DII vs FII: पहली बार Nifty 50 में हुआ ऐसा, विदेशी निवेशकों से अधिक हुई घरेलू हिस्सेदारी, इन स्टॉक्स पर अधिक दांव

DII vs FII: वैश्विक मार्केट में अनिश्चितता और भारी उठा-पटक के बीच घरेलू स्टॉक मार्केट में काफी स्ट्रक्चरल बदलाव आया। घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी 50 (Nifty 50) में पहली बार घरेलू इंस्टीट्यूशनल इंवेस्टर्स (DIIs) की होल्डिंग विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) से अधिक हो गई है। चेक करें कि किन स्टॉक्स के होल्डिंग में अधिक हलचल दिखी?

अपडेटेड Feb 09, 2026 पर 10:08 AM
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DII vs FII: निफ्टी50 में एफआईआई की हिस्सेदारी सालाना आधार पर 90 बेसिस पॉइंट और तिमाही आधार पर 20 बेसिस पॉइंट घटी है, जबकि डीआईआई की हिस्सेदारी सालाना आधार पर 170 बेसिस पॉइंट और तिमाही आधार पर 30 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के साथ रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है।

DII vs FII: पहली बार ऐसा हुआ है कि घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) का निफ्टी 50 (Nifty 50) में दबदबा विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) से अधिक हुआ है। यह मार्केट में अहम स्ट्रक्चरल बदलाव को दिखाता है। मोतीलाल ओसवाल सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2025 तिमाही के शेयरहोल्डिंग पैटर्न के हिसाब से डीआईआई की निफ्टी 50 में 24.8% हिस्सेदारी है तो विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई की हिस्सेदारी घटकर 24.3% पर आ गई जोकि आठ तिमाहियों में सबसे कम है। बता दें कि डीआईआई ने इससे पहले ओवरऑल स्टॉक मार्केट में अपने दबदबे के मामले में विदेशी निवेशकों को पीछे छोड़ा था और अब देश की 50 सबसे अधिक मार्केट कैप वाली कंपनियों में भी पीछे छोड़ दिया। वैल्यू टर्म में भी डीआईआई निकल गई है। डीआईआई के पास करीब $2480 करोड़ के एसेट्स हैं तो एफआईआई होल्डिंग करीब $2430 करोड़ की है।

DII vs FII: इस कारण जीती बाजी

आनंद राठी ग्लोबल फाइनेंस में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट नवीन व्यास का कहना है कि निफ्टी 50 में दबदबे में बदलाव किसी साइक्लिकल रुझान की बजाय एक स्ट्रक्चरल बदलाव को दिखा रहा है। नवीन के मुताबिक इसे पिछले साल 2025 में एसआईपी में ₹3.34 लाख करोड़ के बढ़े हुए मजबूत निवेश, इक्विटी मार्केट में पेंशन फंड्स की बढ़ती भागीदारी और भारत में नई एसेट मैनेजमेंट कंपनियों की शुरुआत से सपोर्ट मिला है।


वहीं दूसरी तरफ विदेशी निवेशक रुपये की कमजोरी और दूसरे बाजारों में बेहतर रिटर्न के बेहतर मौके के चलते भारतीय इक्विटी में अपनी हिस्सेदारी धीरे-धीरे घटा रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले पांच साल में डीआईआई ने मार्केट को काफी सहारा दिया है, जिसके चलते एफआईआई की करीब ₹9.96 लाख करोड़ की कम्यूलेटिव सेलिंग के बावजूद निफ्टी ने करीब 72 से 75% का एब्सोल्यूट रिटर्न दिया।

ओम्नीसाइंस कैपिटल में प्रेसिडेंट और चीफ पोर्टफोलियो मैनेजर अश्विनी शामी का कहना है कि डीआईआई का दबदबा काफी हद तक टिकाऊ है। उनका कहना है कि बाजार में गिरावट के दौरान भी इनका निवेश पूरी तरह पलटने की बजाय धीमा ही होगा, क्योंकि एसआईपी, ईपीएफओ और बीमा निवेश लॉन्ग टर्म के होते हैं।

किन स्टॉक्स के होल्डिंग में दिखी अधिक हलचल?

निफ्टी50 में एफआईआई की हिस्सेदारी सालाना आधार पर 90 बेसिस पॉइंट और तिमाही आधार पर 20 बेसिस पॉइंट घटी है, जबकि डीआईआई की हिस्सेदारी सालाना आधार पर 170 बेसिस पॉइंट और तिमाही आधार पर 30 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के साथ रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है। दिसंबर तिमाही में एफआईआई ने निफ्टी50 की लगभग 78% कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटाई, तो डीआईआई ने इंडेक्स की करीब 82% कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई।

सालाना आधार पर डीआईआई की एटर्नल, डॉ रेड्डीज लैबोरेट्रीज, एशियन पेंट्स, टेक महिंद्रा, इंटरग्लोब एविएशन, ट्रेंट, मैक्स हेल्थकेयर इंस्टीट्यूट, श्रीराम फाइनेंस, एक्सिस बैंक, बजाज ऑटो और टाटा कंज़्यूमर प्रोडक्ट्स में चार पर्सेंटेज प्वाइंट्स से अधिक बढ़ी। वहीं विदेशी निवेशकों ने कुछ ही कंपनियों- भारती एयरटेल, आयशर मोटर्स, ग्रासिम इंडस्ट्रीज, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, बजाज फिनसर्व, बजाज फाइनेंस, हिंदाल्को इंडस्ट्रीज, मारुति सुज़ुकी इंडिया, विप्रो और इंटरग्लोब एविएशन में अपनी हिस्सेदारी सालाना आधार पर बढ़ाई।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

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