FD vs Bond Yields: निवेश को लेकर हैं कन्फ्यूज? इस सरकारी इनवेस्टमेंट प्लान में मिल रहा 100% सेफ्टी के साथ FD से ज्यादा रिटर्न!

Bond Yields vs Fixed Deposits: सुरक्षित निवेश की बात आते ही ज्यादातर लोग बैंक एफडी चुनते हैं, लेकिन बॉन्ड यील्ड्स अक्सर एफडी से ज्यादा रिटर्न देने का दम रखती हैं। डेटा के मुताबिक, सरकारी और हाई-रेटेड कॉरपोरेट बॉन्ड्स पर निवेशकों को एफडी की तुलना में बेहतर ब्याज मिल रहा है। हालांकि, दोनों के रिस्क, लिक्विडिटी और टैक्स नियमों में बड़ा अंतर है। जानिए आपकी गाढ़ी कमाई के लिए दोनों में से कौन सा विकल्प ज्यादा फायदेमंद और सुरक्षित है

अपडेटेड Sep 09, 2026 पर 3:27 PM
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एक्सपर्ट्स का का मानना है कि दोनों के अपने फायदे और नुकसान हैं

Bonds vs FD Investment: भारत में जब भी फिक्स्ड या फिक्स और सेफ कमाई की बात आती है, तो आम निवेशकों के दिमाग में सबसे पहला नाम बैंक FD का आता है। लेकिन पिछले कुछ समय में सरकारी और कॉरपोरेट बॉन्ड्स की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। आंकड़ों के मुताबिक, कॉर्पोरेट और सरकारी बॉन्ड्स कई मौकों पर बैंक एफडी से 1% से 2% तक ज्यादा रिटर्न ऑफर कर रहे हैं।

लेकिन आम निवेशकों के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि आखिर यह बॉन्ड यील्ड क्या होती है और यह बैंक एफडी से कैसे अलग है? आइए, एकदम आसान भाषा में समझते हैं कि दोनों में क्या अंतर है, कहां कितना रिस्क है और आपके पोर्टफोलियो के लिए कौन सा विकल्प बेस्ट है।

सबसे पहले जानिए क्या होते है FD और बॉन्ड यील्ड


फिक्स्ड डिपॉजिट (FD): एफडी में आप बैंक को एक तय रकम निश्चित समय के लिए देते हैं। बैंक आपको एक तय ब्याज दर (जैसे 6.5% या 7.2%) देने का वादा करता है। जब तक एफडी मैच्योर नहीं होती, आपका रिटर्न बिल्कुल फिक्स रहता है।

बॉन्ड और बॉन्ड यील्ड (Bond Yield): जब सरकार या कोई कंपनी बाजार से कर्ज जुटाती है, तो वह 'बॉन्ड' जारी करती है। बॉन्ड की एक फेस वैल्यू और कूपन रेट होती है। 'बॉन्ड यील्ड' का मतलब है कि उस बॉन्ड को आज की मार्केट कीमत पर खरीदने पर आपको असल में सालाना कितने परसेंट का रिटर्न मिल रहा है।

बॉन्ड की कीमतें जब बाजार में गिरती हैं, तो उसकी यील्ड बढ़ जाती है, और जब कीमतें बढ़ती हैं, तो यील्ड घट जाती है। एफडी में ऐसा कोई उतार-चढ़ाव नहीं होता।

बॉन्ड यील्ड और बैंक FD: जानिए 5 मुख्य अंतर

बॉन्ड यील्ड और बैंक एफडी दोनों ही फिक्स्ड इनकम के लोकप्रिय साधन हैं, लेकिन इनकी कार्यप्रणाली, रिटर्न और जोखिम के बीच 5 बड़े अंतर होते हैं। रिटर्न के मामले में जहां प्रमुख बैंकों की एफडी में 6.00% से 7.50% के बीच ब्याज मिलता है, वहीं सरकारी व उच्च रेटिंग वाले बॉन्ड्स 7.25% से 9.5% तक का वार्षिक रिटर्न दे सकते हैं। सुरक्षा के लिहाज से एफडी में आरबीआई के DICGC नियम के तहत ₹5 लाख तक का डिपॉजिट सुरक्षित रहता है, जबकि सरकारी बॉन्ड्स (G-Secs) 100% सुरक्षित होते हैं और कॉरपोरेट बॉन्ड्स की सुरक्षा उनकी क्रेडिट रेटिंग पर निर्भर करती है।

बॉन्ड यील्ड और बैंक FD: जानिए 5 मुख्य अंतर

लिक्विडिटी के स्तर पर एफडी समय से पहले तोड़ने पर 0.5% - 1% की पेनल्टी लगती है, जबकि बॉन्ड्स को मार्केट रेट पर डेट बाजार में बेचा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, एफडी का ब्याज आपकी कुल आय में जुड़कर टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स योग्य होता है, जबकि बॉन्ड्स में होल्डिंग अवधि के आधार पर टैक्स बेनिफिट मिलते हैं। सबसे बड़ा अंतर कीमतों के उतार-चढ़ाव में है। एफडी का रिटर्न पूरी तरह फिक्स्ड और स्थिर रहता है, जबकि बाजार में ब्याज दरों के बदलाव के साथ बॉन्ड की मार्केट वैल्यू में लगातार उतार-चढ़ाव आता रहता है।

एक्सपर्ट्स व्यू: आपके लिए क्या है बेहतर?

वित्तीय बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों के अपने फायदे और नुकसान हैं:

शॉर्ट टर्म और इमरजेंसी फंड के लिए एफडी बेस्ट: अगर आपको 3 महीने से 1 साल के लिए पैसा रखना है, तो बैंक एफडी सबसे सरल विकल्प है। इसमें कोई मार्केट रिस्क नहीं होता और जरूरत पड़ने पर नेटबैंकिंग से तुरंत पैसा निकाला जा सकता है।

लंबे समय और ज्यादा रिटर्न के लिए बॉन्ड्स बेहतर: अगर आप 3 से 5 साल या उससे ज्यादा समय के लिए पैसा लॉक करना चाहते हैं और एफडी से 1-2% ज्यादा रिटर्न चाहते हैं, तो AAA या AA+ रेटिंग वाले कॉरपोरेट बॉन्ड्स या सरकारी बॉन्ड्स (G-Secs) बेहतरीन विकल्प हैं।

निवेश से पहले इन 3 बातों का रखें ध्यान

1- क्रेडिट रेटिंग चेक करें: अगर कॉरपोरेट बॉन्ड में निवेश कर रहे हैं, तो हमेशा AAA या AA+ रेटिंग वाले बॉन्ड्स ही चुनें। ज्यादा ब्याज के लालच में कम रेटिंग वाले (BBB) बॉन्ड्स में पैसा न फंसाएं, डिफॉल्ट का खतरा रहता है।

2- मैच्योरिटी तक होल्ड करें: बॉन्ड खरीदने का सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि आप उसे मैच्योरिटी डेट तक होल्ड करें। इससे बाजार में ब्याज दरों के चढ़ने-गिरने का आपके रिटर्न पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।

3- टैक्स स्लैब: अपने इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से दोनों का पोस्ट-टैक्स रिटर्न कैलकुलेट करने के बाद ही फैसला लें।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

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