April RBI policy : दरों में बदलाव की उम्मीद नहीं, महंगाई और ग्रोथ के बीच संतुलन पर होगा फोकस
April RBI policy : मौजूदा बॉन्ड यील्ड को देखते हुए ऐसा लगता है कि बाज़ार यह मानकर चल रहा है कि दरों में कुल 100 बेसिस प्वाइंट से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका असर बॉन्ड की कीमतों पर पहले से ही दिख रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि बॉन्ड के वैल्यूएशन ने खराब खबरों के असर को काफी हद पचा लिया है
अप्रैल पॉलिसी में MPC के सामने एक बहुत ही संतुलित फ़ैसला लेने की चुनौती है
April RBI policy : 6 से 8 अप्रैल,2026 तक होने वाली RBI मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) की मीटिंग ऐसे समय पर हो रही है जब भारतीय अर्थव्यवस्था एक नाजुक मोड़ पर है। भले ही महंगाई मोटे तौर पर मीडियम-टर्म टारगेट के साथ बनी रही और ग्रोथ इंडिकेटर मज़बूत बने रहे, अपनी फरवरी की मीटिंग में MPC ने पॉलिसी रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा और न्यूट्रल रुख बनाए रखा। उस समय,फाइनेंशियल हालात ठीक थे,सिस्टम में लिक्विडिटी अच्छी थी और ग्लोबल माहौल अनिश्चित होने के बावजूद संभालने लायक थे।
जैसे-जैसे अप्रैल की पॉलिसी नज़दीक आ रही है,वैसे-वैसे मैक्रोइकोनॉमिक माहौल और भी ज़्यादा जटिल होता जा रहा है। पश्चिम एशिया में युद्ध के तेज़ होने से ग्लोबल बाजार में जोखिम उठाने की भावना और कमोडिटी बाज़ारों में काफ़ी बदलाव आया है। सप्लाई में रुकावट और शिपिंग से जुड़े बढ़ते जोखिमों की चिंताओं के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। 2 अप्रैल, 2026 तक ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगभग 48 फीसदी तक बढ़ गई हैं।
इसके साथ ही,उभरते बाज़ारों को लेकर निवेशक ज्यादा सतर्क हो गए है। इन सब से चलते रुपये पर दबाव पड़ने लगा है। पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के बाद से रुपया लगभग 3 फीसदी कमज़ोर हो गया है। भारत के एक बड़ा ऊर्जा आयातक देश है। ऐसे में तेल और गैस के दाम में बढ़त से महंगाई बढ़ने और भारत के करेंट एकाउंट घाटे से जुड़ी चिंताएं बढ़ गई हैं।
जनवरी 2026 में रिटेल महंगाई दर 2.74 फीसदी थी,जो फरवरी 2026 में बढ़कर 3.21 फीसदी पर आ गई। हालांकि महंगाई दर RBI के 4 फीसदी के मध्यम-अवधि के लक्ष्य के दायरे में ही बनी हुई है,लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उछाल का महंगाई के आगे के अनुमानों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह का असर पड़ेगा। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से ईंधन,LPG और परिवहन का खर्च बढ़ जाता है। साथ ही,इससे सभी सेक्टरों की इनपुट लागत भी बढ़ जाती है।
भले ही घरेलू मांग की स्थिति काबू में रहे,लेकिन सप्लाई में दिक्कत आने से महंगाई बढ़ने का खतरा है। MPC शायद इस बात का आकलन करेगी कि ये दबाव सिर्फ कुछ समय के लिए हैं या इनसे कीमतों की स्थिरता को कोई ज़्यादा लंबे समय तक बना रहने वाला खतरा है।
महंगाई के अलावा,तेल और गैस बढ़ी हुई कीमतों का विकास की गति पर पड़ने वाले असर पर भी बारीकी से ध्यान देना ज़रूरी है। दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले भारत की विकास की गति काफ़ी मज़बूत रही है। Q3FY26 में हमारी GDP ग्रोथ घटकर 7.8 फीसदी रह गई,जबकि Q2FY26 में यह 8.4 फीसदी और Q1FY26 में 6.7 फीसदी थी। हालांकि,अगर एनर्जी की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो इससे कंपनियों के मुनाफ़े पर दबाव पड़ेगा और आम लोगों की खरीदने की ताक़त कम हो जाएगी। इससे विकास की गति धीमी पड़ सकती है।
एक्सपोर्ट ओरिएंटेड सेक्टरों को मिली-जुली स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। जहां एक ओर कमज़ोर रुपया कीमतों के मामले में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता को बढ़ाता है,वहीं दूसरी ओर धीमी ग्लोबल ग्रोथ और सप्लाई चेन में आने वाली दिक्कतें बाहरी मांग को सीमित कर सकती हैं। इसके साथ ही ईंधन और उर्वरकों की बढ़ती कीमतें ग्रामीण मांग और मैन्यूफैक्टरिंग सेक्टर के सेंटीमेंट पर भारी पड़ सकती हैं। इसलिए, RBI के सामने यह चुनौती है कि वह विकास को बढ़ावा देने की अपनी नीति और ग्लोबल फैक्टर्स के चलते उत्पन्न होने वाले बढ़ती महंगाई के जोखिम के बीच संतुलन कैसे बनाए।
सिस्टम में नकदी की स्थिति (लिक्विडिटी) की बात करें तो RBI ने 2026 की शुरुआत से ही ओपन मार्केट ऑपरेशंस और वेरिएबल रेट रेपो के ज़रिए सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखी है। इससे मनी मार्केट रेट्स तय पॉलिसी के आसपास ही बने रहे हैं। 1 अप्रैल,2026 तक, बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी 1.84 लाख करोड़ रुपये थी। इसके बावजूद,ग्लोबल स्तर पर जोखिम से बचने के बढ़ते ट्रेंड और बीच-बीच में होने वाली पूंजी की निकासी ने घरेलू फाइनेंशियल मार्केट में अस्थिरता पैदा कर दी है।
बॉन्ड मार्केट में भी वेस्ट एशिया संकट का असर देखने को मिल रहा है। 10-साल की G Sec यील्ड अभी 7.15 फीसदी के आसपास है, जबकि 10-साल की US ट्रेजरी यील्ड लगभग 4.40 फीसदी है। इसका मतलब है कि स्प्रेड (दोनों के बीच का अंतर ) लगभग 275 बेसिस प्वाइंट है,जो 2026 की शुरुआत के लगभग 240 बेसिस प्वाइंट से ज़्यादा है। बढ़ता हुआ स्प्रेड ज़्यादा रिस्क प्रीमियम दिखाता है। मौजूदा बॉन्ड यील्ड को देखते हुए ऐसा लगता है कि बाज़ार यह मानकर चल रहा है कि दरों में कुल 100 बेसिस प्वाइंट से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका असर बॉन्ड की कीमतों पर पहले से ही दिख रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि बॉन्ड के वैल्यूएशन ने खराब खबरों के असर को काफी हद पचा लिया है।
ऐसी स्थिति में अप्रैल पॉलिसी में MPC के सामने एक बहुत ही संतुलित फ़ैसला लेने की चुनौती है। जहां एक ओर मज़बूत घरेलू विकास दर सहायक वित्तीय स्थितियों को बनाए रखने के पक्ष में है,वहीं दूसरी ओर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, महंगाई बढ़ने का जोखिम,रुपये में गिरावट और बढ़ता करेंट एकाउंट डेफिसिट सावधानी बरतने की ज़रूरत पर जोर दे रहे हैं।
ऐसे में सबसे ज़्यादा संभावना यही है कि आरबीआई मौजूदा स्थिति को बनाए रखेगा,यानी पॉलिसी रेपो रेट 5.25 फीसदी पर ही बरकरार रहेगा और मौद्रिक रुख तटस्थ बना रहेगा। लेकिन अगर बाहरी दबाव बढ़ते हैं,तो उनसे निपटने की गुंजाइश भी बनी रहेगी।
ध्यान रखें कि मौजूदा जोखिम ज़्यादातर बाहरी कारणों से हैं। ऐसे में वित्तीय स्थितियों को ज्यादा सख़्त करने से घरेलू विकास पर काफ़ी ज़्यादा दबाव
पड़ सकता है। इसलिए,RBI अपनी नीति को इस तरह से तय करेगा कि वह महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक गति को बनाए रखने की ज़रूरत के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बना सके।
डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।