New Tax regime: चार्टर्ड अकाउंटेंट्स का कहना है कंपनियां अब अपने कर्मचारियों के सैलरी पैकेज को कॉरपोरेट NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम) के मुताबिक रिस्ट्रक्चर करने में दिलचस्पी दिखा रही है। साथ ही कर्मचारियों की ओर से भी इसमें दिलचस्पी देखने को मिल रही है। खासतौर से वे कर्मचारी, जो HRA (हाउस रेंट अलाउंस) का क्लेम नहीं करते और अब नई टैक्स रिजीम को अपना रहे हैं। इसके पीछे नया टैक्स रिजीम और कर्मचारियों के बीच टैक्स बचत को लेकर बढ़ती जागरूकता अहम वजह मानी जा रही है।
मुंबई स्थित हसमुख शाह एंड कंपनी एलएलपी के सीनियर पार्टनर भावेश शाह ने बताया, “इस अप्रैल में कई कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की सैलरी स्ट्रक्चर को कॉरपोरेट NPS में शामिल करने के लिए पूछताछ की है। कंपनियां अब CTC (कॉस्ट टू कंपनी) के फ्लेक्सी लाभ वाले हिस्से में NPS को जोड़ने पर विचार कर रही हैं।”
नई टैक्स रिजीम में बचत का मौका
TaxAaram.com के फाउंडर और डायरेक्टर मयंक मोहनका ने कहा, “स्पेशल अलाउंसेज टैक्सेबल होते हैं, इस वजह से कंपनियां अब इस हिस्से को कॉरपोरेट NPS में कन्वर्ट कर रही हैं जिससे कर्मचारी की टैक्सेबल इनकम कम की जा सके।”
Taxmann के वाइस प्रेसिडेंट नवीन वाधवा ने कहा, “नई टैक्स रिजीम में 14% NPS योगदान की छूट पुरानी व्यवस्था के 10% से अधिक है। इससे कर्मचारी अब नई व्यवस्था की ओर झुकते नजर आ रहे हैं।" वो बताते हैं कि 12.75 से 14 लाख रुपये सालाना कमाने वाले कर्मचारी NPS का चयन कर अपनी इनकम को टैक्स छूट सीमा में ला सकते हैं।
HRA वाले ही टिके पुराने ढांचे पर
मयंक मोहनका कहते हैं, “सिर्फ वही कर्मचारी जो ₹85,000 या उससे ज्यादा किराया दे रहे हैं और HRA क्लेम करते हैं, उनके लिए ही पुरानी टैक्स व्यवस्था फायदेमंद रह गई है। बाकी अधिकतर सैलरीड क्लाइंट्स अब नई व्यवस्था को अपना चुके हैं।”
वाधवा के मुताबिक, केवल वही कर्मचारी पुरानी टैक्स रिजीम में रहकर फायदा उठा सकते हैं जिनकी सैलरी ₹24 लाख से अधिक है और जो 8 लाख रुपये से अधिक की टैक्स छूट का दावा कर पाते हैं। HRA यहां एकमात्र बड़ी टैक्स छूट है जिसकी कोई तय ऊपरी सीमा नहीं है।
माता-पिता को किराया देने में बरतें सावधानी
कई कर्मचारी पुराने टैक्स सिस्टम में HRA क्लेम करने के लिए अपने माता-पिता को किराया देते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि किराये में अचानक भारी बढ़ोतरी से आयकर विभाग की जांच हो सकती है। मुंबई के सीए चिराग चौहान कहते हैं, “यह टैक्स के लिहाज से सही है, लेकिन किराया बहुत अधिक दिखाकर टैक्स बचाने की कोशिश करने वालों को धारा 143(3) के तहत आयकर विभाग की जांच का सामना करना पड़ सकता है।” इसलिए, अगर आप अपने माता-पिता को किराया दे रहे हैं तो रेजिस्टरड रेंट एग्रीमेंट और रेंट रसीदों का होना जरूरी है।
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