Budget 2026 Expectations: ये ऐलान भरेंगे बैंकिंग स्टॉक्स में चाबी, RBI को भी मिलेगा ऐसे सपोर्ट

Budget 2026 and Banking Stocks: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रिकॉर्ड लगातार नवें बार देश का बजट पेश करने वाली हैं। इस बार के बजट पर बैंकिंग सेक्टर की निगाहें लगी हुई हैं क्योंकि बैंकिंग स्टॉक्स की रफ्तार इस साल सुस्त पड़ी है और अब इसे खास ऐलानों का इंतजार है जो RBI की नीतियों पर भी असर डाल सकते हैं। जानिए बजट के क्या ऐलान बैंकिंग स्टॉक्स को सपोर्ट करेंगे और आरबीआई की नीतियों पर इसका कैसे असर पड़ेगा?

अपडेटेड Jan 29, 2026 पर 3:30 PM
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Budget 2026 and Banking Stocks: इस साल 2026 में अब तक बैंकिंग स्टॉक का परफॉरमेंस मिला-जुला रहा है। अब इसे बजट का इंतजार है।

Budget 2026 and Banking Stocks: पिछले साल अधिकतर समय बैंकिंग स्टॉक्स बेहतर वैल्यूएशन, बेहतर होती एसेट क्वालिटी और स्थिर आय के दम पर लगातार बढ़त हासिल करने के बाद इस साल 2026 में बैंकिंग सेक्टर की रफ्तार सुस्त होती दिख रही है। वैश्विक कारोबारी तनाव, टैरिफ की आंच और दिसंबर तिमाही के औसत नतीजों ने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया, जिसके चलते निवेशक सतर्क हो गए हैं। ऐसे में बैंकिंग स्टॉक्स को लेकर अब दो अहम इवेंट आने वाले हैं, एक तो बजट और दूसरा RBI के मौद्रिक नीतियों के कमेटी की बैठक। ये दोनों मिलकर बैंकिंग स्टॉक्स के लिए आगे की चल तय करेंगे।

इस साल 2026 में अब तक बैंकिंग स्टॉक का परफॉरमेंस मिला-जुला रहा है। एक तरफ एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) और कोटक महिंद्रा बैंक (Kotak Mahindra Bank) के शेयर करीब 7% तक टूटे हैं, तो आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) में मामूली तेजी आई है। वहीं दूसरी तरफ एसबीआई (SBI), बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) और एक्सिस बैंक (Axis Bank) के साथ-साथ फेडरल बैंक (Federal Bankl) में करीब 8% की तेजी आई।

Budget से RBI और Banking Stocks को क्या मिल सकती है सहूलियतें?


मनीकंट्रोल के पोल में कई इकनॉमिस्ट्स और फंड मैनेजर्स ने अनुमान लगाया है कि फरवरी में आरबीआई के मौद्रिक नीतियों के कमेटी की बैठक में यथास्थिति बनाए रखने पर फैसला होगा। हालांति 'न्यूट्रल' के बने रहने से इस साल 2026 में आगे चलकर ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश बनी रह सकती है। जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के रिसर्च हेड विनोद नायर का मानना है कि इस साल 2026 में कम से कम एक बार दरों में कटौती हो सकती है। हालांकि उनका यह भी कहना है कि अगर वैश्विक कारोबार में देरी होती है, खासतौर से अमेरिका के साथ तो ग्रोथ की संभावनाओं पर दबाव दिख सकता है और दरों में दो से तीन कटौतियां हो सकती हैं। हालांकि यह कटौती कब तक होगी, यह काफी हद तक सरकार के उधार जुटाने के प्रोग्राम और बजट में कैपिटल एक्सपेंडिचर के रोडमैप पर निर्भर करेगा।

बजट के ऐलानों से यह तय होगा कि बैंकिंग सेक्टर में रैली आएगी या बजट के बाद बिकवाली की आंधी चलेगी। राजकोषीय घाटे का भरोसेमंद रास्ता, एक हद में उधारी के आंकड़े और कैपेक्स का सपोर्ट बने रहने से बॉन्ड यील्ड को नियंत्रित रखने, लिक्विडिटी ट्रांसमिशन में सुधार के साथ-साथ बिना रुपये या डेट मार्केट में हलचल किए आरबीआई को नीतिगत ढील देने की सहूलियत दे सकती है। राजकेषीय स्तर पर सपोर्ट मिला तो बैंकों को अगले चरण के रेट साइकिल को संभालने में सहारा मिलेगा, खासतौर से तब जब दिसंबर तक की दर कटौती का असर मार्जिन पर महसूस होने लगे।

दर कटौती का मार्जिन पर कितना असर?

आमतौर पर ब्याजा दरों में कटौती से क्रेडिट ग्रोथ और एसेट क्वालिटी को सपोर्ट मिलता है लेकिन बैंकों के लिए सबसे मुख्य यह होता है वह मुनाफे के साथ अपने मार्जिन को कितने अच्छे से बचा पाते हैं। दिसंबर तिमाही के कारोबारी नतीजे से सामने आया है कि प्राइवेट बैंकों ने अब तक दरों में 125 बेसिस प्वाइंट्स की कुल कटौतियों के बावजूद मार्जिन को संभाले रखा है। एक्सिस सिक्योरिटीज की BFSI एनालिस्ट Dnyanada Vaidya का कहना है कि तीसरी तिमाही में सीआरआर के कम होने और डिपॉजिट रीप्राइसिंग से मार्जिन को सपोर्ट मिला। उनका कहना है कि दिसंबर में जो ब्याज दरें कम हुई थी, उसका पूरा असर मार्च तिमाही में दिखना शुरू होगा, जिससे एसेट यील्ड पर दबाव पड़ेगा। हालांकि टर्म डिपॉजिट्स के लगातार रीप्राइसिंग से मार्जिन को कुछ सहारा मिलता रह सकता है, लेकिन इसकी स्पीड धीमी रह सकती है।

बता दें कि बैंक ब्याज दरों में कटौती के असर को कम करने के लिए अपनी रणनीतियों में लगातार बदलाव कर रहे हैं। दिसंबर तिमाही में फेडरल बैंक और एचडीएफसी बैंक जैसे बैंकों ने कम लागत वाले सेविंग्स और करेंट अकाउंट्स में डिपॉजिट्स को बढ़ाने पर फोकस किया ताकि एसेट यील्ड में गिरावट की भरपाई की जा सके। वहीं आरबीएल बैंक ने फिक्स्ड-रेट वाले लोन पर अधिक जोर दिया।

एंबिट कैपिटल में BFSI के डायरेक्टर और लीड जिग्नेश शियाल का कहना है कि चूंकि डिपॉजिट्स रीप्राइसिंग काफी हद तक पूरा हो चुका है तो आगे अगर रेपो रेट में और कटौती होती है तो मार्जिन में कुछ दबाव आ सकता है। हालांकि उनका यह भी कहना है कि बैंकिंग सेक्टर की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है। उनका मानना है कि जब आरबीआई सिस्टम लिक्विडिटी और लोन-टू-डिपॉजिट रेश्यो को लेकर नरम है, बैंकिंग सेक्टर में माहौल बेहतर ही दिख रहा है।

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