F&O Rules: कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सेबी का मानना है कि डेरिवेटिव्स मार्केट से किसी भी निवेशक को बाहर न रखा जाए। मनीकंट्रोल को सूत्रों के हवाले से इसकी जानकारी मिली है कि सेबी किसी भी क्राइटेरिया के आधार पर निवेशकों को डेरिवेटिव्स मार्केट से बाहर रखने के पक्ष में नहीं है। यह ऐसे समय में सामने आया, जब कुछ वर्षों से इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में निवेशकों की एंट्री को लेकर एक बैरियर या एलिजिबिलिटी स्टैंडर्ड तय की जाए। यह काफी अहम है क्योंकि 'प्रोडक्ट सूटेबिलिटी फ्रेमवर्क' पर वर्षों से चर्चा हो रही है और सेबी इस पर भविष्य में विचार कर सकता है।
क्या है प्रोडक्ट सूटेबिलिटी फ्रेमवर्क?
सूत्र ने बताया कि इंडस्ट्री प्लेयर्स ने प्रोडक्ट सूटेबिलिटी फ्रेमवर्क लाने का सुझाव दिया है। इस फ्रेमवर्क के तहत रिस्क वाले ट्रेड सिर्फ उन्हीं को करने की मंजूरी करने का प्रावधान तय करने का सुझाव दिया गया जिनकी पास रिस्क उठाने की क्षमता हो। हालांकि इस पर कई वर्षों से चर्चा ही हो रही है। सूत्र के मुताबिक हालिया बैठकों में इस पर इस पर कोई बात नहीं हुई और इस बात के कोई संकेत भी नहीं मिल रहे हैं कि स्किल या कैपिटल के आधार पर एफएंडओ मार्केट में सेबी खुदरा भागीदारी को सीमित करने का प्रस्ताव दे सकता है।
SEBI पहले ही उठा चुका है बड़े कदम
हालिया महीनों में सेबी एफएंडओ सेगमेंट में नियमों को सख्त करने के लिए कई कदम उठा चुका है। इसके तहत सेबी ने कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाने, हर एक्सचेंज पर वीकली एक्सपायरी को एक ही दिन करने जैसे फैसले शामिल हैं। ये फैसले खुदरा निवेशकों को सुरक्षित रखने को लेकर लिए गए हैं। पिछले साल सेबी ने एक एक्सपर्ट वर्किंग ग्रुप बनाया था। इसे प्रोडक्ट सूटेबिलिटी फ्रेमवर्क की जरूरत है या नहीं, इसका आकलन करते हुए निवेशकों के हितों की सुरक्षा बढ़ाने और रिस्क से जुड़े बेहतर पहलुओं पर गौर करने का जिम्मा सौंपा गया था। इस वर्किंग ग्रुप को एक ट्रेडर के रिस्क प्रोफाइल, नेटवर्थ, ट्रेडिंग की मात्रा और ओवरऑल एक्सपोजर जैसे पहलुओं पर विचार करने का काम सौंपा गया था, ताकि एक इंडिविजुअल ट्रेडर के लिए ओवरऑल एक्सपोजर की लिमिट तय की जा सके।