Investment Mantar : शेयर बाजार में निवेश तो आप करते ही हैं, लेकिन इन दिनों फैक्टर इन्वेस्टिंग की चर्चा जोरों पर है। आखिर क्या है फैक्टर इन्वेस्टिंग और क्या इसमें बेहतर रिटर्न मिल सकते हैं? और क्या हर फैक्टर हर समय काम करता है? इसके साथ ही निवेशक इन दिनों थोड़ी उलझन में हैं। एक तरफ तो MF पोर्टफोलियो बाजार की गिरावट में घट रहा है तो दूसरी तरफ EMI बढ़ने वाली है। ऐसे में क्या MF बेचकर लोन चुकाना समझदारी है? इसी पर आज अपनी राय रख रहे हैं ऑप्टिमा मनी के फाउंडर पंकज मठपाल। आइए पहले समझते हैं कि फैक्टर इन्वेस्टिंग क्या है।
फैक्टर इन्वेस्टिंग क्या है?
फैक्टर इन्वेस्टिंग में कुछ खास खूबियों के आधार पर शेयरों में निवेश किया जाता है। जैसे, इसके चहत वैल्यू, क्वालिटी, मोमेंटम, लो वोलैटिलिटी और साइज के आधार पर निवेश किया जाता है। इसमें सिर्फ कंपनी के साइज पर नहीं, बल्कि उसके खास फैक्टर पर फोकस होता है। फैक्टर इन्वेस्टिंग और एक्टिव फंड्स की तुलना करें तो एक्टिव फंड्स में फंड मैनेजर के फैसले अहम होते हैं। वहीं, फैक्टर फंड्स तय नियमों और डाटा पर फैसले लेते हैं। इसका फायदा यह है कि फैक्टर फंड्स में फंड मैनेजर की मनमानी कम होती है। फैक्टर इन्वेस्टिंग Vs सामान्य इंडेक्स की बात करें तो सामान्य इंडेक्स में कंपनियों का वेटेज मार्केट कैप से तय होता है। वहीं, फैक्टर इंडेक्स में वैल्यू, क्वालिटी, मोमेंटम को प्राथमिकता मिलती है।
फैक्टर इन्वेस्टिंग के फंडे, क्या मिलेगा बेहतर रिटर्न?
फैक्टर इन्वेस्टिंग में खास तरह से निवेश से बेहतर रिटर्न का मौका संभव होता है। जैसे इसमें मोमेंटम में चलने वाले शेयरों पर फोकस होता है। वहीं वैल्यू में ऐसे शेयर चुने जाते हैं जो सस्ते मिल रहे हैं। बाजार में मिलने वाले मौकों से फायदा उठाने की कोशिश होती है। फैक्टर इन्वेस्टिंग में रिटर्न हमेशा एक जैसा नहीं होता कोई भी फैक्टर फंड हर समय अच्छा प्रदर्शन नहीं करता। कभी मोमेंटम अच्छा चलता है, तो कभी वैल्यू या क्वालिटी। किसी फैक्टर का प्रदर्शन लंबे समय तक कमजोर भी रह सकता है। इसलिए फैक्टर फंड में निवेश के लिए धैर्य और लंबी अवधि जरूरी है।
सिंगल फैक्टर बनाम मल्टी फैक्टर
सिंगल फैक्टर में एक ही फैक्टर पर फोकस होता है। वहीं, मल्टी फैक्टर दो या उससे ज्यादा फैक्टर पर फोकस करते हैं।
अच्छा प्रदर्शन करने वाले फैक्टर फंड के पीछे ना भागें। जो आज अच्छा कर रहे हैं, जरूरी नहीं आगे भी करें। फैक्टर फंड को पूरे पोर्टफोलियो का बेस ना बनाएं। इसे एक छोटे हिस्से के तौर पर रखा जा सकता है। बाकी निवेश डाइवर्सिफाइड फंड्स में हो सकता है। कितना निवेश करना है, यह रिस्क और निवेश अवधि पर निर्भर करता है।
क्या MF बेचकर लोन चुकाएं?
पंकज मठपाल ने कहा कि बाजार में गिरावट का मतलब यह नहीं होता कि आपका निवेश खराब है। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य है। थोड़े समय के कमजोर रिटर्न से लंबी अवधि की रणनीति ना बदलें। कम समय के रिटर्न से फैसला ना लें। बाजार गिरने पर MF बेचने से आगे की तेजी छूटेगी। बाजार कब पलटेगा, यह कोई नहीं जानता। अपना गोल तय करें। देखें कि निवेश जिस लक्ष्य के लिए किया गया, क्या वो लक्ष्य पूरा हुआ? सिर्फ बाजार गिरने की वजह से पैसा निकालना सही नहीं होता।
गिरावट से डरकर फैसला ना लें बाजार गिरता है,डर बढ़ता है और निवेशक बेचता है। बाजार चढ़ता है, भरोसा बढ़ता है और निवेशक खरीदता है। इससे यही सीख मिलती है कि कम भाव पर बेचने और महंगे पर खरीदने की गलती होती है। लोन की दर और निवेश की अवधि देखें। लोन पर 8–9% ब्याज और इक्विटी से लंबे समय में 12% रिटर्न की उम्मीद होती है। सिर्फ 1–2 साल के रिटर्न से तुलना ना करें। इन्वेस्टिंग में गोल, निवेश अवधि, रिस्क लेने की क्षमता अहम होते हैं। बाजार गिरने पर डरकर MF बेचने से बचें। अच्छा रिटर्न मिलने पर पोर्टफोलियो की समीक्षा करें। जरूरत हो तो कुछ मुनाफा निकाला जा सकता है। लेकिन हर तेजी में MF बेचने की जरूरत नहीं है।
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