अदाणी ग्रुप कंपनियों में भारी निवेश वाले 8 फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टर्स (एफपीआई) ने सेटलमेंट के लिए SEBI के पास अप्लिकेशन फाइल किए हैं। अप्लिकेशन में सेबी से उनके खिलाफ चल रही जांच को बंद कर देने की गुजारिश की गई है। ये मामले अदाणी ग्रुप की कंपनियों में उनकी हिस्सेदारी से जुड़े हैं। सेबी इस बात की जांच कर रहा है कि अदाणी समूह की कंपनियों में निवेश में उन्होंने नियमों का उल्ल्घन किया है या नहीं। इस खबर का अदाणी समूह की कंपनियों पर ज्यादा असर नहीं दिखा है। 22 अप्रैल से अब तक अदाणी समूह की कंपनियों के स्टॉक्स बगैर किसी खास बदलाव के बंद हुए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि मार्केट इस मामले को पीछे छोड़ चुका है। आइए इस पूरे मामले के बारे में विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं।
ये फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टर्स मामलों का सेटलमेंट क्यों चाहते हैं?
सेटलमेंट एक ऐसा प्रोसेस है, जिसके जरिए मार्केट के नियमों के कथित उल्लंघन के मामलों को जुर्माना चुकाने के बाद बंद कर दिया जाता है। इसमें आरोपी न तो गुनाह को स्वीकार करता है और न उसे खारिज करता है। किसी एनटिटी के सेटलमेंट अप्लिकेशन फाइल करने के बाद मामला हाई-पावर्ड एडवायजरी कमेटी (HPAC) को भेज दिया जाता है। यह कमेटी यह तय करती है कि सेटलमेंट अप्लिकेशन को स्वीकार करना है या नहीं। अप्लिकेशन स्वीकार हो जाने पर कमेटी तय करती है कि आरोपी को कितना जुर्माना चुकाना होगा।
अगर SEBI एफपीआई के अप्लिकेशंस को स्वीकार कर लेता है तो क्या होगा?
मार्केट रेगुलेटर के अप्लिकेशंस स्वीकार कर लेने के बाद फंडों को मामले के निपटारे के लिए जुर्माना चुकाना होगा। इस मामले से जुड़े वकीलों का कहना है कि जिन मामलों की जांच चल रही है, उन्हें देखते हुए लगता है कि सेटलमेंट अमाउंट ज्यादा है सकता है। इसके साथ ही अदाणी-हिंडनबर्ग मामले में चल रही जांच खत्म हो जाएगी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपना फैसला सुना चुका है। सेबी बाकी मामलों के निपटारे के अंतिम चरण में है।
मामलों के निपटारे के बाद अगर कोई नया सबूत सामने आता है तो सेबी को मामले की फिर से जांच करने का अधिकार है। लेकिन, ऐसा होने की बहुत कम संभावना है। इस बीच, खबरों में बताया गया है कि मार्केट रेगुलेटर ने अदाणी ग्रुप के स्टॉक्स में शॉर्ट-सेलिंग करने वाले लोगों को नोटिस भेजा है। शॉर्ट सेलिंग की वजह से अदाणी समूह के स्टॉक्स में बड़ी गिरावट आई थी।
तब से अदाणी समूह की कंपनियों के शेयरों में काफी हद तक रिकवरी आई गई है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट 24 जनवरी, 2023 को आई थी। इस साल मार्च के अंत में अदाणी समूह की कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन 15.28 लाख करोड़ रुपये था।
अगर सेबी एफपीआई के अप्लिकेशंस रिजेक्ट कर देता है तो क्या होगा?
सेबी के पास सेटलमेंट अप्लिकेशंस को खारिज करने का अधिकार है। मामले में इनसाइडर ट्रेडिंग या गंभीर फ्रॉड के आरोप होने पर सेबी मामलों का निपटारा नहीं करता है। अगर सेबी अप्लिकेशन खारिज कर देता है तो जांच जारी रहेगी। फिर, जांच के नतीजों के आधार पर सेबी कार्रवाई करेगा। उसके बाद एफपीआई के पास सिक्योरिटीज एपेलेट ट्राइब्यूनल (SAT) या सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प होगा।
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ये फंड कितने बड़े हैं और उन पर क्या असर पड़ेगा?
इन मामलों का इंडियन स्टॉक मार्केट्स और रिटेल इनवेस्टर्स पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि इन फंडों ने पहले ही दूसली लिस्टेड कंपनियों में अपना निवेश काफी घटाया है और उनके पास अब नाममात्र की हिस्सेदारी रह गई है। मामले से जुड़े 7 फंडों ने अपना करीब 90 फीसदी निवेश अदाणी समूह की कंपनियों में किया था। उदाहरण के लिए मामले से जुड़े Albula Investment Fund ने 2021 में इंडियन कंपनियों के शेयरों में 41,000 करोड़ रुपये का निवेश किया था। अब उसका निवेश घटकर सिर्फ 2,296 करोड़ रुपये का रह गया है। Vespura ने 2021 में इंडिया में 10,000 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इसमें से 98 फीसदी निवेश अदाणी समूह की कंपनियों में था। अब इस फंड का कुल निवेश घटकर करीब 4,000 करोड़ रुपये रह गया है।