मार्केट में एक अजीबोगरीब ट्रेंड दिख रहा है। ट्रेडिंग वॉल्यूम तेजी से बढ़ा है, लेकिन टर्नओवर की ग्रोथ सुस्त दिख रही है। जून में अब तक बीएसई और एनएसई पर एवरेज डेली कैश वॉल्यूम 5.75 अरब शेयर तक पहुंच गया है। यह 11 महीने का सबसे हाई लेवल है। यह मार्च के मुकाबले 20 फीसदी और अप्रैल के मुकाबले 12 फीसदी ज्यादा है। लेकिन, एवरेज डेली टर्नओवर सिर्फ 1 फीसदी बढ़कर 1.20 लाख करोड़ तक पहुंचा है। यह मई के मुकाबले 11 फीसदी ज्यादा है।
शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स का पार्टिसिपेशन बढ़ने का असर
इस अजीबोगरीब ट्रेंड की क्या वजह हो सकती है? एक्सपर्ट्स का कहना है कि मार्केट विहेबियर में बदलाव की वजह से ऐसा हो रहा है। मार्केट में शॉर्ट-टर्म ट्रेडर्स का पार्टिसिपेशन बढ़ा है। शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स का फोकस क्विक प्राइस मूवमेंट्स पर रहता है। इसमें अक्सर बड़ी संख्या में लो-वैल्यू स्टॉक्स शामिल होते हैं। इससे वॉल्यूम तो बढ़ जाता है लेकिन टर्नओवर (रुपये) में अपेक्षाकृत कम इजाफा होता है। इसकी दूसरी वजह ज्यादा ब्लॉक डील भी हो सकती है।
ब्लॉक डील की बढ़ती संख्या भी हो सकती है वजह
ब्लॉक डील के ट्रांजैक्शंस संस्थागत निवेशकों के बीच होते हैं, जिनमें शेयरों की संख्या काफी ज्यादा होती है। यह डील पहले से तय शेयरों की कीमत पर होती है। मई में करीब 55,000 करोड़ रुपये की ब्लॉक डील्स हुईं। जून में यह 45,000 करोड़ रुपये की ब्लॉक डील्स हुईं। ये मार्केट में शेयरों की चल रही कीमतों से कम भाव पर हुईं। इससे टर्नओवर में होने वाला इजाफा कम रहा। निफ्टी जैसे बेंचमार्क इंडेक्स सीमित दायरे में बने हुए हैं। इससे मार्केट की दिलचस्पी मिड और स्मॉलकैपस स्टॉक्स में बढ़ी है।
मिडकैप और स्मॉलकैप में बढ़ता निवेश
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों की कीमतें आम तौर पर ब्लूचिप कंपनियों के शेयरों से कम होती है। इस वजह से वॉल्यूम तो बढ़ जाता है लेकिन उसके हिसाब से रुपये में टर्नओवर नहीं बढ़ता है। जून में अगर रिटर्न की बात की जाए तो सेंसेक्स का रिटर्न 0.7 फीसदी और Nifty का रिटर्न 1.2 फीसदी रहा है। मार्केट कैपिटलाइजेशन के डेटा से भी इस ट्रेंड की पुष्टि होती है। जून में बीएसई में लिस्टेड सभी मिडकैप कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन 1.3 फीसदी तक बढ़ा है।
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एल्गो और हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेड्स का इस्तेमाल
SKI Capital Services के एमडी नरेंद्र वाधवा ने कहा कि वॉल्यूम बढ़ाने में एल्गो और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेड्स का भी बड़ा हाथ है। इससे वॉल्यूम तो बढ़ जाता है लेकिन उस अनुपात में वैल्यू नहीं बढ़ती है। ये सिस्टम अक्सर मार्जिनल प्राइस मूवमेंट पर रैपिड और ऑटोमेटेड ट्रेड जेनरेट करते हैं। इससे टर्नओवर बढ़े बगैर मार्केट में हलचल बढ़ जाती है। उधर, ज्यादा वैल्यूएशन की वजह से संस्थागत गतिविधियां सुस्त हैं।