मनीकंट्रोल द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस, डेल्टा कॉर्प और मणप्पुरम फाइनेंस उन शेयरों में से हैं जो 2023 में एनएसई की फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफएंडओ) प्रतिबंध सूची में सबसे ज्यादा बार शामिल हुए हैं। इंडियाबुल्स हाउसिंग 50 बार इस बैन लिस्ट में शामिल होने के साथ इस सूची में शीर्ष पर है। इसके बाद डेल्टा कॉर्प 35 बार और मणप्पुरम 33 बार इस बैन लिस्ट में शामिल हुए हैं। दूसरे तरीके से कहें तो इंडियाबुल्स का स्टॉक हर तीसरे कारोबारी सत्र में इस बैन लिस्ट में रहा है। जबकि दूसरे दो स्टॉक इस साल हर चौथे कारोबारी सत्र में फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस की बैन लिस्ट में रहे हैं।
बता दें कि जब किसी शेयर का कुल ओपन इंटरेस्ट उसके मार्केट वाइड पोजीशन लिमिट (MWPL)के 95 फीसदी से ज्यादा हो जाता है तो उस स्टॉक को फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस की बैन लिस्ट में डाल दिया जाता है। MWPL की गणना फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्टस कुल ओपन पोजीशन के आधार पर की जाती है। MWPL स्टॉक के फ्री फ्लोट मार्केट कैप से जुड़ी होती है। इसकी लिमिट पब्लिक शेयर होल्डिंग के 20 फीसदी तक सीमित रखी गई है।
एक बार जब कोई स्टॉक फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस की बैन लिस्ट में चला जाता है, तो केवल मौजूदा पोजीशन को ही काटा (स्क्वैर ऑफ) जा सकता है। स्टॉक में सामान्य ट्रेडिंग तभी शुरू होती है जब ओपन इंटरेस्ट एमडब्ल्यूपीएल के 80 फीसदी या उससे नीचे आ जाता है।
किसी स्टॉक का फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस की बैन लिस्ट में आना आमतौर पर इस बात का संकेत होता है कि बहुत सारे डेरिवेटिव ट्रेडर स्टॉक में रुचि रखते हैं। लेकिन किसी शेयर के इस बैन लिस्ट में बार-बार आने से बाजार में इस बात की चर्चा होने लगी है कि क्या कोई कार्टेल (लोगों का ग्रुप) मार्केट में जोड़-तोड़ करके किसी स्टॉक को इस लिस्ट में डलवा सकता है।
MWPL के 3 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदारी रखने वाले ग्राहकों पर एनएसई की तरफ से दिए गए आंकड़ों के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे यह पता लगाना संभव नहीं है कि कोई ग्राहक स्टॉक के डेरिवेटिव पर लॉन्ग है या शॉर्ट है। उदाहरण के लिए, अगर 10 ग्राहकों में से हर एक के पास 4 फीसदी हिस्सेदारी है, तो बहुत संभव है कि पांच ग्राहक स्टॉक में लॉन्ग पोजीशन रखते हों और दूसरे 5 ग्राहक स्टॉक में शॉर्ट हो और स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हों।
एक डेरिवेटिव ट्रेडर का कहना है कि, कुछ साल पहले तक, ऑपरेटरों के लिए डीप आउट-ऑफ-द-मनी ऑप्शन कॉन्ट्रैक्टस में बड़ी पोजीशन लेकर शेयरों को बैंन सूची में डलवाने के लिए हेराफेरी करना आम बात थी। लेकिन अब मार्जिन लिमिट में बढ़त और सेबी और एक्सचेंजों की कड़ी निगरानी के कारण ऐसा करना कठिन हो गया है।
चूंकि MWPL की गणना बकाया कॉन्ट्रैक्ट्स की संख्या के आधार पर की जाती है और डीप आउट-ऑफ द मनी ऑप्शन खरीदना सस्ता होता है। ऐसे में यह MWPL लिमिट तक पहुंचने का एक सस्ता तरीका हो सकता है। लेकिन जब स्टॉक बैन की अवधि में होता है तो कन्सेंट्रेटेड पोजीशन के अभाव या बहुत कम कन्सेंट्रेटेड पोजीशन रहने से स्टॉक में बड़े पैमाने पर ट्रेडर्स की भागीदारी और हेराफेरी न होने का एक विश्वसनीय संकेत मिलता है।
उदाहरण के तौर पर देखें तो जब एचएएल बैन सूचि में था तो अधिकतम कन्सेंट्रेटेड पोजीशन 3.2 फीसदी थी। इसी तरह, जबकि बीएचईएल बैन सूचि में था तो कुल कन्सेंट्रेटेड पोजीशन 12 प्रतिशत से अधिक नहीं रही है। इसी तरह, जब जून में IEX बैन में था तो 3 फीसदी या उससे ज्यादा की कन्सेंट्रेटेड पोजीशन नहीं थी।
किसी स्टॉक को F&O बैन लिस्ट में डलवाने का प्रयास क्यों?
अब सवाल ये है ऑपरेटर किसी स्टॉक को F&O बैन लिस्ट में डलवाने का प्रयास क्यों करते हैं? इस पर डेरिवेटिव ट्रेडर्स का कहना है कि ऐसा अक्सर कैश मार्केट में स्टॉक की कीमत में गिरावट को रोकने के लिए किया जाता है। इसके लिए डेरिवेटिव मार्केट में शॉर्ट सेलिंग को रोकने की कोशिश की जाती है। गौरतलब है कि जब कोई स्टॉक बैन में होता है, तो उसमें कोई नई लॉन्ग या शॉर्ट पोजीशन नहीं ली जा सकती है। उसमें केवल मौजूदा पोजीशन को ही काटा जा सकता है। ऐसे में किसी स्टॉक को F&O बैन लिस्ट में डलवा कर कैश मार्केट में स्टॉक की कीमत में गिरावट को रोकने की कोशिश की जाती है। इसके अलवा ऐसा करके शॉर्ट सेलर्स को अपनी पोजीशन अपने निर्धारित समय से पहले कवर करने के लिए मजबूर किया जा सकता है क्योंकि स्टॉक के बैन में जाने पर उनके पास सीमित लोगों के साथ ही ट्रेड करने के मौके होते हैं।