सेबी ने ब्रोकर्स के साथ मीटिंग में किया साफ, CAS फ्रेमवर्क में तुरंत बदलाव का कोई इरादा नहीं

लक्ष्मण राय ने कहा कि कल SEBI की ब्रोकर्स के साथ हुई मुलाकात में CAS में भागीदारी बढ़ाने पर चर्चा हुई। इसमें सेबी ने कहा कि CAS पर उसकी नजर लगातार बनी हुई है। सूत्रों के मुताबिक सेबी ने इस मुलाकात में साफ किया कि उसका CAS फ्रेमवर्क में तुरंत कोई बदलाव करने का इरादा नहीं है। इसके मौजूदा डिजाइन या तकनीक में कोई दिक्कत नहीं है

अपडेटेड Aug 05, 2026 पर 3:27 PM
क्लोजिंग ऑक्शन सेशन का मकसद बाजार बंद होने के समय शेयरों की सही कीमत तय करना है। इसके लिए खरीद और बिक्री के ऑर्डर एक जगह जमा किए जाते हैं

क्लोजिंग ऑक्शन सेशन CAS को लेकर दो दिनों से बाजार में हंगामा कटा हुआ है। इस बीच सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि सेबी ने ब्रोकर्स के साथ मीटिंग में किया साफ किया है कि CAS फ्रेमवर्क में बदलाव का सेबी का कोई इरादा नहीं है। सेबी का यह भी मानना है कि पार्टिसिपेशन बढ़ने से दिक्कतें, दूर होंगी। CAS के मौजूदा डिजाइन या टेक में कोई खामी नहीं है।

सीएनबीसी-आवाज की इस एक्सक्लूसिव खबर पर ज्यादा डिटेल जानकारी देते हुए इकोनॉमिक पॉलिसी एडिटर लक्ष्मण राय ने कहा कि कल SEBI की ब्रोकर्स के साथ हुई मुलाकात में CAS में भागीदारी बढ़ाने पर चर्चा हुई। इसमें सेबी ने कहा कि CAS पर उसकी नजर लगातार बनी हुई है। सूत्रों के मुताबिक सेबी ने इस मुलाकात में साफ किया कि उसका CAS फ्रेमवर्क में तुरंत कोई बदलाव करने का इरादा नहीं है। इसके मौजूदा डिजाइन या तकनीक में कोई दिक्कत नहीं है। CAS को स्टेबल होने में थोड़ा समय लगेगा। SEBI ने काफी अध्ययन के बाद इसे लागू किया है।

CAS के चलते बाजार में शुरुआती दिक्कत और भारी उठापटक के बाद कई लोगों को उम्मीद थी कि सेबी जल्दी ही CAS के नियमों में बदलाव कर सकता है। लेकिन सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक फिलहाल सेबी का ऐसा कोई इरादा नहीं है। सेबी का मानना है कि अभी इस सिस्टम को कुछ समय दिया जाना चाहिए। अगर बाजार में भागीदारी बढ़ती है और इसके बाद भी कीमतों में बड़ी गड़बड़ी बनी रहती है, तभी डिजाइन या नियमों में बदलाव पर विचार किया जा सकता है। फिलहाल सेबी का फोकस इस बात पर है कि बाजार के सभी हिस्सेदार CAS को समझें और इसमें सक्रिय रूप से भाग लें।


CAS (क्लोजिंग ऑक्शन सेशन) का मकसद बाजार बंद होने के समय शेयरों की सही कीमत तय करना है। इसके लिए खरीद और बिक्री के ऑर्डर एक जगह जमा किए जाते हैं। इसके बाद उस कीमत को तय किया जाता है, जिस पर सबसे ज्यादा शेयरों की खरीद-बिक्री संपन्न हो सकती है।

लेकिन अगर इस अवधि में बहुत कम ऑर्डर आएं तो खरीदने और बेचने वालों के बीच बड़ा अंतर बन सकता है। ऐसी स्थिति में किसी शेयर की अंतिम कीमत सामान्य बाजार की तुलना में काफी ऊपर या नीचे जा सकती है। यही वजह है कि बाजार में कुछ ब्रोकर्स और ट्रेडर्स ने चिंता जताई है कि अगर CAS में भागीदारी कम रही तो क्लोजिंग प्राइस वास्तविक बाजार भाव को सही तरीके से नहीं दिखा पाएगा।

सेबी के सूत्रों का कहना है कि यह समस्या डिजाइन या टेक्नोलॉजी की नहीं है। समस्या यह है कि शुरुआती चरण में पर्याप्त मार्केट पार्टिसिपेशन नहीं है। जैसे-जैसे बाजार के लोग इस सिस्टम को समझेंगे और इसमें नियमित रूप से हिस्सा लेंगे, वैसे-वैसे कीमतों में स्थिरता आती दिखेगी।

 

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