निफ्टी से दोगुनी रफ्तार से होगी कमाई! पर जापान, ताइवान और कोरिया के मार्केट में निवेश से पहले समझ लें ये 6 जरूरी नियम

Investing in Asian Stocks: RBI की LRS स्कीम के तहत कोई भी भारतीय नागरिक एक वित्तीय वर्ष में करीब 2 करोड़ रुपये तक की रकम विदेश में निवेश कर सकता है। वैसे विदेशों में सीधे शेयर खरीदना जितना आसान दिखता है, असल में इसका रास्ता उतना ही पेचीदा है। इन बाजारों में दांव लगाने से पहले आपको इन बड़े जोखिमों और नियमों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए

अपडेटेड Jun 08, 2026 पर 4:30 PM
ग्लोबल क्राइसिस के दौर में निवेशक अपना पैसा वहां लगाना चाह रहे है जहां से अच्छा मुनाफा कमा सकें

Investing in Asian markets: भारतीय निवेशक अब एशिया के अन्य बड़े बाजारों जैसे जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान में निवेश के मौके तलाश रहे हैं। बीते कुछ समय में इन एशियाई बाजारों ने रिटर्न के मामले में भारतीय शेयर बाजार को काफी पीछे छोड़ दिया है। यही वजह है कि इन्वेस्टर अपना पैसा वहां लगाना चाह रहे है जहां से अच्छा मुनाफा कमा सकें।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम यानी LRS के तहत कोई भी भारतीय नागरिक एक वित्तीय वर्ष में ढाई लाख डॉलर यानी करीब 2 करोड़ रुपये तक की रकम विदेश में निवेश कर सकता है। इसके लिए आप इंटरनेशनल ब्रोकर्स या उनके साथ पार्टनरशिप करने वाले भारतीय प्लेटफॉर्म की मदद ले सकते हैं।

वैसे विदेशों में सीधे शेयर खरीदना जितना आसान दिखता है, असल में इसका रास्ता उतना ही पेचीदा है। इन बाजारों में दांव लगाने से पहले आपको 6 सबसे बड़े जोखिम और बारीक नियमों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए:


1. रिटर्न और गिरावट के आंकड़े: भारत बनाम एशियाई बाजार

अगर हम रिटर्न की तुलना करें, तो पिछले कुछ समय में इन बाजारों का प्रदर्शन भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी 50 से कहीं बेहतर रहा है:

1 साल का रिटर्न: पिछले एक साल में जहां भारत का निफ्टी 50 करीब 7 फीसदी गिरा है, वहीं ताइवान का TW50 इंडेक्स लगभग 119 फीसदी और दक्षिण कोरिया का कोस्पी 200 करीब 215 फीसदी उछला है।

5 साल का रिटर्न: पिछले पांच वर्षों में निफ्टी 50 ने लगभग 47 फीसदी का रिटर्न दिया है। इसके मुकाबले ताइवान के TW50 ने करीब 193 फीसदी और दक्षिण कोरिया के कोस्पी 200 ने लगभग 174 फीसदी का जोरदार रिटर्न कमाकर दिया है।

2. करेंसी का जोखिम

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, विदेशी बाजार में निवेश करते समय करेंसी यानी मुद्रा के उतार-चढ़ाव का जोखिम सबसे बड़ा होता है। आप भले ही जापान की येन, दक्षिण कोरिया की वॉन या ताइवान के डॉलर में मुनाफा कमा रहे हों, लेकिन भारत लौटने पर उस पैसे को आपको रुपये में ही खर्च करना होगा। अगर भारतीय रुपये के मुकाबले वह विदेशी करेंसी कमजोर हो जाती है, तो आपके शेयर का मुनाफा बेहद कम या फिर पूरी तरह खत्म हो सकता है।

3. सीधे शेयर खरीदना बेहद मुश्किल

आरबीआई आपको निवेश की मंजूरी तो देता है, लेकिन इन देशों के अपने स्थानीय नियम बहुत कड़े हैं:

ताइवान: ताइवान के बाजार में सीधे निवेश करना एक आम भारतीय रिटेल निवेशक के लिए लगभग नामुमकिन जैसा है। वहां शेयर खरीदने के लिए आपको पहले ताइवान स्टॉक एक्सचेंज से एक निवेशक आईडी लेनी होगी, फिर स्थानीय ब्रोकर के पास खाता खोलकर वहां एक लोकल कस्टोडियन नियुक्त करना होगा।

दक्षिण कोरिया और जापान: यहां भी कस्टोडियन से जुड़े नियम लागू होते हैं और कंपनियों की ज्यादातर जानकारियां या डिस्क्लोजर केवल उनकी स्थानीय भाषा में ही होते हैं, जिससे रिसर्च करना मुश्किल होता है।

4. डिविडेंड पर टैक्स की दोहरी मार

अगर आप इन देशों की कंपनियों के शेयर खरीदते हैं और वे कंपनियां आपको डिविडेंड देती हैं, तो उस पर भारी टैक्स कटता है:

विदेशी टैक्स दर: जापान में 15.3 फीसदी, ताइवान में 21 फीसदी और दक्षिण कोरिया में करीब 22 फीसदी की दर से वहां की सरकारें पहले ही टैक्स काट लेती हैं।

भारतीय टैक्स नियम: वहां से टैक्स कटने के बाद बची हुई डिविडेंड राशि आपकी भारतीय आय में जोड़ दी जाती है और आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से दोबारा टैक्स लगता है। हालांकि, आप फॉर्म 67 भरकर विदेशी टैक्स क्रेडिट का दावा कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए बहुत ज्यादा कागजी कार्रवाई करनी होती है।

5. भारी-भरकम लागत और कम लिक्विडिटी

लेन-देन का खर्च: विदेश में सीधे शेयर खरीदने पर कुल ट्रांजैक्शन कॉस्ट निवेश की जाने वाली रकम का 0.5 फीसदी से लेकर 2 फीसदी तक बैठती है। इसमें करेंसी कनवर्ट करने का चार्ज, बैंक का रेमिटेंस चार्ज, प्रति ट्रेड 1 से 5 डॉलर का ब्रोकरेज और अन्य रेगुलेटरी फीस शामिल होती हैं।

कम लिक्विडिटी का डर: भारतीय नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के मुकाबले जापान या ताइवान के कुछ छोटे और मझोले शेयरों में ट्रेडिंग वॉल्यूम बहुत कम होता है। इस वजह से जब आप उन शेयरों को बेचना चाहेंगे, तो हो सकता है कि आपको तुरंत खरीदार न मिलें।

6. टैक्स चोरी से जुड़ा कड़ा कानून

अगर आप विदेश में एक रुपये की भी संपत्ति या शेयर रखते हैं, तो उसे हर साल अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) के 'शेड्यूल फॉरेन एसेट्स' में दिखाना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके लिए आप साधारण आईटीआर-1 फाइल नहीं कर सकते, आपको आईटीआर-2 या आईटीआर-3 ही भरना होगा।

अगर आप विदेशी होल्डिंग्स की जानकारी छिपाते हैं, तो ब्लैक मनी एक्ट के तहत बेहद गंभीर वित्तीय जुर्माने और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश विदेशी निवेशकों पर इनहेरिटेंस टैक्स भी लगाते हैं।

भारतीय निवेशकों के लिए क्या है सबसे आसान रास्ता?

मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि सीधे तौर पर विदेशी शेयर खरीदने के बजाय भारतीय निवेशकों के लिए देश के भीतर मौजूद म्यूचुअल फंड या ईटीएफ के जरिए निवेश करना सबसे बेहतर और आसान ऑप्शन है।

भारत में मिलने वाले ऐसे फंड्स में पैसे लगाने पर आपका निवेश एलआरएस के तहत नहीं आता, जिससे आपको 20 फीसदी टीसीएस, ढाई लाख डॉलर की सालाना सीमा और टैक्स रिटर्न में अलग से विदेशी संपत्ति की घोषणा करने के झंझटों से पूरी तरह मुक्ति मिल जाती है।

वैसे वर्तमान में आरबीआई की विदेशी निवेश सीमाओं के करीब पहुंचने के कारण कई भारतीय अंतरराष्ट्रीय म्यूचुअल फंड योजनाओं ने नए पैसों के निवेश पर कुछ पाबंदियां लगा रखी हैं, इसलिए निवेशकों को पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही धीरे-धीरे कदम बढ़ाना चाहिए।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

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