विदेशी निवेशकों ने HDFC बैंक और ICICI बैंक में कुल मिलाकर लगभग 45,000 करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं। यह मार्च तिमाही के दौरान फाइनेंशियल शेयरों से हुए कुल FII आउटफ्लो का लगभग 75 प्रतिशत है,जो लगभग 60,000 करोड़ रुपये के आसपास होता है। इस तिमाही के दौरान FIIs ने HDFC Bank में लगभग 35,000 करोड़ रुपये यानी करीब 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी बेच दी,जबकि ICICI Bank में लगभग 10,000 करोड़ रुपये यानी 9.4 प्रतिशत हिस्सेदारी बेची। इसके चलते,मार्च तिमाही में HDFC Bank में FII की हिस्सेदारी पिछली तिमाही के 47.66 प्रतिशत से घटकर 44 प्रतिशत रह गई। ICICI Bank में FII की हिस्सेदारी 43.87 प्रतिशत से गिरकर लगभग 34.48 प्रतिशत हो गई।
इस दौरान दोनों शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली। HDFC Bank 26 प्रतिशत और ICICI Bank 10 प्रतिशत गिरा है। जबकि बेंचमार्क Sensex और Nifty में करीब 15 प्रतिशत की गिरावट आई है। HDFC बैंक में गिरावट की एक वजह इसके चेयरमैन का नैतिकता के आधार पर अचानक इस्तीफ़ा देना भी था। इससे निवेशकों में घबराहट फैल गई थी। मोटे तौर पर ट्रेड वार और अमेरिका-ईरान-इज़राइल संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक तनावों के चलते बैंकिंग शेयरों पर दबाव बना रहा।
दोनों बैंकों की कमज़ोरी का संबंध रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के हालिया फ़ॉरेक्स मार्केट उपायों के कारण ट्रेज़री आय में आई गिरावट से भी रहा। इसके साथ ही जनवरी-मार्च की अवधि के दौरान इक्विटी और बॉन्ड बाज़ारों में भी व्यापक गिरावट देखने को मिली थी। मार्च में RBI ने ऑनशोर डिलीवरेबल मार्केट में बैंकों की नेट ओपन पोज़िशन (NOP) की सीमा 10 करोड़ डॉलर तय कर दी थी। बड़े बैंकों को,जिनकी NOP 25–30 करोड़ डॉलर होने का अनुमान था,10 अप्रैल तक अपनी पोज़िशन कम करने का निर्देश दिया गया।
शेयर पर दबाव के बावजूद,दोनों बैंकों ने मजबूत नतीजों की जानकारी दी है। उनके मुनाफ़े में अच्छी बढ़त दिखी है,एसेट क्वालिटी स्थिर बनी हुई है और क्रेडिट ग्रोथ भी मजबूती जारी है। उनकी बैलेंस शीट ज़्यादा मज़बूत दिख रही हैं, कैपिटल बफ़र बेहतर स्थिति में हैं और मैनेजमेंट की टिप्पणियों से आत्मविश्वास झलक रहा है, जो उनकी अंदरूनी मज़बूती को दिखाता है।
हालांकि इनकी आगे की चाल बहुत हद तक ग्लोबल मार्केट की स्थितियों से जुड़ी हुई है। मध्य पूर्व में लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष तेल की कीमतों,मुद्रा की स्थिरता और महंगाई पर असर डाल सकता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि तेल की कीमतें बढ़ने से इनपुट लागत बढ़ सकती है,घरेलू बजट पर दबाव पड़ सकता है और मांग धीमी हो सकती है,जिसका आगे चलकर एसेट क्वालिटी पर असर पड़ सकता है।