बाजार से जुड़े खुलासे में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए मार्केट रेगुलेटर सेबी अन-पब्लिश्ड प्राइस सेंसिटिव इंफॉर्मेशन (UPSI) के दायरे को बढ़ाने पर विचार कर रहा है। सेबी की इसमें प्रस्तावित फंड जुटाने की गतिविधियों, रिस्ट्रक्चरिंग प्लान और वन-टाइम बैंक सेटलमेंट को शामिल करने की योजना है। सेबी ने अपने प्रस्तावों पर 30 नवंबर तक जनता से सुझाव मांगी है। सेबी ने अपने कंसल्टेशन पेपर में प्रस्ताव दिया है कि शेयरधारक, ज्वाइंट वेंचर और फैमिली सेटलमेंट सहित केवल ऐसे समझौते, जो फर्म के मैनेजमेंट और कंट्रोल को प्रभावित करते हैं और फर्म को ज्ञात हैं, उन्हें प्राइस सेंसिटिव माना जाना चाहिए।
इसके अलावा, सेबी ने प्रस्ताव में कहा है कि कॉर्पोरेट दिवाला कार्यवाही के प्रमुख घटनाक्रम को प्राइस-सेंसिटिव इंफॉर्मेशन के रूप में बताना चाहिए। अगर धन के दुरुपयोग या वित्तीय गलत बयानों जैसे मुद्दों के चलते फोरेंसिक ऑडिट शुरू किया जाता है या कोई निष्कर्ष निकाला जाता है, तो उसे भी प्राइस-सेंसिटिव इंफॉर्मेशन के रूप में बताना चाहिए।
सेबी की UPSI के डेफिनेशन में प्रस्तावित बदलावों का मकसद रेगुलेटरी स्पष्टता और कंसिस्टेंसी बढ़ाना है। सेबी ने UPSI के डेफिनेशन में प्रस्तावित फंड जुटाने को शामिल करने का सुझाव दिया। प्रस्तावित फंड जुटाने से संबंधित निर्णय वर्तमान में इसके डेफिनेशन में शामिल नहीं है। रेगुलेटर ने रिस्ट्रक्चरिंग प्लान, वन-टाइम सेटलमेंट और अन्य अहम फाइनेंशियल रिस्ट्रक्चरिंग को UPSI के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव रखा है।
सेबी ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि अगर किसी कंपनी या उसके प्रमुख कर्मियों के खिलाफ रेगुलेटरी या ज्यूडिशियल बॉडी द्वारा की गई कार्रवाई में एनफोर्समेंट, जुर्माना, दंड या अन्य प्रतिबंध शामिल हैं, तो उन्हें प्राइस-सेंसिटिव माना जाना चाहिए।
सेबी ने सुझाव दिया कि किसी कंपनी के ऑपरेशन या वित्त को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुकदमों या विवादों के परिणामों के साथ-साथ कंपनी को दिए गए किसी भी प्रमुख कॉन्ट्रैक्ट्स या ऑर्डर (या अहम अमेंडमेंट या टर्निनेशन) को रेगुलर बिजनेस एक्टिविटी के बाहर वित्तीय प्रदर्शन पर उनके संभावित प्रभाव के चलते UPSI के रूप में बताना चाहिए। इसके अलावा, जरूरी लाइसेंस या अप्रुवल प्रदान किए जाने, वापस लेने या निलंबित करने की जानकारी का खुलासा किया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसी घटनाएं कंपनी के ऑपरेशन को प्रभावित कर सकती हैं।