Groww से टेस्ला, एनवीडिया, एमेजन जैसी यूएस कंपनियों में कर सकते हैं इनवेस्ट, जानिए इसके नियम और शर्तें

Groww की यह सुविधा ग्रो आईएफएससी प्राइवेट लिमटेड के जरिए मिलेगी। यह ग्रो की सब्सिडियरी है जो गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (GIFT City) में स्थित है। इसके पास इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी (IFSCA) का ग्लोबल एक्सेस प्रोवाइडर लाइसेंस है

अपडेटेड Oct 30, 2026 पर 7:03 PM
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अमेरिकी शेयरों में निवेश करने के लिए इनवेस्टर को डिपॉजिट और विड्रॉल पर करेंसी कनवर्जन पर लगने वाला चार्ज चुकाना होगा।

ब्रोकरेज फर्म ग्रो ने अमेरिकी कंपनियों के शेयरों में निवेश की सुविधा शुरू कर दी है। एलिजिबल भारतीय अब टेस्ला, अल्फाबेट (गूगल), एनवीडिया, एपल, माइक्रोसॉफ्ट और एमेजन जैसी कंपनियों के शेयरों में निवेश कर सकते हैं। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

ग्रो की यह सुविधा गिफ्ट सिटी के जरिए मिलेगी

Groww की यह सुविधा ग्रो आईएफएससी प्राइवेट लिमटेड के जरिए मिलेगी। यह ग्रो की सब्सिडियरी है जो गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (GIFT City) में स्थित है। इसके पास इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी (IFSCA) का ग्लोबल एक्सेस प्रोवाइडर लाइसेंस है।


अमेरिकी ईटीएफ में भी कर सकते हैं निवेश 

एलिजिबल भारतीय को पहले रजिस्ट्रेशन प्रोसेस पूरा करना होगा। उसके बाद वे ग्रो के प्लेटफॉर्म के जरिए अमेरिकी शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों के शेयरों और ईटीएफ में निवेश कर सकते हैं। भारतीय इनवेस्टर का अमेरिकी शेयरों में निवेश RBI की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के जरिए होगा। इस स्कीम के तहत कोई भारतीय एक वित्त वर्ष में विदेश में 2,50,000 डॉलर तक इनवेस्ट कर सकता है या पैसे भेज सकता है।

ग्रो ने अमेरिकी ब्रोकरेज फर्म से किया समझौता

ग्रो ने अमेरिकी शेयरों में निवेश की सुविधा भारत में ऑफर करने के लिए अमेरिकी ब्रोकरेज फर्म Alpaca से समझौता किया है। Alpaca सिक्योरिटीज इनवेस्टर प्रोटेक्शन कॉर्पोरेशन (SIPC) का सदस्य है। अमेरिकी शेयरों में निवेश करने के लिए इनवेस्टर को डिपॉजिट और विड्रॉल पर करेंसी कनवर्जन पर लगने वाला चार्ज चुकाना होगा। इसके अलावा ब्रोकरेज फीस और जीएसटी भी देना होगा। इसके अलावा ट्रांजेक्शन पर अमेरिकी रेगुलेटरी चार्ज भी लगेगा।

निवेशक शेयर का एक हिस्सा भी खरीद सकते हैं

ग्रो की इस सुविधा के तहत भारतीय निवेशक शेयर के एक हिस्से को भी खरीद सकता है। चूंकि, अमेरिकी कंपनियों के शेयर की कीमत डॉलर में होती है। उसे रुपये में कनवर्ट करने पर उसकी कीमत काफी ज्यादा आती है। ऐसे में इनवेस्टर एक पूरे शेयर को खरीदने की जगह उसके एक हिस्से को खरीद सकते हैं। इसे फ्रैक्शनल इनवेस्टमेंट कहा जाता है। अमेरिका में निवेशकों को फ्रैक्शनल इनवेस्टमेंट की इजाजत है।

अमेरिकी शेयरों में निवेश के रिस्क को समझ लें

भारतीय निवेशक को अमेरिकी शेयरों में निवेश करने से पहले उनसे जुड़े रिस्क को समझ लेना जरूरी है। पहला, निवेशक के निवेश पर अमेरिकी शेयर बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर पड़ेगा। दूसरा, निवेश की वैल्यू पर डॉलर और रुपये के एक्सचेंज रेट का भी असर पड़ेगा। तीसरा, किसी अमेरिकी कंपनी के शेयर में निवेश से पहले उस कंपनी के बिजनेस, वित्तीय स्थिति, कर्ज के बोझ, प्रॉफिट और रेवेन्यू को भी समझना जरूरी है।

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