स्टॉक मार्केट्स में आई गिरावट लंबी अवधि के इनवेस्टर्स के लिए निवेश शुरू करने का शानदार मौका है। यह कहना है कि आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एसेट मैनेजमेंट कंपनी के चीफ इनवेस्टमेंट ऑफिसर एस नरेन का। उन्होंने कहा कि यूक्रेन पर रूस के हमले से नए तरह की जियोपॉलिटिकल क्राइसिस सामने आई है। इसके चलते नियर फ्यूचर में स्टॉक मार्केट्स में हालात कैसे रहेंगे, यह बताना मुश्किल है। मनीकंट्रोल ने मार्केट की वर्तमान स्थिति और इसके फ्यूचर के बारे में नरेन से लंबी बातचीत की। यहां पेश है इंटरव्यू का प्रमुख अंश।
स्टॉक मार्केट अपने टॉप से 15 फीसदी गिर चुका है, इससे इनवेस्टर्स निराश हैं, आप उन्हें क्या कहना चाहेंगे?
पिछले कुछ महीनों में हालात बदल गए हैं। पिछले चार महीनों में फॉरने इनवेस्टर्स बिकवाली कर रहे थे। लोकल इनवेस्टर्स खरीद रहे थे। रिटेल इनवेस्टर्स बहुत उत्साहित थे। आईपीओ का ओवरसब्सक्राइब्ड होना इसका सबूत है। अप्रैल 2020 से नवंबर 2021 के बीच मार्केट में एक तरफा तेजी से इनवेस्टर्स यह मानने लगे थे कि शेयरों में कोई रिस्क नहीं है। वैल्यूएशन और इनवेस्टर्स के उत्साह को लेकर थोड़ी दिक्कत दिख रही थी। यही वजह है कि हम एसेट एलोकेशन और डेट फंड्स रेकमेन्ड करते हैं।
जियोपॉलिटिकल टेंशन शेयरों में इनवेस्ट करने का सही मौका होता है, क्या यह समय थोड़ा अलग है?
आपने सही कहा कि यह समय थोड़ा अलग है। मैं अपने दोस्तों को बता रहा था कि आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में संयोग से 18 साल बिताने के बाद मैं कह सकता हूं कि मैंने कभी युद्ध नहीं देखा था। अब मैं देख रहा हूं और यह बहुत निराशाजनक है। सच्चाई यह है कि स्थिति बहुत कॉम्पलेक्स है। नियर फ्यूचर के लिए कुछ कहना बहुत मुश्किल है। हां, बाजार से रिटर्न के लिए यूक्रेन क्राइसिस सॉल्व होना जरूरी है। इसलिए नियर टर्म में मार्केट प्रॉस्पेक्ट पूरी तरह से यूक्रेन मसले पर निर्भर करता है। अगर यह प्रॉब्लम और बढ़ती है तो मार्केट में और गिरावट से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर प्रॉब्लम सॉल्व हो जाती है तो मार्केट में तेज रैली दिख सकती है।
पिछले सालों में हमने यह लेसन लिया है कि ऐसे मुश्किल समय के लिए एसेट एलोकेशन जरूरी है। लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह मार्केट करेक्शन अगले 12 से 18 महीने में सिस्टमेटिकली इनवेस्ट करने का शानदार मौका है। इसकी वजह यह है कि लंबी अवधि में हमें इंडिया की ग्रोथ स्टोरी में भरोसा है। हम इनवेस्टर्स को एसेट एलोकेशन के साथ इक्विटी और डेट फंड्स दोनों में सिस्टमैटिक इनवेस्टमेंट जारी रखने की सलाह देंगे।
अब तक इनफ्लेशन आरबीआई के लिए बड़ी चिंता नहीं रहा है, लेकिन क्रूड में उछाल से यह बड़ी चिंता लग रहा है, आप क्या कहना चाहेंगे?
ऑयल प्राइसेज में बड़ा उछाल इंडिया के लिए निगेटिव है। हम देख चुके हैं कि 2011-13 में ऑयल प्राइसेज बढ़ने से ऑयल सब्सिडी बढ़ गई थी। इसके चलते करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ा था और रुपये में कमजोरी आई थी। इनफ्लेशन भी बढ़ा था। कमोडिटी की बढ़ती कीमतें आरबीआई और इंडियन इकोनॉमी के लिए चैलेंज है।
अगर आप आरबीआई के चीफ हैं तो फिर आज आपके लिए बहुत बड़ा चैलेंज है। अगर सनफ्लावर ऑयल, एलुमीनियम और स्टील की कीमतें बढ़ती हैं तो फिर यह कहना मुश्किल होगा कि महंगाई में वृद्धि थोड़े समय के लिए है।