत में आती है तो पूरे वित्तीय सिस्टम पर असर पड़ सकता है। उस समय टाटा सन्स की बैलेंस शीट ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक थी। आरबीआई के नियमों के मुताबिक ऐसी कंपनियों को तीन साल के भीतर लिस्ट होना जरूरी है।
IPO से कैसे बच रही टाटा सन्स?
टाटा सन्स को सितंबर 2025 तक आईपीओ लाना था लेकिन कंपनी ने ऐसा नहीं किया। आरबीआई से बातचीत के बाद टाटा सन्स के मैनेजमेंट ने आईपीओ की तैयारियां रोक दी और उम्मीद जताई कि डेडलाइन बढ़ाने की आधिकारिक मंजूरी मिल जाएगी। हालांकि इसकी बजाय आरबीआई ने मई में नए नियम जारी करके टाटा परिवार पर लिस्टिंग का दबाव और बढ़ा दिया।
टाटा सन्स ने आरबीआई के सामने दलील दी कि उसे शैडो लेंडर की कैटेगरी में नहीं रखा जाना चाहिए और साल 2024 में इसने अपना एनबीएफसी लाइसेंस सरेंडर करने के लिए आवेदन किया और अपने आउटस्टैंडिंग कर्ज भी चुका दिया। हालांकि मई में नियमों में बदलाव से आईपीओ से बचने की गुंजाइश कम हो गई। ये नियम 1 जुलाई से लागू हुए हैं और यह नया फ्रेमवर्क सिर्फ उन होल्डिंग कंपनियों पर नहीं लागू होता जो सीधे लिस्टेड ग्रुप कंपनियों को कर्ज देती हैं बल्कि उन होल्डिंग कंपनियों पर भी लागू हो सकता है जो ऐसी ग्रुप कंपनियों में निवेश करती हैं जो खुद लेंडिंग एक्टिविटीज करती हैं।
टाटा ग्रुप की दिक्कत क्या है?
टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टीज का कहना है कि टाटा सन्स की बैलेंस शीट को मजबूत करने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, उनके कारण कंपनी की अनिवार्य लिस्टिंग से छूट मिलनी चाहिए। हालांकि टाटा सन्स ने अपना खुद का कर्ज कम तो किया है लेकिन इससे जुड़ी कंपनियां अभी भी पैसे जुटा रही हैं। इसमें टाटा कैपिटल भी है जो पैसे जुटाकर इसे कर्ज के रूप में बांटती है। अब दिक्कत ये है कि आरबीआई के सर्कुलर के हिसाब से ऐसी एनबीएसी खुद को डी-रजिस्टर नहीं कर सकती हैं, जो अपने हर दिन के बिजनेस के लिए ग्राहकों के साथ फाइनेंशियल बिजनेस में है। टाटा सन्स सीधे इस नियम के दायरे में नहीं है लेकिन टाटा कैपिटल के जरिए जरूर है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक इसी वजह से टाटा सन्स का छूट पाना मुश्किल हो जा रहा है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा सन्स की करीब 66% इक्विटी होल्डिंग है।
अगर लिस्ट हुई तो किसे होगा फायदा?
अब सवाल उठता है कि टाटा सन्स को लिस्ट कौन कराना चाहता है तो इसका जवाब है कि इसकी माइनॉरिटी शेयरहोल्डर-शपूरजी पालोनजी ग्रुप जिसने इसे लिस्ट कराने की मांग की है। एसपी ग्रुप का कहना है कि आईपीओ जरूरी है ताकि इसकी असली वैल्यू इंवेस्टर्स के सामने आए। टाटा सन्स में एसपी ग्रुप की अरबों डॉलर की हिस्सेदारी है और उसे पर काफी कर्ज भी है तो आईपीओ आने पर यह अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचकर कर्ज का बोझ हल्का कर सकता है।
डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।