इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को बड़ा बूस्ट, ECMS के तहत 22 नए प्रस्ताव मंजूर, 33791 लोगों को मिलेगा रोजगार

इस स्कीम में 11 प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद शामिल हैं। इस पैसे का मोबाइल, टेलीकॉम, ऑटो, कंज्यूमर, रणनीतिक इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग होगा। ये परियोजनाएं आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और MP में हैं

अपडेटेड Jan 03, 2026 पर 3:58 AM
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इससे भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में मदद मिलेगी। यूनियन मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि 2026 में 4 कंपनियां सेमीकंडक्टर यूनिट शुरू करेंगी

सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के तहत 22 नए प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इसमें डिक्सन, मदरसन, हिंडाल्को जैसे नाम शामिल हैं। इन परियोजनाओं में कुल 41 हजार 863 करोड़ रुपए का निवेश होगा। इस पर ज्यादा डिटेल्स के साथ सीएनबीसी-आवाज़ संवाददाता असीम मनचंदा ने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट देने के लिए सरकार ने ECMS के तहत 22 नए प्रस्तावों को मंजूरी दी है। सरकार ने डिक्सन, मदरसन, हिंडाल्को, BPL के प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं में कुल 41,863 करोड़ रुपए का निवेश होगा। इससे करीब 2,58,152 करोड़ रुपए का उत्पादन होगा और 33,791 लोगों को सीधे रोजगार मिलेगा।

जिन कंपनियों को आज मंजूरी मिली है वे कैपेसिटर,इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के लिए लीथियम-आयन सेल, कॉपर-क्लैड लैमिनेट, एन्क्लोज़र, एनोड मटीरियल, कनेक्टर, डिस्प्ले और कैमरा मॉड्यूल जैसे पुर्जे बनाएंगी।

इस स्कीम में 11 प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद शामिल हैं। इस पैसे का मोबाइल, टेलीकॉम, ऑटो, कंज्यूमर, रणनीतिक इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग होगा। ये परियोजनाएं आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और MP में हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, UP और राजस्थान में भी कुछ परियोजनाएं हैं। सरकार की इस स्कीम से घरेलू सप्लाई चेन मजबूत होगी और इंपोर्ट पर निर्भरता कम होगी। इससे भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में मदद मिलेगी।


केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि 2026 में 4 कंपनियां सेमीकंडक्टर यूनिट शुरू करेंगी। माइक्रोन, केन्स, CG इलेक्ट्रॉनिक्स और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स चिप बनाएंगी। वैष्णव ने यह भी सुझाव दिया कि जिन कंपनियों को इस योजना के तहत मंज़ूरी मिली है, उन्हें शैक्ष​णिक संस्थान में मानक डिजाइन सुविधा विकसित करने के लिए उद्योग निकाय के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि कंपनियों, खास तौर पर छोटे-मझोले उपक्रमों को उनका फायदा मिल सके।

 

 

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