10-साल के गवर्नमेंट्स बॉन्ड्स कैसे सिर्फ 8 महीनों में क्रैश कर गए? जानिए पूरी कहानी

2014 की शुरुआत में Reserve Bank of India (RBI) के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पर अपना फोकस करने का नुकसान डब्ल्यूपीआई-इंडेक्स्ड बॉन्ड को उठाना पड़ा है। केंद्रीय बैंक ने जून 2013 में डब्ल्यूपीआई इनफ्लेशन से लिंक्ड इनफ्लेशन-इंडेक्स्ड बॉन्ड जारी करने शुरू किए थे

अपडेटेड Jun 05, 2023 पर 10:25 PM
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बॉन्ड की कीमत और उसकी यील्ड विपरीत दिशा में चलती हैं। यील्ड बढ़ने पर बॉन्ड की कीमत घट जाती है, इससे बॉन्ड्स के निवेशकों को नोशनल लॉस होता है।

सरकारी बॉन्ड्स के सेकेंडरी मार्केट में 1 जून को 5,500 से ज्यादा ट्रेड्स हुए। लेकिन, 5 जून को मैच्योर होने वाले 10 साल के होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) से लिंक्ड बॉन्ड में उसके पूरे जीवनकाल में सिर्फ 802 गुना कारोबार हुआ। 2014 की शुरुआत में Reserve Bank of India (RBI) के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पर अपना फोकस करने का नुकसान डब्ल्यूपीआई-इंडेक्स्ड बॉन्ड को उठाना पड़ा है। केंद्रीय बैंक ने जून 2013 में डब्ल्यूपीआई इनफ्लेशन से लिंक्ड इनफ्लेशन-इंडेक्स्ड बॉन्ड जारी करने शुरू किए थे। उस साल के अंत में ऐसे 6,500 करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड्स की नीलामी हुई थी।

RBI ने ऐसे बॉन्ड्स की दूसरी नीलामी की कोशिश 29 जनवरी, 2014 को की थी, जो 500 करोड़ रुपये की थी, लेकिन उसने मिली सभी बोलियां (bids) रिजेक्ट कर दिए थे। इन डब्ल्यूपीआई-लिंक्ड बॉन्ड्स की साबित हुई आखिरी नीलामी में यह रिजेक्शन चौंकाने वाला नहीं था, क्योंकि यह तब के RBI के गवर्नर रघुराम राजन के सीपीआई इनफ्लेशन के रास्ते को अपनाने के एक दिन बाद हुआ था। उर्जित पटेल की अगुवाई में मॉनेटरी पॉलिसी फ्रेमवर्क को रिवाइज और मजबूत बनाने के लिए बनी कमेटी ने इस रास्ते की सिफारिश की थी।

राजन के ऐलान से एक हफ्ते पहले ही पटेल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें RBI को सीपीआई इनफ्लेशन के मामले में एक लचीला इनफ्लेशन टारगेटिंग फ्रेमवर्क की सिफारिश की गई थी। दिसंबर 2013 में जब इस तरह के आखिरी बॉन्ड्स इश्यू किए गए तो होलसेल प्राइस इनफ्लेशन 5.88 के अच्छे लेवल पर था। यह 2013-14 में औसतन 5.2 फीसदी था। 1.44 फीसदी कूपन रेट पर जारी किए गए इन बॉन्ड्स का मतलब यह था कि पहले साल में इसका रिटर्न 6 फीसदी से ज्यादा था।


लेकिन, जल्द ही मामले ने खराब मोड़ लिया क्योंकि राजन की अगुवाई में केंद्रीय बैंक ने रिटेल प्राइसेज में डबल-डिजिट ग्रोथ को नियंत्रित करने के लिए वित्तीय स्थितियां सख्त बना दी। जब सीपीआई इनफ्लेश में कमी आनी शुरू हुई तो जनवरी 2016 तक पटेल कमेटी के 6 फीसदी टारगेट को पूरा करने में 2014-15 में होलेसल इनफ्लेशन गिरकर 1.3 फीसदी पर आ गया। फिर 2015-16 में यह जीरो से नीचे -3.6 फीसदी हो गया।

बॉन्ड की कीमत और उसकी यील्ड विपरीत दिशा में चलती हैं। यील्ड बढ़ने पर बॉन्ड की कीमत घट जाती है, इससे बॉन्ड्स के निवेशकों को नोशनल लॉस होता है।

wpi inflation

इंडिया में मॉनेटरी पॉलिसी का फोकस रिटेल इनफ्लेशन पर होने से डब्ल्यूपीआई इंडेक्स्ड बॉन्ड्स का मार्केट ध्वस्त हो गया। इसकी वजह यह है कि RBI की पॉलिसी पर होलसेल इनफ्लेशन में आई गिरावट का कोई असर नहीं पड़ रहा था। इससे इन बॉन्ड में निवेश करने वाले लोग मायूस हो गए और उनके बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। इन संस्थागत निवेशकों के बीच मायूसी इतनी ज्यादा बढ़ गई कि मॉनेटरी पॉलिसी के बाद RBI और एनालिस्ट की होने वाली बातचीत में केंद्रीय बैंक को टॉप मैनेजमेंट से यहां तक पूछा गया कि इन इंस्ट्रूमेंट्स का क्या भविष्य है।

हालात को संभालने के लिए RBI ने उन्हें बायबैक करने का फैसला लिया। पहला रिपर्जेच ऑक्शन जनवरी 2016 में हुआ। यह नाकाम रहा, क्योंकि आरबीआई ने निवेशकों की तरफ से दिए गए सभी ऑफर रिजेक्ट कर दिए गए। लेकिन, उसके बाद के तीन रिपर्जेज राउंड्स में वह 5,347 करोड़ रुपये के ऐसे बॉन्ड्स खरीदने में कामयाब रहा। उसने 10-15 फीसदी डिस्काउंट पर ये बॉन्ड खरीदे। इनमें से 1,153 करोड़ रुपये के बचे हुए बॉन्ड्स 5 जून को मैच्योर हो रहे हैं।

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