F&O new rules: सेबी के नए नियमों से ट्रेडर्स और ब्रोकिंग कम्युनिटी को लगेगा झटका, जानिए कैसे
सेबी ने एफएंडओ के नियमों में बड़े बदलाव के ऐलान किए हैं। इस बारे में 1 अक्टूबर को सर्कुलर जारी होने के बाद नए नियमों को लेकर चर्चा जारी है। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि सेबी की कोशिश रिटेल इनवेस्टर्स को डेरिवेटिव ट्रेडिंग में होने वाले नुकसान से बचाने की है। लेकिन, कुछ एक्सपर्ट्स ने नए नियमों के पड़ने वाले खराब असर के बारे में बताया है
MoneyControl News
अपडेटेड Oct 04, 2024 पर 11:34 AM
कुल छह में से तीन नियमों का मार्केट पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा।
लगता है कि सेबी ने एफएंडओ के नए नियमों के प्रस्ताव पर ब्रोकरेज फर्मों की फीडबैक पर ध्यान नहीं दिया। सेबी के इस मसले पर कंसल्टेशन पेपर जारी करने के बाद ट्रेडर्स और ब्रोकरेज फर्मों ने खुलकर अपनी राय बताई थी। लेकिन, सेबी ने इनकी अनदेखी की। उसने पहले से तैयार फ्रेमवर्क के हिसाब से एफएंडओ के नियमों में बदलाव कर दिए। उसने एफएंडओ ट्रेडिंग के नियमों में छह बड़े बदलाव किए हैं। सेबी की दलील है कि इससे शेयरों के इंडेक्स डेरिवेटिव मार्केट को मजबूत मिलेगी। लेकिन, ऐसा लगता है कि इस बदलाव का मार्केट पर बड़ा असर पड़ेगा और सेबी, सरकार सहित सभी पक्षों को इससे नुकसान हो सकता है।
रोजाना एक्सपायरी वाले कॉन्ट्रैक्ट्स की संख्या घट जाएगी
कुल छह में से तीन नियमों का मार्केट पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। सबसे पहले वीकली इंडेक्स (Weekly Index) के नए नियमों की बात करते हैं। सेबी ने कहा है कि हर स्टॉक एक्सचेंज को सिर्फ एक वीकली एक्सपायरी डेरिवेविट कॉन्ट्रैक्ट ऑफर करने की इजाजत होगी। इससे डेली एक्सपायरी के लिए उपलब्ध कॉन्ट्रैक्ट की संख्या घट जाएगी। अभी हर दिन कम से कम एक कॉन्ट्रैक्ट की एक्सपायरी होती है। सबसे ज्यादा वॉल्यूम 'जीरो डे टू एक्सपायरेशन (0DTE) ऑप्शन में दिखता है, जो उसी दिन (same day) एक्सपायर हो जाता है।'
एक्सपायरी के दिन बड़े उतारचढ़ाव से रिटेल ट्रेडर्स को लॉस
ट्रेडर्स खासकर आउट-ऑफ-द-मनी (OTM) ऑप्शंस बेचने वाले ट्रेडर्स सोचते थे कि उन्हें प्रॉफिट हो सकता है, क्योंकि ये कॉन्ट्रैक्ट्स बगैर उतारचढ़ाव एक्सपायर हो जाते हैं। लेकिन, एक्सपायरी के दिनों में तेज उतारचढ़ाव की वजह से बड़ा लॉस खासकर रिटेल इनवेस्टर्स को लॉस देखने को मिला। सेबी ने अपनी स्टडी में यह पाया कि ज्यादातर ट्रेडर्स एक्सपायरी के दिनों में होने वाले ट्रेड्स में पैसे गंवा रहे हैं। इस वजह से उसने नियम में बदलाव करने का फैसला लिया।
रिटेल इनवेस्टर्स के लॉस से मुनाफा कमा रहे बड़े ट्रेडर्स
सेबी ने यह पाया कि रिटेल इनवेस्टर्स को हो रहे लॉस से प्रॉपरायटरी ट्रेडिंग डेस्क और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (HFT) फर्म जैसे प्रोफेशनल ट्रेडर्स मुनाफा कमा रहे हैं। हालांकि, जेन स्ट्रीट जैसे मामलों पर फाइनेंस मिनिस्ट्री में चिंता जताई गई थी। तब विदेशी ट्रेडर्स के असर को कम करने की जरूरत महसूस की गई थी। यह माना गया था कि इंडियन रिटेल ट्रेडर्स की कीमत पर वे मुनाफा कमा रहे हैं।
हर क्षेत्र में ज्यादा अनुभव का फायदा मिलता है
अभी इस सवाल का जवाब नहीं दिया जा सकता कि वीकली इंडेक्स डेरिवेटिव की संख्या सिर्फ दो कर देने से मार्केट में होने वाले उतारचढ़ाव में कमी आएगी या नहीं। लेकिन, ऐसा कर सेबी ने अनजाने में ही सही प्रोफेशनल ट्रेडर्स को सजा दी है, जिन्होंने अपनी स्किल को निखारने के लिए समय और मेहनत लगाई है। स्पोर्ट्स, एंटरटेनमेंट और एजुकेशन जैसे क्षेत्रों की तरह ट्रेडिंग 'Zero-sum' के सिद्धात पर आधारित होती है, जिसमें कुछ के लॉस पर कुछ को फायदा होता है। जिनकी स्किल बेहतर होती है, उन्हें फायदा होता है। जिन्हें कम अनुभव होता है, उन्हें लॉस होता है।
डिस्काउंट ब्रोकिंग फर्मों पर पड़ेगा ज्यादा असर
वीकली ऑप्शन की सीमा तय करने से खासकर ब्रोकिंग इंडस्ट्री पर काफी असर पड़ेगा, क्योंकि ये प्रोडक्ट्स रेवेन्यू के बड़े स्रोत साबित हो रहे थे। इसके अलावा सेबी कई उपायों से ब्रोकिंग इनकम पर असर पड़ा है। यह पूरे सेक्टर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। सबसे ज्यादा असर डिस्काउंट ब्रोकरेज फर्मों पर पड़ेगा। इससे वे ब्रोकरेज फीस बढ़ाने को मजबूर होंगी। इसके चलते रिटेल इनवेस्टर्स को ज्यादा फीस चुकानी पड़ सकती है।
सरकार के रेवेन्यू में भी आ सकती है कमी
ट्रेडिंग वॉल्यूम में बड़ी गिरावट आने पर सेबी और सरकार दोनों को नुकसान होगा। सेबी की एक रिपोर्ट बताती है कि ट्रेडर्स को होने वाले नुकसान की एक वजह ज्यादा स्टैट्यूटरी और ब्रोकरेज फीस है। इस तरह सरकार का रेवेन्यू घटेगा। हालांकि, 1 अक्टूबर से STT बढ़ने से इसकी कुछ हद तक भरपाई हो जाएगी।
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क्या रिटेल इनवेस्टर्स को नुकसान होना बंद हो जाएगा?
सेबी के नए नियमों से ट्रेडर्स और ब्रोकिंग कम्युनिटी संतुष्ट नहीं है। उनका मानना है कि सेबी और फाइनेंस मिनिस्टीर की तरफ से इस मामले में सभी पक्षों को ध्यान में नहीं रखा गया। इस मामले में पूछने पर ब्रोकर्स ने खुलकर बोलने से परहेज किया। लेकिन, यह माना जा रहा है कि नए नियमों का मार्केट और उससे जुड़े पक्षों पर खराब असर पड़ेगा। दूसरा, सेबी ने रिटेल इनवेस्टर्स को लॉस से बचाने के लिए यह कोशिश की है, लेकिन इनके कामयाब होने की कम ही संभावना है।