ज्यादातर लोग एक्स्ट्रा टैक्स बेनेफिट्स के लिए National Pension Scheme (NPS) में सिर्फ 50,000 रुपये सालाना इनवेस्टमेंट करते हैं। कुछ एंप्लॉयर्स की पॉलिसी एनपीएस-आधारित रही है, जिससे उनके एंप्लॉयीज NPS में ज्यादा इनवेस्ट करते हैं। फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत एनपीएस और उसके इनवेस्टमेंट चॉयस के बारे में बातचीत करने के लिए सही वक्त है। एनपीएस को उतना महत्व नहीं मिला है, जितने की वह हकदार है। इसके कुछ फीचर्स की वजह से लोग इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाते। एन्युटी खरीदने की अनिवार्यता का असर इस स्कीम के आकर्षण पर पड़ता है। इस नियम की वजह से इनवेस्टर के लिए कम रिटर्न वाले एन्युटी प्लान में अपने 40 फीसदी फंड का निवेश करना जरूरी हो जाता है।
लेकिन, एनपीएस के कई ऐसे फीचर्स हैं, जो सच में बहुत अच्छे हैं। एनपीएस एकमात्र ऐसा प्रोडक्ट है, जो रिटायरमेंट बाद के समय के लिए रेगुलर इनकम का स्रोत तैयार करता है। एन्युटी की वजह से इनवेस्टर को उसकी पूरी जिंदगी पेंशन मिलती है। यह ऐसे लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है जिनके पास बड़े फंड से रेगुलर हासिल करने के लिए जरूरी अनुशासन नहीं है।
आइए हम एक्टिव और ऑटो मोड में से किसी एक को सेलेक्ट करने के बारे में विचार करते हैं। एक्टिव ऑप्शन ऐसे इनवेस्टर्स के लिए है, जो एनपीएस पोर्टफोलियो एसेट एलोकेशन को एक्टिवली मैनेज करना चाहते हैं। ऑटो मोड ऐसे निवेशकों के लिए है जो पोर्टफोलियो से जुड़े फैसले लेने में खुद को शामिल नहीं करना चाहते हैं। वे इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट की जिम्मेदारी पेंशन फंड मैनेजर्स पर छोड़ देना चाहते हैं।
एक्टिव चॉयस में एनपीएस सब्सक्राइबर के पास स्कीम ई, जी और सी के जरिए कई एसेट्स में एलोकेशन या रेशियो तय करने की आजादी होती है। हालांकि, इसमें कुछ लिमिट तय है। स्कीम ई में 50 साल की उम्र तक मैक्सिमम 75 फीसदी एलोकेशन किया जा सकता है। 50 साल की उम्र के बाद ई स्कीम में अपर लिमिट हर साल 2.5 फीसदी घटती जाती है। इस तरह 51 की उम्र में यह 72.5 फीसदी हो जाती है। 52 की उम्र में 70 फीसदी हो जाता है। 53 की उम्र में 67.5 फीसदी हो जाता है और आखिर में 60 की उम्र में 50 फीसदी हो जाता है।
इनवेस्टर्स स्कीम जी और सी में मैक्सिमम 100 फीसदी एलोकेशन कर सकता है। स्कीम ई में ऊपरी सीमा के बारे में पहले प्वाइंट में बताया गया है।
इसमें इनवेस्टर को एसेट एलोकेशन के बारे में किसी तरह का निर्णय करने की जरूरत नहीं पड़ती है। कई स्कीमों में एलोकेशन का फैसला पहले से तय एक फॉर्मूला के आधार पर होता है। इनवेस्टर्स को सिर्फ 3 लाइफ साइकिल फंड्स (LC) में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता है।
एग्रेसिव लाइफ साइकिल फंड (LC75)-यह ज्यादा रिस्क लेने वाले इनवेस्टर के लिए अच्छा है। इसमें 35 साल की उम्र तक इक्विटी कंपोनेंट 75 फीसदी होता है। उसके बाद यह घटने लगता है। 40 की उम्र में घटकर 55 फीसदी पर आ जाता है। 45 की उम्र में 35 फीसदी, 50 की उम्र में 20 फीसदी और आखिर में 55 की उम्र में 15 फीसदी पर आ जाता है।
मॉडरेट लाइफ साइकिल फंड (LC50)-यह मीडियम रिस्क लेने वाले इनवेस्टर के लिए अच्छा है। इसमें 35 की उम्र में इक्विटी कंपोनेंट 50 फीसदी, 40 साल की उम्र में 40 फीसदी, 45 की उम्र में 30 फीसदी, 50 की उम्र में 20 फीसदी और 55 की उम्र में आखिरकार 10 फीसदी हो जाता है।
कंजरवेटिव लाइफ साइकिल फंड (LC25)-यह उन इनवेस्टर्स के लिए अच्छा है जो शेयरों में निवेश का रिस्क नहीं लेना चाहते। इसमें 35 की उम्र में इक्विटी कंपोनेंट 25 फीसदी, 40 की उम्र में 20 फीसदी, 45 की उम्र में 15 फीसदी, 50 साल की उम्र में 10 फीसदी और आखिरकार 55 की उम्र में 5 फीसदी है।
ऑटो मोड में ऊपर बताई गई सभी लाइफ साइकिल फंड ऑप्शंस में साल में रिबैलेंसिंग अपने आप एक बार होती है। यह इनवेस्टर की जन्म की तारीख को होती है।
एक्टिव चॉयस ऐसे लोगों के लिए अच्छी है जो इक्विटी और डेट एलोकेशन को समझते हैं। उन्हें पता होता है कि अगले कई सालों में यह कैसे काम करता है। इसलिए अगर आपके पास अगर अपने एनपीएस कॉर्पस को मैनेज करने के लिए पर्याप्त समय और समझ है तो आप एक्टिव चॉयस का चुनाव कर सकते हैं। लेकिन अगर आप एसेट एलोकेशन के फैसले खुद नहीं लेना चाहते हैं तो आप ऑटो मोड का चुनाव कर सकते है।