इंश्योरेंस पॉलिसी (Insurance Policy) के डॉक्युमेंट्स में अब एजेंट्स को मिलने वाले कमीशन के बारे में बताना अनिवार्य नहीं होगा। IRDAI ने इस प्रस्ताव को वापस ले लिया है। इंश्योरेंस रेगुलेटर का मानना है कि कमीशन की जानकारी डॉक्युमेंट्स में शामिल करने से इंश्योरेंस एजेंट्स हतोत्साहित हो सकते हैं। सूत्रों ने सीएनबीसी-टीवी18 को यह जानकारी दी है।
सूत्रों ने बताया, "रेगुलेटर का यह भी मानना है कि इंश्योरेंस के डिस्ट्रिब्यूशन के लिए इंश्योरेंस एजेंट्स अहम हैं। इसके अलावा कमीशन डिसक्लोजर के नियम से बिजनेस पर खराब असर पड़ सकता है।" IRDAI के इस फैसले के बाद एजेंट्स के लिए डॉक्युमेंट्स में कमीशन की जानकारी देना जरूरी नहीं है।
पॉलिसी डॉक्युमेंट्स में कमीशन की जानकारी देने के प्रस्ताव का विरोध भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और एजेंट्स ने किया था। इससे पहले आईआरडीएआई ने इंश्योरेंस कंपनियों के एजेंट्स के कमीशन की सीमा 20 फीसदी तय करने का भी प्रस्ताव दिया था। उसने कमीशन की लिमिट पर एक ड्राफ्ट कंसल्टेशन पेपर भी जारी किया है।
इंश्योरेंस रेगुलेटर न्यू इंश्योरेंस पॉलिसी के डीमैटेरियलाइजेशन के लिए पहले ही दिसंबर 2022 की डेडलाइन तय कर चुका है। इसका मतलब है कि इस साल के अंत तक सभी नई पॉलिसी को इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में जारी करना जरूरी होगा। आईआरडीएआई ने इंश्योरेंस कंपनियों को पुरानी बीमा पॉलिसीजी को भी दिसंबर 2023 तक इलेक्ट्रॉनिक रूप में बदलने को अनिवार्य कर चुका है।
इंश्योरेंस पॉलिसीज को NSDL, CDSL या कार्वी के साथ डीमैटेरियलाइज्ड कराया जा सकता है। डीमैटेरियलाइजेशन में फिजिकल पॉलिसी डॉक्युमेंट को ऑनलाइन ऑब्जेक्ट में बदल दिया जाता है। इसका मतलब है कि पॉलिसीहोल्डर को पॉलिसी को रिन्यू कराते वक्त किसी तरह के पेपरवर्क की जरूरत नहीं पड़ेगी। बीमा पॉलिसी के डीमैटेरियलाइजेशन से ट्रांजेक्शन कॉस्ट में कमी आएगी। साथ ही पॉलिसी में किसी तरह का मॉडिफिकेशन भी आसानी से किया जा सकेगा।